उद्यमशील राज्य-आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26
आर्थिक
सर्वेक्षण 2025-26 भारत को एक ‘उद्यमशील राज्य’ (Entrepreneurial State) की ओर बढ़ने का आह्वान करता है। यह अवधारणा बताती है कि सरकार केवल नियामक
या कल्याणकारी भूमिका तक सीमित न रहकर नवाचार, जोखिम-लेने और
आर्थिक परिवर्तन की सक्रिय भागीदार बने।
यहां
उद्यमशील राज्य का अर्थ राज्य पूंजीवाद या सरकार द्वारा व्यवसाय चलाना नहीं है और
ना ही निजी क्षेत्र को विशेषाधिकार देना है। इसका उद्देश्य है कि राज्य निजी
क्षेत्र के नवाचार का एक रणनीतिक भागीदार बने, जो नीतिगत दिशा, वित्तीय समर्थन और संस्थागत ढांचा प्रदान करे।
‘उद्यमशील राज्य’
की विशेषताएँ
जोखिम प्रबंधन
- उद्यमशील राज्य अनिश्चितताओं से बचने की बजाय जोखिम को समझकर और व्यवस्थित रूप से प्रबंधित करने का प्रयास करता है।
- सरकार
नई तकनीकों,
उद्योगों और नीतियों में निवेश करके नवाचार को प्रोत्साहित करती है।
- इसका
उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि जोखिम केवल निजी क्षेत्र पर न पड़े, बल्कि
राज्य भी रणनीतिक रूप से जोखिम साझा करे।
संस्थागत रूप से सीखने की क्षमता
- उद्यमशील
शासन में राज्य केवल नियमों के अनुपालन तक सीमित नहीं रहता, बल्कि
संस्थागत सीखने की संस्कृति विकसित करता है।
- इसमें असफलताओं को सीखने का अवसर माना जाता है।
- नीतियों
में तेजी से सुधार करते हुए ‘अनुपालन से क्षमता निर्माण’ (Compliance to
Capability) की दिशा में आगे बढ़ा जाता है।
- उदाहरण
के लिए दक्षिण कोरिया ने अपनी राज्य क्षमता का निर्माण केवल प्रशासनिक शक्ति से
नहीं किया,
बल्कि संस्थाओं को चरणबद्ध और रणनीतिक तरीके से विकसित किया।
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उद्यमशील नौकरशाही की
विशेषताएँ
- परिणाम-उन्मुख प्रशासन-उद्यमशील राज्य में अधिकारियों का
मूल्यांकन केवल नियमों के पालन के आधार पर नहीं, बल्कि वास्तविक
परिणामों और प्रभावों के आधार पर किया जाता है।
- विफलता के प्रति सहनशीलता- यह
व्यवस्था स्वीकार करती है कि नवाचार की प्रक्रिया में त्रुटियाँ स्वाभाविक हैं।
इसलिए गलतियों को सीखने की प्रक्रिया का हिस्सा माना जाता है,परंतु
ठहराव या निष्क्रियता को स्वीकार नहीं किया जाता।
- समर्थन की विश्वसनीय वापसी -उद्यमशील राज्य यह भी समझता है कि किसी नीति या संस्था को अनंत समय तक समर्थन देना उचित नहीं होता।
- आवश्यकता समाप्त होने पर समर्थन वापस लेना भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है जितना कि प्रारंभिक समर्थन देना।
उद्यमशील शासन की
चुनौतियाँ
- असममित प्रोत्साहन (Risk-averse Bureaucracy)- वर्तमान प्रशासनिक व्यवस्था में जोखिम से बचने की संस्कृति होती है। इससे नवाचार और प्रयोग की संभावनाएँ सीमित हो जाती हैं।
- पूर्वव्यापी जांच का दबाव-निगरानी संस्थाएँ
कई बार ईमानदारी से की गई त्रुटियों और वास्तविक कदाचार को समान रूप से देखती हैं, जिससे
अधिकारियों में निर्णय लेने का डर बढ़ जाता है।
- विफलता को अक्षमता के रूप में देखना- यदि
असफलताओं को केवल प्रशासनिक अक्षमता माना जाए, तो अधिकारी नई नीतियों के
प्रयोग से बचने लगते हैं। इसलिए राजनीतिक नेतृत्व को यह स्पष्ट संकेत देना आवश्यक
है कि सीखने वाली विफलता स्वीकार्य है।
- मानकीकृत मापदंडों की समस्या- उद्यमशील
पहलों के परिणाम अक्सर दीर्घकालिक और गैर-रेखीय (Non-linear) होते हैं।
इसलिए उन्हें पारंपरिक मानकों जैसे तत्काल राजस्व वृद्धि से मापना कठिन होता है।
- लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं की जटिलता-लोकतंत्र
में राजनीतिक नेतृत्व जनभावना के प्रति संवेदनशील होता है, जबकि
नौकरशाही प्रशासनिक निरंतरता सुनिश्चित करती है। ऐसे में जोखिम यह रहता है कि
राजनेता लोकलुभावनवाद की ओर झुक सकते हैं और नौकरशाही अत्यधिक सतर्क या रूढ़िवादी
बन सकती है।
आर्थिक सर्वेक्षण का
सुझाव: श्रम का स्पष्ट विभाजन
- आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार एक सफल उद्यमशील राज्य के लिए राजनीतिक नेतृत्व और नौकरशाही के बीच स्पष्ट कार्य-विभाजन आवश्यक है।
- राजनीतिक
नेतृत्व को दीर्घकालिक दृष्टि, दिशा और प्राथमिकताएँ निर्धारित करनी
चाहिए।
- नौकरशाही
को उन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए नवाचारपूर्ण मार्ग खोजने, समस्याओं
का समाधान करने और नीतिगत उपकरणों को अनुकूलित करने की जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
उद्यमशील
राज्य की अवधारणा सरकार को एक सक्रिय, नवाचारी और जोखिम-साझा करने
वाली संस्था के रूप में देखने का दृष्टिकोण प्रस्तुत करती है। यदि भारत इस दिशा
में सफलतापूर्वक आगे बढ़ता है, तो यह नवाचार, औद्योगिक विकास और दीर्घकालिक आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा दे सकता है।
हालांकि इसके लिए प्रशासनिक संस्कृति में परिवर्तन, संस्थागत
सीखने की क्षमता और राजनीतिक-प्रशासनिक समन्वय अत्यंत आवश्यक होगा।
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