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Feb 23, 2026
Feb 16, 2026
1.प्रश्न-राज्य विभाजन के बाद बिहार में खनिज संसाधनों की प्रकृति का विश्लेषण कीजिए। साथ ही अवैध खनन रोकने तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए। 8 अंक
उत्तर- खनिज संरचना की दृष्टि से बिहार में स्थानीय और संकेंद्रित भंडार
पाए जाते हैं जो प्रायः चट्टानी संरचनाओं से जुड़े हैं। वर्ष 2000 में विभाजन के बाद बिहार गौण खनिज जैसे बालू, पत्थर,
मिट्टी और चूना पत्थर का क्षेत्र बन गया वहीं धात्विक खनिजों में
विपन्न हो गया।
हांलाकि हाल के वर्षों में कुछ धात्विक एवं अधात्विक प्रकृति के खनिज जैसे जमुई
(मैग्नेटाइट), रोहतास (पोटाश व चूना पत्थर), गया और औरंगाबाद
(निकेल, क्रोमियम, PGE) और मुंगेर
(बॉक्साइट) जैसे ब्लॉक तो जमुई में सोना अयस्क को चिन्हित किया गया है जिससे खनन विविधीकरण
की संभावना बनी है।
खनन राजस्व में बिहार में गौण खनिज राजस्व का प्रमुख स्रोत रहा है लेकिन अवैध खनन और उससे
होनेवाले पर्यावरणीय नुकसान चिंता का विषय रहा है जिस पर नियंत्रण हेतु पिछले कुछ
वर्षों में अनेक उपाय किए गए हैं जैसे-
- ‘बालू मित्र ऐप’ से ऑनलाइन बिक्री, समान दर और पारदर्शिता सुनिश्चित।
- खनिज (संशोधन) नियमावली 2021 के तहत कड़े दंड, भारी जुर्माना और वाहन जब्ती प्रावधान।
- ई-चालान, जियो-फेंसिंग, वाहन ट्रैकिंग, टास्क फोर्स से निगरानी सुदृढ़ हुई।
- पारदर्शिता और जवाबदेही हेतु ई-नीलामी ।
- 12 जिलों में राज्य खनन निगम द्वारा पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप बालूघाट संचालन।
- जिला खनिज फाउंडेशन राशि का उपयोग खनन क्षेत्रों के कल्याण में किए जाने के
साथ जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट, वैज्ञानिक आकलन और पर्यावरणीय स्वीकृति को अनिवार्य किया
गया।
स्पष्ट है कि सीमित खनिज संसाधनों के बावजूद बिहार ने अवैध खनन रोकने और राजस्व
बढ़ाने में सफलता पाई है। यदि पर्यावरणीय संतुलन के साथ वैध खनन और खनिज विविधीकरण
को आगे बढ़ाया जाए तो खनन क्षेत्र राज्य के विकास में अधिक योगदान दे सकता है।
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2.प्रश्न–बिहार में कृषि संरचना और भूमि सुधार की असफलता ने ग्रामीण गरीबी
को किस प्रकार बनाए रखा है? स्पष्ट कीजिए। 8 अंक
उत्तर-कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद बिहार में ग्रामीण गरीबी व्यापक
रूप से विद्यमान है जिसका प्रमुख कारण प्रचलित कृषि संरचना, भूमि सुधार
और कृषि विकास कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन न हो पाना है।
कृषि संरचना
- भूमि का असमान वितरण और छोटी जोत कृषि उत्पादकता को सीमित करता है।
- अनेक किसान सीमांत हैं, जिनके पास निवेश और तकनीक अपनाने की क्षमता नहीं होती।
- सरकारी ऋण, सिंचाई और कृषि सहायता योजनाओं का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता।
- बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ भी कृषि को बार-बार क्षति पहुँचाती हैं जिससे किसानों की आय अस्थिर रहती है और वे कर्ज के जाल में फँसते जाते हैं।
- भूमि सुधार के प्रयास, चकबंदी, हदबंदी भी अपेक्षित परिणाम
नहीं दे सके। खेती करनेवाले किसान के पास भूमि स्वामित्व नहीं होना पुरानी समस्या
रही है। इससे कृषि में दीर्घकालिक निवेश और सुधार की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो
पाती।
इस प्रकार कृषि की संरचनागत कमियों से पर्याप्त आय न मिलने के कारण ग्रामीण
परिवार गरीबी से बाहर नहीं निकल पाते। कृषि और भूमि स्वामित्व की कमी से ग्रामीण
बेरोजगारी और वैकल्पिक रोजगार की कमी से पलायन बढ़ता है जो ग्रामीण गरीबी को और
गहरा करता है।
अत: बिहार में गरीबी उन्मूलन के लिए कृषि सुधार और भूमि संबंधी न्याय अत्यंत
आवश्यक हैं। जब तक किसान की आय स्थिर और सुरक्षित नहीं होगी तब तक ग्रामीण गरीबी
में ठोस कमी संभव नहीं है।
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3.प्रश्न-बिहार में प्रस्तावित ड्राई डॉक परियोजना को राज्य के औद्योगिक और
लॉजिस्टिक्स परिदृश्य में परिवर्तनकारी कदम क्यों माना जा रहा है? विश्लेषण
कीजिए। 8 अंक
उत्तर-जल परिवहन के विकास में जहाजों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा
निर्णायक भूमिका निभाती है। इस संदर्भ में पटना के दुजरा क्षेत्र में प्रस्तावित
ड्राई डॉक बिहार के लिए तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अधोसंरचना है।
ड्राई डॉक वह सुविधा है जहाँ जहाजों को पानी से बाहर निकालकर सूखी भूमि पर
मरम्मत और निरीक्षण किया जाता है। बिहार में ऐसी सुविधा के अभाव में जहाजों को
अन्य राज्यों में ले जाना पड़ता था जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते थे अब इसके निर्माण
से निम्न लाभ होंगे
- जलपोतों की मरम्मत स्थानीय स्तर पर संभव होगी।
- जलपोत की संचालन लागत घटेगी।
- जहाजों की उपलब्धता बढ़ेगी जिससे मालवाहन की नियमितता सुनिश्चित होगी।
लॉजिस्टिक्स के दृष्टिकोण से यह परियोजना जलमार्ग आधारित परिवहन को
व्यवहारिक विकल्प बनाती है। मालवाहक जहाजों की संख्या बढ़ने से सड़क परिवहन पर
दबाव घटेगा, पर्यावरण अनुकूल परिवहन और भारी माल का परिवहन अधिक सस्ते तरीके से संभव
होगा।
इसी क्रम में औद्योगिक दृष्टि से पटना और आस-पास के क्षेत्रों में जहाज
मरम्मत, उपकरण आपूर्ति, और सहायक सेवाओं से जुड़ी इकाइयों के
विकास की संभावना बनेगी जिससे औद्योगिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। इस प्रकार यह परियोजना
केवल परिवहन नहीं बल्कि जल आधारित लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में
कदम है।
निष्कर्षत: ड्राई डॉक की स्थापना बिहार को केवल जलमार्ग उपयोगकर्ता से आगे
बढ़ाकर जल परिवहन आधारित औद्योगिक गतिविधियों का सहभागी बनाती है जो बिहार के
आर्थिक ढांचे में संरचनात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है।
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Feb 9, 2026
प्रश्न-डिजिटल भूमि अभिलेख और ऑनलाइन सेवाएँ क्या वास्तव में भूमि विवाद और
भ्रष्टाचार को कम कर सकती हैं? बिहार के अनुभव के आधार पर विवेचना
कीजिए।8 अंक
उत्तर-भूमि विवाद बिहार में न्यायिक बोझ और सामाजिक संघर्ष का बड़ा कारण
रहे हैं। परंपरागत रिकॉर्ड प्रणाली में पारदर्शिता और अद्यतन की कमी के कारण
स्वामित्व को लेकर लगातार विवाद उत्पन्न होते रहे हैं। इस पृष्ठभूमि में डिजिटल
भूमि प्रशासन को समाधान के रूप में प्रस्तुत किया गया है जैसे-
- डिजिटल सुधारों से प्रशासनिक पारदर्शिता बढ़ी है।
- ऑनलाइन खाता, नक्शा और भू-लगान भुगतान से बिचौलियों की भूमिका कम हुई।
- ऑनलाइन दाखिल–खारिज से प्रक्रिया का ट्रैकिंग, विवाद निपटान में तेजी आई।
- बिहार भूमि विवाद निराकरण अधिनियम के तहत समयबद्ध निर्णय प्रणाली लागू हुई।
- डिजिटल रिकॉर्ड से साक्ष्य जुटाना आसान हुआ।
तकनीकी प्रगति एवं ऑनलाइन सेवाओं के माध्यम से सुधार तो आया है लेकिन कुछ
संरचनात्मक सीमाएँ भी हैं जिनमें प्रमुख हैं-
- पुराने सर्वे रिकॉर्ड की त्रुटियाँ डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी स्थानांतरित हो जाती हैं।
- ग्रामीण क्षेत्रों में डिजिटल साक्षरता और इंटरनेट पहुँच सीमित है।
- भू-माफिया और राजनीतिक दबाव अब भी बाधक हैं।
इसलिए उपरोक्त तथ्यों को देखते हुए जहां डिजिटल भूमि सुधार को प्रशासनिक
सुधार से जोड़ना आवश्यक है वही नियमित सर्वेक्षण, स्थानीय सत्यापन और ग्राम
सभाओं की भागीदारी जरूरी है।
निष्कर्षत: डिजिटल भूमि प्रशासन विवाद कम करने का सशक्त उपकरण है, पर इसे
अंतिम समाधान मानना भ्रम होगा। जब तकनीक, संस्थागत सुधार और
सामाजिक निगरानी साथ मिलें, तभी भूमि शासन वास्तव में
न्यायपूर्ण बन सकता है।
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प्रश्न- बिहार में कृषि के आधुनिकीकरण एवं तकनीकी विकास की दिशा में किए जा
रहे प्रमुख प्रयासों का विश्लेषण कीजिए। यह स्पष्ट कीजिए कि ये पहलें किसानों की
आय वृद्धि और जलवायु अनुकूल कृषि में कैसे सहायक हैं। 38 अंक
उत्तर- कृषि बिहार की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है किंतु जलवायु अनिश्चितता, छोटे जोत
आकार और सीमित संसाधनों के कारण पारंपरिक कृषि अब पर्याप्त नहीं रह गई है। इसी
संदर्भ में राज्य सरकार द्वारा तकनीक आधारित, नवाचारी और
जलवायु अनुकूल कृषि को बढ़ावा देकर कृषि के आधुनिकीकरण की दिशा में ठोस कदम उठाए
जा रहे हैं जिसे निम्न प्रकार देख सकते हैं:-
तकनीक आधारित खेती द्वारा नवाचार
- सहरसा में तालाब आधारित मॉडल में नीचे मछली और ऊपर सब्जी उत्पादन द्वारा हाइड्रोपोनिक्स जैसी एकीकृत कृषि प्रणाली शुरू की गई।
- दुल्हिन बाजार (पटना) में न्यूट्रिशनल विलेज के तहत पोषक तत्वों से भरपूर जैविक फसलों को बढ़ावा दिया जा रहा है।
- ड्रोन से पौधा संरक्षण, AI आधारित फसल आकलन और “फसल” मशीन के माध्यम से डेटा-संचालित स्मार्ट खेती को प्रोत्साहन मिल रहा है।
डिजिटल सेवाएँ और संसाधन प्रबंधन
- ‘मौसम बिहार ऐप’ से 5 दिन पहले मौसम पूर्वानुमान मिलने से बुवाई और कटाई निर्णय बेहतर हो रहे हैं।
- ‘मिट्टी बिहार ऐप’ और बड़े पैमाने पर मृदा जांच से उर्वरकों का संतुलित उपयोग संभव हो रहा है।
- 562 टेलिमेट्री सिस्टम से भूजल स्तर की निगरानी कर जल दोहन को नियंत्रित किया जा रहा है।
जलवायु अनुकूल कृषि और फसल विविधीकरण
- बाढ़ और सूखा सहनशील फसलों के विकास हेतु कॉलेज ऑफ एग्रीकल्चरल बायोटेक्नोलॉजी की स्थापना और नई प्रजातियों का रोडमैप।
- मोटे अनाज, दलहन और तिल के लिए 100 बीज हब,
जिससे स्थानीय बीज उपलब्धता बढ़ेगी।
- सात आदर्श बागवानी केंद्रों से मखाना, मशरूम, शहद और
फल-सब्जी आधारित मूल्य संवर्धन को बढ़ावा।
उपरोक्त के अलावा पशुपालन और मत्स्य क्षेत्र में तकनीकी प्रयास भी किसानों
की आय वृद्धि एवं विविधता ला रहे हैं जिनमें e-Gopala ऐप, सीमेन
स्टेशन, IVF तकनीक और पशु एम्बुलेंस से पशुधन उत्पादकता बढ़
रही है। मछली ब्रूड बैंक, फिश फीड मिल और “फिश ऑन व्हील्स” से मत्स्य मूल्य श्रृंखला मजबूत हुई
है।
निष्कर्षत: बिहार में कृषि के आधुनिकीकरण में तकनीक, डिजिटल
सेवाएँ, जलवायु अनुकूलता और आय विविधीकरण एक साथ जुड़े हैं।
यदि किसान प्रशिक्षण, बाजार संपर्क और संस्थागत समर्थन को और
सुदृढ़ किया जाए, तो ये पहलें बिहार की कृषि को टिकाऊ,
प्रतिस्पर्धी और लाभकारी बनाने में निर्णायक सिद्ध होंगी।
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Feb 5, 2026
प्रश्न-बिहार बजट 2025–26 में घोषित नई औद्योगिक नीतियाँ राज्य के आर्थिक ढांचे में किस प्रकार संरचनात्मक परिवर्तन ला सकती हैं? औद्योगिक विकास, रोजगार सृजन और सतत विकास के संदर्भ में विश्लेषण कीजिए। 38 अंक
उत्तर- लंबे समय तक कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था पर निर्भर रहने वाला बिहार अब
औद्योगिक विविधीकरण और निवेश आधारित विकास की ओर अग्रसर हो रहा है। बिहार बजट 2025–26 में
घोषित नई औद्योगिक नीतियाँ राज्य को विनिर्माण, कृषि-आधारित
उद्योग और हरित ऊर्जा के माध्यम से संतुलित विकास पथ पर लाने का प्रयास करती हैं
जिसे निम्न प्रकार समझ सकते हैं-
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क्षेत्रीय औद्योगिक विविधीकरण
- फार्मास्युटिकल प्रमोशन नीति 2025 से राज्य में शून्य दवा उत्पादन
की स्थिति बदलकर स्वास्थ्य आधारित उद्योग विकसित होंगे और R&D को प्रोत्साहन मिलेगा।
- खाद्य प्रसंस्करण नीति 2025 से कृषि उत्पादों का मूल्य संवर्धन होगा, फसल बर्बादी घटेगी और ग्रामीण क्षेत्रों में उद्योग विकसित होंगे।
- बायोफ्यूल्स नीति (संशोधन) 2025 कृषि अपशिष्ट के उपयोग से स्वच्छ
ऊर्जा, कार्बन उत्सर्जन में कमी और ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ावा
देगी।
निवेश अनुकूल वातावरण
- औद्योगिक निवेश प्रोत्साहन नीति 2025 द्वारा टैक्स छूट, सब्सिडी, सरल प्रक्रियाओं से निवेश आकर्षित।
- बिहार बिजनेस कनेक्ट 2024 के अंतर्गत ₹1.8 लाख करोड़ से
अधिक के एमओयू राज्य में भविष्य के निवेश संकेत देते हैं।
भौतिक अवसंरचना
- डोभी (गया) में औद्योगिक पार्क और फतुहा में मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक हब से आपूर्ति श्रृंखला मजबूत होगी और बड़े पैमाने पर रोजगार सृजित होंगे।
- अमृतसर–कोलकाता औद्योगिक कॉरिडोर से राष्ट्रीय बाजार से जुड़ाव बढ़ेगा।
स्थानीय उद्यमिता और समावेशन
- मुख्यमंत्री उद्यमी योजना और लघु उद्यमी योजना से छोटे उद्योगों को पूंजी समर्थन मिल रहा है।
- खादी मॉल नेटवर्क विस्तार से ग्रामोद्योग और कारीगरों को बाजार उपलब्ध होगा।
- स्टार्टअप पॉलिसी से नवाचार आधारित रोजगार को बढ़ावा मिल रहा है।
इस प्रकार बिहार की नई औद्योगिक नीतियाँ केवल निवेश आकर्षण तक सीमित नहीं, बल्कि
कृषि–उद्योग एकीकरण, हरित ऊर्जा, अवसंरचना
विकास और स्थानीय उद्यमिता को एक साथ जोड़ने का प्रयास हैं। यदि भूमि, बिजली, कौशल विकास और लॉजिस्टिक्स में समानांतर
सुधार किए जाएँ तो ये नीतियाँ बिहार को
प्रवास-आधारित अर्थव्यवस्था से उत्पादन-आधारित विकास की ओर ले जा सकती हैं।
प्रश्न- बिहार में मृदा क्षरण की समस्या के प्रमुख कारणों का विश्लेषण
कीजिए तथा मृदा संरक्षण हेतु सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयासों की संक्षिप्त में
बताएं। 8 अंक
उत्तर- कृषि प्रधान राज्य बिहार में मिट्टी की गुणवत्ता खाद्य सुरक्षा और
ग्रामीण आजीविका का आधार है लेकिन अवैज्ञानिक कृषि, नदियों की सक्रियता और वन
क्षरण के कारण मृदा क्षरण एक गंभीर समस्या बन चुकी है। बिहार की लगभग 32% भूमि किसी न किसी रूप में क्षरण से प्रभावित है जिसके भौगोलिक कारण मैदानी
और पठारी दोनों क्षेत्रों में स्पष्ट दिखाई देते हैं जिसे निम्न प्रकार समझ सकते
हैं:
- मैदानी क्षेत्रों में नदियों के तटबंध कटाव और मार्ग परिवर्तन से उपजाऊ मिट्टी का क्षरण होता है।
- कोसी नदी के मार्ग परिवर्तन से
सहरसा, मधेपुरा, सुपौल, मधुबनी,
कटिहार और पूर्णिया में गंभीर मृदा क्षरण हुआ है।
- गंगा, गंडक,
घाघरा और महानंदा नदियाँ भी तटीय कटाव को बढ़ाती हैं।
- दक्षिणी पठारी भागों में अधिक
ढाल के कारण वर्षा जल तीव्र गति से बहता है, जिससे ऊपरी उपजाऊ मिट्टी नष्ट होती है।
- कैमूर, गया,
नवादा, मुंगेर, जमुई और बांका
में वनस्पति की कमी से मृदा क्षरण की समस्या और बढ़ जाती है।
- कई मानवीय गतिविधियाँ जैसे रासायनिक
उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग, फसल चक्र का अभाव तथा अनियोजित भूमि उपयोग भी समस्या को
बढ़ाती है।
इस प्रकार बिहार में मृदा क्षरण प्राकृतिक और मानवीय कारकों का संयुक्त
परिणाम है जिसके समाधान हेतु सरकार जल–जीवन–हरियाली
अभियान और हर खेत को पानी के माध्यम से जल व मृदा संरक्षण को बढ़ावा दे रही है
वहीं जैविक कृषि, हरित आवरण विस्तार, मृदा
स्वास्थ्य कार्ड, जैव उर्वरक तथा एकल-उपयोग
प्लास्टिक पर प्रतिबंध से मृदा संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं।
इस प्रकार सरकार मृदा संरक्षण की दिशा में प्रयासरत है। हांलाकि
स्थायी समाधान हेतु इन उपायों के साथ किसान जागरूकता, वन संरक्षण
और वैज्ञानिक खेती जैसे उपायों को अपनाए जाने की भी आवश्यकता है।
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Feb 2, 2026
प्रश्न-बिहार बजट 2025–26 में घोषित महिला सशक्तिकरण से जुड़ी पहलें किस प्रकार आर्थिक आत्मनिर्भरता, सुरक्षा और सामाजिक भागीदारी को बढ़ावा देती हैं? 8 अंक




