GK BUCKET

Aug 5, 2026

भारत एवं अफगानिस्तान संबंध- अंतर्राष्‍ट्रीय करेंट अफेयर 2026

भारत एवं अफगानिस्तान


ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर भारत और अफगानिस्तान के संबंध अत्यधिक मजबूत रहे हैं। प्राचीन काल से ही अफगानिस्तान और भारत के लोगों ने सांस्कृतिक मूल्यों और समानता पर आधारित शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति और व्यापार एवं वाणिज्य के माध्यम से एक-दूसरे के साथ संपर्क स्थापित किया है।


भारतीय-अफगान संबंधों में पिछले कई वर्षों में उल्लेखनीय बदलाव और घटनाक्रम हुए हैं विशेषकर 2021 में तालिबान की वापसी के बाद इन संबंधों में एक मौलिक परिवर्तन देखा गया, जो हाल की स्थिति में सतर्कता और व्यावहारिकता के बीच संतुलन बनाते हुए विकसित हो रहा है।

Aug 4, 2026

71BPSC PYQ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी लघु उत्‍तरीय प्रश्‍न-उत्‍तर-भाग-2

d) How has the use of remote sensing satellites in disaster management redefined the principle of "Disaster Risk Reduction"? Explain the role of India's NETRA project with suitable examples. [6]

आपदा प्रबंधन में सुदूर संवेदन उपग्रहों के उपयोग ने "आपदा जोखिम न्यूनीकरण" के सिद्धांत को किस प्रकार पुनर्परिभाषित किया है? भारत के NETRA परियोजना की भूमिका को उदाहरण सहित स्पष्ट कीजिए।

 

उत्‍तर- "आपदा प्रबंधन का सर्वोत्तम उपाय आपदा के बाद राहत नहीं, बल्कि आपदा से पूर्व तैयारी है।" सुदूर संवेदन उपग्रहों ने आपदा प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक (Reactive) दृष्टिकोण से पूर्वानुमानात्मक एवं जोखिम-न्यूनीकरण दृष्टिकोण में परिवर्तित कर आपदा जोखिम न्यूनीकरण अवधारणा को पुनर्परिभाषित किया है।

 

पारंपरिक दृष्टिकोण

उपग्रह-आधारित आपदा जोखिम न्यूनीकरण

आपदा के बाद प्रतिक्रिया

आपदा से पूर्व तैयारी

राहत एवं पुनर्वास

जोखिम न्यूनीकरण

अनुमान आधारित निर्णय

डेटा आधारित निर्णय

सीमित क्षेत्रीय निगरानी

रियल-टाइम निगरानी

 

इस प्रकार पूर्व में आपदा प्रबंधन का केंद्र राहत एवं पुनर्वास था, जबकि आज उपग्रह आधारित प्रणालियाँ जोखिम पहचान, पूर्व चेतावनी और क्षति न्यूनीकरण पर बल देती हैं।

  1. जोखिम मानचित्रण- RISAT एवं कार्टोसेट उपग्रहों द्वारा बाढ़, भूस्खलन एवं भूकंप-संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान।
  2. पूर्व चेतावनी प्रणाली- INSAT एवं ओशनसेट द्वारा चक्रवात, बाढ़ एवं सूखे की वास्तविक समय निगरानी।
  3. भेद्यता एवं क्षति आकलन - सुभेद्यता एवं जोखिम का वैज्ञानिक आकलन, आपदा के बाद प्रभावी राहत एवं संसाधन आवंटन। जैसे-चक्रवात बिपरजॉय (2023) के दौरान उपग्रह आधारित पूर्वानुमान से लाखों लोगों को सुरक्षित स्थानों तक पहुँचाया गया।

 

NETRA परियोजना की भूमिका

NETRA (Network for Space Object Tracking and Analysis) ISRO की स्वदेशी पहल है जो अंतरिक्ष मलबे एवं संभावित टक्करों से भारतीय उपग्रहों की सुरक्षा सुनिश्चित करती है। इसके प्रमुख योगदान हैं-

  • लगभग 3400 किमी दूरी तक अंतरिक्ष वस्तुओं की निगरानी।
  • INSAT, RISAT, Cartosat जैसे उपग्रहों की निर्बाध कार्यशीलता बनाए रखना।
  • बाढ़, चक्रवात, वनाग्नि जैसी आपदाओं की सतत निगरानी को सक्षम बनाना।

 

इस प्रकार सुदूर संवेदन उपग्रहों ने आपदा जोखिम न्यूनीकरण को “प्रतिक्रिया और सुधारसे “अनुमान लगाना, रोकना और कम करनामॉडल में रूपांतरित कर दिया है। सुदूर संवेदन उपग्रह आपदा प्रबंधन की “आँखें” हैं तो NETRA उनका “सुरक्षा कवच”।

 


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e) The high end indigenization of space, IT and defence is believed to be the base of India's long term strategic autonomy. Examine the key institutional, financial and technological barriers that still inhibit complete indigenization, despite considerable national progress. [6]

भारतीय अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी तथा रक्षा प्रौद्योगिकी के उच्च स्तरों के स्वदेशीकरण को भारत की दीर्घकालिक सामरिक स्वायत्तता का आधार माना जाता है। उल्लेखनीय राष्ट्रीय प्रगति के बावजूद पूर्ण स्वदेशीकरण में बाधा उत्पन्न करने वाली प्रमुख संस्थागत, वित्तीय तथा तकनीकी अवरोधों की परिक्षा कीजिए।

 

उत्‍तर- पिछले कुछ वर्षों में भारत ने चंद्रयान-3, गगनयान, ब्रह्मोस, तेजस, UPI तथा ONDC जैसी उपलब्धियों के माध्यम से अंतरिक्ष, सूचना प्रौद्योगिकी एवं रक्षा क्षेत्रों में उल्लेखनीय प्रगति की है। फिर भी पूर्ण स्वदेशीकरण का लक्ष्य अधूरा है जो भारत की दीर्घकालिक सामरिक स्वायत्तता के लिए चुनौती बना हुआ है। इस दिशा में प्रमुख अवरोधों को निम्‍न प्रकार देख सकते हैं

 

संस्थागत अवरोध

  • DRDO–उद्योग–सेना के बीच समन्वय की कमी के कारण अनुसंधान से उत्पादन तक की प्रक्रिया बाधित।
  • रक्षा खरीद प्रक्रिया एवं प्रशासनिक लालफीताशाही परियोजनाओं में विलंब।
  • HAL, BEL जैसे सार्वजनिक उपक्रमों के प्रभुत्व से निजी नवाचार एवं प्रतिस्पर्धा सीमित होना।
  • ISRO, IN-SPACe, NSIL तथा डिजिटल संस्थाओं के बीच बेहतर संस्थागत समन्वय की कमी।

 

वित्तीय अवरोध

  • भारत का R&D व्यय GDP का केवल लगभग 0.7% है, जबकि प्रमुख नवाचार अर्थव्यवस्थाओं में यह 2–5% तक है।
  • उच्च जोखिम परियोजनाओं (कावेरी इंजन, सेमीकंडक्टर) हेतु दीर्घकालिक पूंजी का अभाव।
  • रक्षा स्टार्टअप्स के लिए scale-up funding सीमित।

 

तकनीकी अवरोध

  • सेमीकंडक्टर, GPU, उन्नत सामग्री एवं एवियोनिक्स, विशेष मिश्रधातुओं में विदेशी निर्भरता।
  • कुशल मानव संसाधन की कमी एवं Brain Drain समस्‍याएं।
  • MTCR, Wassenaar Arrangement व्यवस्थाओं से उन्नत प्रौद्योगिकियों तक सीमित पहुँच।

 

स्वदेशीकरण की चुनौती केवल तकनीकी नहीं है। कम R&D निवेश तकनीकी निर्भरता बढ़ाता है, तकनीकी निर्भरता आयात बढ़ाती है और आयात-आधारित व्यवस्था संस्थागत सुधारों की गति को कमजोर करती है। अतः तीनों अवरोध परस्पर जुड़े हुए हैं।

 

चंद्रयान-3, ब्रह्मोस और UPI ने भारत की क्षमता सिद्ध कर दी है और अब लक्ष्य मेक इन इंडिया से आगे बढ़कर “इनोवेट इन इंडियाहोना चाहिए। सेमीकंडक्टर, AI, अंतरिक्ष प्रणालियों और रक्षा प्लेटफॉर्मों में पूर्ण स्वदेशीकरण ही भारत की वास्तविक सामरिक स्वायत्तता का आधार बनेगा।

 

f) How do social networking sites act as a 'force multiplies' in the challenges to internal security posed through communication networks? Analyze the judicial and technical implications of this internal security versus civil liberty dilemma. [6]

संचार नेटवकों के माध्यम से आंतरिक सुरक्षा को उत्पन्न चुनौतियों में सोशल नेटवर्किंग साइट्स एक 'बल गुणक' के रूप में कैसे कार्य करती है? आंतरिक सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतन्त्रता के द्वन्द्व का विश्लेषण करते हुए इसके न्यायिक एवं तकनीकी निहितार्थ बताइए।

 

उत्‍तर- डिजिटल युग में सोशल नेटवर्किंग साइट्स ने सूचना के लोकतंत्रीकरण के साथ-साथ सुरक्षा खतरों के डिजिटलीकरण को भी संभव बनाया है। अपनी तीव्र गति, व्यापक पहुँच, गुमनामी तथा समन्वय क्षमता के कारण ये आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों को कई गुना बढ़ा देती हैं, इसलिए इन्हें ‘बल गुणक’ कहा जाता है।

 

आंतरिक सुरक्षा के लिए ‘बल गुणक’ के रूप में भूमिका

सोशल मीडिया स्वयं खतरा नहीं है, बल्कि यह किसी भी सुरक्षा चुनौती की गति, पहुँच और प्रभाव को गुणात्मक रूप से बढ़ा देता है जैसे-

  • सांप्रदायिक तनाव एवं अफवाहें- मुज़फ्फरनगर (2013) तथा मॉब लिंचिंग घटनाओं में भ्रामक संदेशों की भूमिका।
  • कट्टरपंथीकरण-आईएसआईएस द्वारा टेलीग्राम आदि मंचों द्वारा युवाओं का कट्टरपंथीकरण।
  • भीड़-संगठन एवं अशांति- व्हाट्सऐप समूहों द्वारा त्वरित लामबंदी।
  • सूचना युद्ध- डीपफेक, बॉट नेटवर्क तथा दुष्प्रचार अभियानों द्वारा सामाजिक विभाजन।
  • साइबर एवं हाइब्रिड युद्ध- शत्रुतापूर्ण तत्वों द्वारा जनमत को प्रभावित करने का प्रयास।

 

आंतरिक सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता

सोशल नेटवर्किंग साइट्स तीव्र गति, विशाल पहुँच, गुमनामी क्षमताओं वाली होती है जो सुरक्षा चुनौतियों को गुणात्मक रूप से बढ़ाती हैं। इस संदर्भ में आंतरिक सुरक्षा बनाम नागरिक स्वतंत्रता के मुद्दे भी उठते हैं जो अनुच्छेद 19(1)(क) की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के निजता के अधिकार बनाम राज्य की सुरक्षा-आवश्यकताओं के बीच संतुलन का प्रश्न है।

  • निगरानी बनाम निजता।
  • सामग्री नियंत्रण बनाम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
  • इंटरनेट प्रतिबंध बनाम डिजिटल अधिकार।

 

न्यायिक एवं तकनीकी निहितार्थ

सोशल नेटवर्किंग साइट्स से उत्पन्न सुरक्षा चुनौतियों ने सुरक्षा और नागरिक स्वतंत्रता के बीच संतुलन का प्रश्न खड़ा किया है। श्रेया सिंघल (2015) में सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 66A को निरस्त कर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को संरक्षण दिया, पुट्टास्वामी (2017) में निजता को मौलिक अधिकार माना तथा अनुराधा भसीन (2020) में इंटरनेट प्रतिबंधों पर आनुपातिकता की कसौटी लागू किया।

 

तकनीकी स्तर पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, डीपफेक पहचान आदि फेक न्यूज़ और ऑनलाइन कट्टरपंथ से निपटने में सहायक हैं किंतु इनके अति प्रयोग से व्यापक निगरानी और निजता-हनन का खतरा उत्पन्न हो सकता है। अत: समाधान कठोर नियंत्रण या पूर्ण स्वतंत्रता में नहीं, बल्कि न्यायिक निगरानी, तकनीकी उत्तरदायित्व, डिजिटल साक्षरता तथा आनुपातिक प्रतिबंधों पर आधारित संतुलित व्यवस्था में निहित है।



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Aug 3, 2026

71th BPSC PYQ विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी लघु उत्‍तरीय प्रश्‍न-उत्‍तर-भाग-1

निम्नलिखित प्रश्नों के लघु उत्तर लिखिए :

a) What role has the philosophy of Jai Anusandhan, Jai Anuprayog" played in the process of technological Indigenization in India? Critically analyze India's current state of  technological self reliance in the field of artificial Intelligence and Robotics. [6]

भारत में प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण की प्रक्रिया में "जय अनुसन्धान, जय अनुप्रयोग" के दर्शन की क्या भूमिका रही है? कृत्रिम बुद्धिमता एवं रोबोटिक्स के क्षेत्र में भारत की वर्तमान तकनीकी स्वावलम्बन की स्थिति का आलोचनात्मक विश्लेषण प्रस्तुत कीजिए।

उत्‍तर- प्रधानमंत्री द्वारा प्रतिपादित “जय अनुसंधान, जय अनुप्रयोग” का दर्शन अनुसंधान को उत्पाद, सेवा एवं सामाजिक समाधान में परिवर्तित करने पर बल देता है। यह “मेक इन इंडियासे आगे बढ़कर “इन्‍वेंट इन इंडियाअवधारणा का आधार है।

 

प्रौद्योगिकी के स्वदेशीकरण में भूमिका

  • अनुसंधान एवं उद्योग के बीच सेतु बनाकर प्रयोगशाला-से-बजार को जोड़ने का प्रयास।
  • इंडिया एआई मिशन, राष्‍ट्रीय क्‍वांटम मिशन, सेमीकंडक्‍टर मिशन द्वारा स्वदेशी तकनीकी क्षमता विकसित करने का प्रयास।
  • कोविन, यूपीआई, चन्‍द्रयान जैसे सफल उदाहरण से भारतीय अनुसंधान को वैश्विक मान्यता।

इस प्रकार स्टार्टअप एवं नवाचार पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देकर तकनीकी आत्मनिर्भरता को गति प्रदान किया जा रहा है। AI एवं रोबोटिक्स में भारत की स्थिति देखा जाए तो स्‍पष्‍ट होता है कि

 

सकारात्मक पक्ष

  • भारत विश्व के अग्रणी AI प्रतिभा केंद्रों में है तथा AI स्टार्टअप्स संख्या तेजी से बढ़ रही है।
  • IndiaAI Mission और भारतीय भाषायी AI मॉडल महत्वपूर्ण पहल हैं।
  • प्रज्ञान रोवर, Daksh जैसे स्वदेशी रोबोटिक प्लेटफॉर्म।

 

भारत में रक्षा, स्वास्थ्य, कृषि एवं शासन में AI का व्यापक उपयोग हो रहा है हांलाकि अभी कुछ चुनौतियाँ है जैसे-

  • AI चिप्स, GPU, सेंसर एवं सेमीकंडक्टर निर्माण में विदेशी निर्भरता।
  • R&D व्यय GDP के लगभग 0.7% तक सीमित।
  • औद्योगिक रोबोट घनत्व विकसित देशों की तुलना में अत्यंत कम।
  • पेटेंट, उच्च-स्तरीय कंप्यूटिंग अवसंरचना एवं डेटा गवर्नेंस में कमी।

 

निष्कर्ष भारत AI एवं रोबोटिक्स में शक्ति के रूप में उभर रहा है किंतु वास्तविक तकनीकी स्वावलम्बन के लिए हार्डवेयर निर्माण, अनुसंधान निवेश और नवाचार-व्यावसायीकरण को सुदृढ़ करना होगा तभी “जय अनुसंधान, जय अनुप्रयोग” विकसित भारत 2047 की तकनीकी आधारशिला बन सकेगा।

 


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b) To what extent has the expansion of STEM education in Bihar been successful in bridging regional educational disparities? Discuss the hurdles of 'Digital Divide' and 'Teacher capacity, in the context of providing quality education. [6]

बिहार में STEM शिक्षा का विस्तार क्षेत्रीय शैक्षणिक असमानताओं को दूर करने में किस सीमा तक सफल रहा है? गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने के संदर्भ में 'डिजिटल डिवाइड' एवं 'शिक्षक क्षमता' की बाधाओं पर चर्चा कीजिए।

उत्‍तर- बिहार में NEP-2020, अटल टिंकरिंग लैब्स, विज्ञान-गणित प्रयोगशालाओं तथा डिजिटल शिक्षण पहलों के माध्यम से STEM (Science, Technology, Engineering and Mathematics) शिक्षा के विस्तार से शैक्षिक अवसरों का विस्तार हुआ है किंतु क्षेत्रीय असमानताएं अभी भी है।

 

STEM शिक्षा विस्तार की उपलब्धियाँ

  • विज्ञान एवं गणित विषयों में नामांकन तथा उत्तीर्णता दर में सुधार हुआ है।
  • बालिकाओं तथा वंचित वर्गों की STEM शिक्षा में भागीदारी बढ़ी है।
  • अटल टिंकरिंग लैब्स, विज्ञान प्रयोगशालाओं और तकनीकी संस्थानों (IIT पटना, NIT पटना) ने नवाचार संस्कृति को बढ़ावा दिया है।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्मों (DIKSHA, PM eVIDYA) ने गुणवत्तापूर्ण सामग्री तक पहुँच।

 

हालाँकि शिक्षा की पहुंच में वृद्धि हुई है, परंतु गुणवत्ता और समानता  के स्तर पर सफलता सीमित रही है। पटना, गया एवं मुज़फ्फरपुर जैसे शहरी क्षेत्रों की तुलना में सीमांचल, कोसी और अन्य दूरस्थ जिलों में प्रयोगशालाओं, इंटरनेट तथा प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता कम है जिससे STEM अवसर अभी असमान है।

 

डिजिटल डिवाइड

  • विद्यालयों में कंप्यूटर, स्मार्ट कक्षाएँ एवं इंटरनेट सुविधा का अभाव।
  • ग्रामीण-शहरी, लैंगिक तथा डिजिटल असमानताएँ से STEM शिक्षा पहुँच में बाधा।
  • डिजिटल डिवाइड से कोडिंग, रोबोटिक्स, वर्चुअल प्रयोगशाला जैसी आधुनिक शिक्षण पद्धतियाँ सीमित।

शिक्षक क्षमता

  • गणित एवं विज्ञान के प्रशिक्षित शिक्षकों की कमी।
  • STEM आधारित प्रयोगात्मक शिक्षण में दक्षता का अभाव।
  • सतत प्रशिक्षण एवं डिजिटल शिक्षण कौशल कमी।

 

निष्कर्षत: बिहार में STEM शिक्षा का विस्तार शैक्षिक पहुँच बढ़ा रहा है लेकिन क्षेत्रीय असमानताओं को समाप्त करने में आंशिक रूप से सफल रहा है। वास्तविक परिवर्तन के लिए डिजिटल अवसंरचना का सार्वभौमिक विस्तार, STEM शिक्षकों की क्षमता-वृद्धि, तथा सीमांचल-कोसी जैसे पिछड़े क्षेत्रों पर लक्षित निवेश आवश्यक है।

 

c) Explain how the integration of nano technology with environmental monitoring systems can meaningfully address pollution and degradation in India's Industrial belts. Support your answer with examples of emerging innovations. [6]

भारत के औद्योगिक क्षेत्रों में प्रदूषण तथा पर्यावरणीय क्षरण से निपटने में नैनो प्रौद्योगिकी को पर्यावरण निगरानी प्रणालियों के साथ जोड़ने से किस प्रकार सार्थक समाधान प्राप्त हो सकते हैं। स्पष्ट कीजिए। अपने उत्तर को उभरते नवाचारों के उदाहरणों से समर्थित कीजिए।

 

उत्‍तर- भारत के औद्योगिक क्षेत्र जैसे वापी, अंकलेश्वर, कानपुर आदि वायु, जल एवं मृदा प्रदूषण की गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। ऐसे में नैनो प्रौद्योगिकी को पर्यावरण निगरानी प्रणालियों के साथ एकीकृत करना प्रदूषण नियंत्रण एवं पर्यावरणीय क्षरण रोकने की दिशा में एक प्रभावी समाधान प्रदान करता है जिसे निम्‍न प्रकार समझ सकते हैं :-

 

रियल-टाइम निगरानी एवं पूर्व चेतावनी

  • कार्बन नैनोटयूब, तथा क्‍वांटम डॉट सेंसर हानिकारक एवं भारी धातुओं को सूक्ष्‍म स्तर तक पहचान सकते हैं।
  • कृत्रिम बुद्धिमत्‍ता और इंटरनेट ऑफ थिंग्‍स आधारित सेंसर नेटवर्क प्रदूषण के पैटर्न का विश्लेषण कर पूर्व चेतावनी जारी करते हैं। उदाहरण के लिए IIT खड़गपुर का ग्राफीन आधारित सेंसर तथा IIT मद्रास की स्मार्ट मॉनिटरिंग प्रणाली।
  • प्रदूषण बढ़ने पर चेतावनी और प्रतिक्रियास्‍वरूप ऑटोमेटिक फिल्टर सक्रिय होना या इकाई बंद होना प्रभावी समाधान है।

 

प्रदूषित जल एवं मृदा का उपचार

  • नैनोमैटेरियल मृदा शुद्धिकरण में उपयोगी है वहीं नैनोकार्बन फ्लोरेट्स, नैनो फाइबर फिल्‍टर आदि भारी धातु, माइक्रोप्लास्टिक एवं विषैले रसायनों को हटाने में सहायक है।
  • Nano Zero-Valent Iron आर्सेनिक, क्रोमियम एवं सीसा जैसी भारी धातुओं को निष्क्रिय करता है। जैसे CSIR-NGRI द्वारा भूजल उपचार, IIT मुंबई के अपशिष्ट जल शोधन संबंधी अनुसंधान।

 

इस प्रकार सूक्ष्म स्तर का हस्तक्षेप व्यापक पर्यावरणीय प्रभाव दे सकता है और यही नैनो प्रौद्योगिकी की वास्तविक शक्ति है। उभरते नवाचार के रूप में नैनो प्रौद्योगिकी और पर्यावरण निगरानी का समन्वय स्मार्ट एवं सतत औद्योगिकीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण योगदान दे सकता है। हालाँकि, नैनोकणों की संभावित विषाक्तता, उच्च लागत तथा नियामक ढाँचे का अभाव चुनौतियाँ बने हुए हैं।




Jul 30, 2026

71th BPSC Mains प्रश्‍न- भारत के पूर्वी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाहों पर चर्चा कीजिए। उपयुक्त उदाहरणों सहित उत्तर पूर्वी भारत और बांग्लादेश के विकास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह, कोलकाता (एसएमपीके) की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (38)

Discuss the major ports on eastern coast of India. Critically examine the role of Syama Prasad Mookerjee Port, Kolkata (SMPK) in the development of North East India and Bangladesh, giving suitable examples. [38]

71th BPSC Mains प्रश्‍न- भारत के पूर्वी तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाहों पर चर्चा कीजिए। उपयुक्त उदाहरणों सहित उत्तर पूर्वी भारत और बांग्लादेश के विकास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह, कोलकाता (एसएमपीके) की भूमिका का आलोचनात्मक विश्लेषण कीजिए। (38)

 

उत्‍तर- भारत का पूर्वी तट बंगाल की खाड़ी के साथ लगभग 3,000 किमी तक फैला है जो दक्षिण-पूर्व एशिया, बांग्लादेश तथा उत्तर-पूर्वी भारत के साथ व्यापारिक एवं सामरिक संपर्क का प्रमुख माध्यम है। इस तट पर स्थित प्रमुख बंदरगाह भारत की ब्लू इकोनॉमी, लॉजिस्टिक्स, निर्यात तथा Act East Policy को गति प्रदान करते हैं।

 

भारत के पूर्वी तट के प्रमुख बंदरगाह

बंदरगाह

राज्य

प्रमुख विशेषता

श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह

पश्चिम बंगाल

भारत का एकमात्र प्रमुख नदी बंदरगाह

पारादीप बंदरगाह

ओडिशा

कोयला एवं खनिज निर्यात का प्रमुख केंद्र

विशाखापत्तनम बंदरगाह

आंध्र प्रदेश

प्राकृतिक गहरे पानी का बंदरगाह

चेन्नई बंदरगाह                  

तमिलनाडु

कंटेनर एवं ऑटोमोबाइल निर्यात केंद्र

कामराजार बंदरगाह

तमिलनाडु

भारत का पहला कॉर्पोरेट बंदरगाह

वी.ओ. चिदंबरनार बंदरगाह

तमिलनाडु   

दक्षिणी समुद्री व्यापार का प्रमुख केंद्र

 

उत्तर-पूर्वी भारत एवं बांग्‍लादेश के विकास में श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह की भूमिका


उत्तर-पूर्व भारत का “समुद्री द्वार”

पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्य स्थलरुद्ध (Landlocked) हैं। असम की चाय, त्रिपुरा का रबर, मेघालय का चूना पत्थर तथा पेट्रोलियम उत्पाद इसी के माध्यम से वैश्विक बाजार तक पहुँचते हैं।


अंतर्देशीय जलमार्ग

यह बंदरगाह राष्ट्रीय जलमार्ग-1 (गंगा) एवं राष्ट्रीय जलमार्ग-2 (ब्रह्मपुत्र) को जोड़ता है। भारत-बांग्लादेश प्रोटोकॉल रूट के माध्यम से कम लागत पर माल परिवहन संभव हुआ है।


Act East Policy

यह भारत की Act East Policy का प्रमुख लॉजिस्टिक आधार है। उदाहरण के लिए कलादान मल्टीमॉडल परियोजना, BBIN (Bangladesh-Bhutan-India-Nepal) संपर्क में महत्‍वपूर्ण है।


लागत एवं व्‍यापार प्रवाह

ट्रांजिट एवं ट्रांसशिपमेंट सुविधा से बांग्‍लादेश के चटगाँव एवं मोंगला बंदरगाह का संपर्क बढ़ा जिससे दोनों देशों के व्यापार लागत में कमी आयी और व्‍यापार प्रवाह बढ़ा।


क्षेत्रीय विकास

श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह कोलकाता उत्तरपूर्वी भारतबांग्लादेशनेपाल भूटान के भीतर व्यापार आपूर्तिश्रृंखलाओं को जोड़ क्षेत्रीय विकास और रोज़गार बढ़ता है।

यह बंदरगाह अन्य हाईसीडिंग लाइनों के साथ मिलकर यह कम समय में एवं कम लागत में भारी माल को चीन और दक्षिणपूर्व एशिया से उत्तरपूर्वी भारत तक पहुँचाती हैं।

 


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चुनौतियाँ

  1. तकनीक निर्भरता- श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह में हाईसीडिंग जहाजहैंडलिंग, नदीसफ़ाई, तकनीकगहन हैं जो रखरखावलागत और तकनीकी निर्भरता बढ़ाते हैं।
  2. स्थानीय बाधाएँ- हुगली में नदीसफ़ाई, जलवितरण और नदीकटाव होने से समय और लागत बढ़ने के साथ “स्थानीयसंचालन” पर नकारात्मक प्रभाव डाल सकता है।

 

निष्कर्षत: श्यामा प्रसाद मुखर्जी बंदरगाह पूर्वोत्तर भारत और बांग्लादेश के लिए आर्थिक जीवनरेखा है। यह क्षेत्रीय संपर्क, व्यापार, जलमार्ग आधारित लॉजिस्टिक्स तथा Act East Policy का केंद्रीय स्तंभ बन चुका है।

 

भविष्‍य में आधुनिकीकरण एवं क्षेत्रीय सहयोग के साथ, सागरमाला परियोजना के तहत आधुनिकीकरण, हल्दिया डॉक का विस्तार, AI आधारित पोर्ट प्रबंधन, रेल-सड़क-जलमार्ग का एकीकरण जैसे उपायों को बढ़ाया जाए तो यह बंदरगाह उत्‍तर-पूर्वी भारत को दक्षिण-पूर्व एशिया से जोड़ने वाला “गेटवे बंदरगाहबन सकता है।