Jul 14, 2026

71th BPSC प्रश्‍न- संघवाद के स्थायित्व और कार्य प्रणाली पर बहुलवादी राजनीतिक दलों के प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। मिली जुली सरकार या गठबंधन ने सहकारी संघवाद या प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद को मजबूत या कमजोर किया है। व्याख्या कीजिए। [38]

71th BPSC प्रश्‍न- संघवाद के स्थायित्व और कार्य प्रणाली पर बहुलवादी राजनीतिक दलों के प्रभाव का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। मिली जुली सरकार या गठबंधन ने सहकारी संघवाद या प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद को मजबूत या कमजोर किया है। व्याख्या कीजिए। [38]

उत्‍तर- भारत का संघवाद विविधताओं पर आधारित एक गतिशील व्यवस्था है। 1989 के बाद बहुलवादी राजनीतिक दलों और गठबंधन सरकारों के उदय ने भारतीय संघवाद की प्रकृति को गहराई से प्रभावित किया। इससे राज्यों की भागीदारी बढ़ी, परन्तु नीतिगत अस्थिरता और क्षेत्रीय सौदेबाज़ी जैसी चुनौतियाँ भी आयी।


बहुलवादी राजनीतिक दलों का संघवाद पर प्रभाव

सकारात्मक प्रभाव

  1. राज्यों की आवाज़ को राष्ट्रीय मंच- क्षेत्रीय दलों जैसे द्रविड़ मुनेत्र कड़गम, जनता दल (यूनाइटेड), तेलुगु देशम पार्टी आदि ने केंद्र की नीतियों, वित्‍त आयोग, केन्‍द्रीय योजनाओं में राज्यों के हितों को स्‍थान दिलाया जिससे संघवाद अधिक सहभागी बना।
  2. सहकारी संघवाद को बल- गठबंधन राजनीति ने केंद्र को राज्यों के साथ संवाद और सहमति के लिए बाध्य किया। जीएसटी परिषद, नीति आयोग जैसी संस्थाएँ “सहमति आधारित संघवाद” का उदाहरण हैं।
  3. अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग में कमी- गठबंधन युग में राष्ट्रपति शासन के मनमाने प्रयोग पर नियंत्रण लगा।
  4. संघवाद स्थिरता- क्षेत्रीय अस्मिताओं को महत्‍व मिलने से अलगाववादी प्रवृत्तियों में कमी आयी और संघवाद स्थिर हुआ।

 

नकारात्मक प्रभाव

  1. नीतिगत अस्थिरता- गठबंधन सरकारों में सहयोगी दलों के दबाव के कारण आर्थिक एवं प्रशासनिक सुधार कई बार धीमे पड़े।
  2. क्षेत्रीय सौदेबाज़ी- कुछ क्षेत्रीय दल राष्ट्रीय हितों की अपेक्षा राज्य-विशेष के हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे संघीय संतुलन प्रभावित होता है।
  3. प्रतिस्पर्धात्मक तनाव- निवेश आकर्षित करने की होड़ में राज्यों के बीच “अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा” बढ़ी, जिससे क्षेत्रीय असमानताएँ भी बढ़ीं।

 

इस प्रकार बहुलवादी राजनीतिक दलों के प्रभाव से संघवाद की कार्यप्रणाली एवं स्‍थायित्‍व पर मिलाजुला प्रभाव पड़ा। GST परिषद, नीति आयोग, अंतर-राज्य परिषद, स्मार्ट सिटी मिशन आदि में जहां सहकारी संघवाद मजबूत दिखता है वहीं केंद्रीय योजनाओं का राज्‍यों में अति विस्तार, राज्यपाल का राजनीतिक उपयोग से राज्यों की स्वायत्तता में हस्तक्षेप, केंद्रीय करों में हिस्सेदारी का विवाद आदि इसके कमजोरी दर्शाता है।

 


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प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद

  1. वर्ष 2014 के बाद सहकारी संघवाद (केन्‍द्र एवं राज्‍यों के बीच) के साथ साथ प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद (राज्‍यों के बीच स्‍वस्‍थ प्रतिस्‍पर्धा) का दौर आया जिसमें कहा गया कि राज्य निवेश, विकास और सुशासन में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा करें।
  2. प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद से राज्यों में सुधार की होड़ लगी और शासन, बिजली, अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा आदि सूचकांक में सुधार आया। हांलाकि इसके साथ श्रम कानूनों और पर्यावरण मानकों में ढील, राज्‍यों के बीच बढ़ती असमानता, संसाधनों के लिए अस्वस्थ प्रतिस्पर्धा से जल विवाद, सीमा विवाद भी सामने आए।

 

इस प्रकार बहुलवादी राजनीति और गठबंधन सरकारों का भारतीय संघवाद के लिए मिश्रित प्रभाव रहा। एक ओर जहां इन्होंने केंद्रीय वर्चस्व को तोड़ा, क्षेत्रीय अस्मिताओं को सम्मान दिया वहीं दूसरी ओर नीतिगत अनिश्चितता और सौदेबाज़ी की राजनीति को भी जन्म दिया जिससे “सहकारी-प्रतिस्पर्धात्मक संघवाद” का मिश्रित मॉडल विकसित हुआ।

 

निष्कर्षत: बहुलवादी राजनीति और गठबंधन सरकारों ने भारतीय संघवाद को अधिक प्रतिनिधिक, सहभागी और लोकतांत्रिक बनाया साथ ही नीतिगत अस्थिरता और क्षेत्रीय दबाव की राजनीति को भी जन्म दिया। इस प्रकार, भारतीय संघवाद का स्थायित्व “सहयोग और प्रतिस्पर्धा” के संतुलन पर निर्भर करता है, न कि किसी एक के वर्चस्व पर।


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