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Mar 13, 2026

Civil service current affairs 2026 - नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद

 

नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद


वर्तमान विश्व राजनीति में सत्ता के स्वरूप में महत्वपूर्ण परिवर्तन दिखाई दे रहा है। कई देशों में निर्णय-निर्माण की प्रक्रिया संस्थागत ढांचे की बजाय व्यक्तियों और निजी नेटवर्कों के इर्द-गिर्द केंद्रित होती जा रही है। इस प्रवृत्ति को नव-राजतंत्रवाद (Neo-Royalism) और नव-सामंतवाद (Neo-Feudalism) के रूप में समझा जा रहा है।

 

17वीं शताब्दी के बाद तथा विशेषकर 19वीं-20वीं शताब्दी में विदेश नीति संस्थागत, तर्कसंगत और नियम-आधारित बन गई थी। परंतु आज नौकरशाही की कमजोरी, अभिजात वर्ग की शक्ति में कमी, तकनीकी कंपनियों के बढ़ते प्रभाव और वैयक्तिकृत राजनीति के कारण यह व्यवस्था फिर से व्यक्ति-केंद्रित और नेटवर्क-आधारित होती दिख रही है।

 

नव-राजतंत्रवाद (Neo-Royalism)- यह ऐसी व्यवस्था है जिसमें सत्ता एक संप्रभु नेता के हाथों में केंद्रित हो जाती है और शासन संस्थाओं के बजाय व्यक्तिगत निष्ठा पर आधारित नेटवर्क के माध्यम से संचालित होता है।

 

मुख्य विशेषताएँ

  • सत्ता का केंद्रीकरण एक शक्तिशाली नेता के हाथों में।
  • निर्णय-निर्माण में औपचारिक संस्थाओं की भूमिका कम हो जाना।
  • शासन का संचालन व्यक्तिगत निष्ठा व संबंधों पर आधारित अधिकारियों के माध्यम से।
  • राष्ट्रीय हितों की बजाय व्यक्तिगत प्राथमिकताओं या सौदेबाजी का प्रभाव।
  • बहुपक्षीय संस्थाओं और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को चुनौती।
  • अमेरिका में डोनाल्ड ट्रम्प की व्यक्तिकेंद्रित विदेश नीति शैली, रूस, चीन और तुर्की जैसे देशों में केंद्रीकृत नेतृत्व की प्रवृत्ति।

 

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नव-सामंतवाद (Neo-Feudalism)- यह ऐसी प्रवृत्ति है जिसमें सत्ता केवल राज्य के पास न रहकर निजी संस्थाओं और वैश्विक नेटवर्कों में विभाजित हो जाती है, जिससे राज्य का पारंपरिक प्राधिकार कमजोर पड़ता है।

 

मुख्य विशेषताएँ

  • शक्ति का विभिन्न निजी व अंतरराष्ट्रीय नेटवर्कों में विखंडन।
  • राज्य के अधिकार-क्षेत्र का कमजोर होना।
  • डिजिटल व आर्थिक शक्ति रखने वाले निजी समूहों का बढ़ता प्रभाव।
  • परस्पर अतिक्रमण करने वाले अधिकार-क्षेत्र, जो मध्यकालीन सामंती व्यवस्था से मिलते-जुलते हैं।
  • उदाहरण- वैश्विक तकनीकी कंपनियाँ और डिजिटल प्लेटफॉर्म, स्टारलिंक या सोशल मीडिया नेटवर्क, जो युद्ध, राजनीति और सूचना प्रवाह को प्रभावित करते हैं।

 

नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद से उभरती चुनौतियाँ

नियम-आधारित अंतर्राष्ट्रीय व्यवस्था का क्षरण

  • बहुपक्षीय संस्थाओं जैसे UN, WTO, NATO की भूमिका कमजोर हो सकती है।
  • नेता संस्थागत निर्णयों की बजाय व्यक्तिगत निर्णयों को प्राथमिकता देते हैं।
  • उदाहरण- अमेरिका का अनेक अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलना।

 

आर्थिक साधनों का शस्त्रीकरण

  • टैरिफ, आर्थिक प्रतिबंध और बाजार पहुँच को दबाव बनाने के उपकरण के रूप में प्रयोग किया जाता है। इससे वैश्विक आपूर्ति शृंखला और आर्थिक स्थिरता प्रभावित होती है।

 

राज्य की संस्थाओं का कमजोर होना

  • नौकरशाही की स्वायत्तता कम होती है।
  • विधायिका और विशेषज्ञ-आधारित नीति-निर्माण की प्रक्रिया कमजोर पड़ती है।

 

निजी सत्ता का उदय

  • तकनीकी कंपनियाँ डेटा, एल्गोरिद्म और विचारधारात्मक प्रभाव के माध्यम से ‘अर्ध-संप्रभु’ शक्ति अर्जित करती हैं।
  • डिजिटल प्लेटफॉर्म राजनीतिक विमर्श और सामाजिक व्यवहार को प्रभावित करने लगते हैं।

 

नव-राजतंत्रवाद और नव-सामंतवाद की प्रवृत्तियाँ आधुनिक लोकतांत्रिक व नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था के लिए चुनौती प्रस्तुत करती हैं। इनसे न केवल राज्य की संस्थागत क्षमता कमजोर होती है, बल्कि वैश्विक शासन तंत्र और बहुपक्षवाद भी प्रभावित होता है। इसलिए अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को मजबूत करना, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता बनाए रखना तथा तकनीकी कंपनियों के प्रभाव को संतुलित करना भविष्य की विश्व राजनीति के लिए आवश्यक होगा।

 

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