चौथी औद्योगिक क्रांति केंद्र
विश्व
आर्थिक मंच ने वैश्विक स्तर पर पांच नए ‘चौथी औद्योगिक क्रांति (IR 4.0)
केंद्र’ स्थापित करने की घोषणा की है। इनमें से एक केंद्र आंध्र प्रदेश (भारत) में
स्थापित किया जाएगा। मुंबई और तेलंगाना के बाद यह भारत में तीसरा IR 4.0 केंद्र होगा। इसका उद्देश्य उभरती तकनीकों के विकास, नीति निर्माण और नवाचार को बढ़ावा देना है।
चौथी औद्योगिक क्रांति
‘चौथी
औद्योगिक क्रांति’ उस वर्तमान युग को दर्शाती है जिसमें डिजिटल, भौतिक
और जैविक तकनीकें आपस में एकीकृत हो रही हैं। इसमें कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), रोबोटिक्स, इंटरनेट ऑफ थिंग्स (IoT), क्वांटम कंप्यूटिंग जैसी प्रमुख तकनीकें शामिल हैं।
चौथी औद्योगिक क्रांति
का महत्त्व
आर्थिक संवृद्धि को बढ़ावा
स्वचालन, डेटा
विश्लेषण और स्मार्ट विनिर्माण के माध्यम से उत्पादकता में वृद्धि होती है। साथ ही
यह आपूर्ति श्रृंखलाओं को अधिक लचीला और कुशल बनाती है।
समावेशी विकास की संभावना
यह
भारत जैसे विकासशील देशों को पुरानी तकनीकों के चरणों को छोड़कर सीधे उन्नत डिजिटल
तकनीकों को अपनाने का अवसर देती है। इससे डिजिटल सेवाओं और आर्थिक अवसरों की पहुँच
का विस्तार संभव होता है।
पर्यावरणीय संधारणीयता
स्मार्ट
ग्रिड,
परिशुद्ध कृषि और चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसी तकनीकों के माध्यम से कम
कार्बन उत्सर्जन और संसाधन दक्ष विकास को बढ़ावा मिलता है।
मानव पूंजी का महत्व
यह
क्रांति शारीरिक श्रम की तुलना में कौशल, नवाचार और आजीवन सीखने पर
अधिक जोर देती है। इससे ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलता है।
प्रमुख चुनौतियां और
जोखिम
तकनीकी अंतराल- विकसित और विकासशील देशों के बीच
डिजिटल असमानता बढ़ने का खतरा है। उदाहरण के तौर पर उन्नत डिजिटल उत्पादन तकनीकों
में 91% वैश्विक पेटेंट आवेदन केवल दस अग्रणी अर्थव्यवस्थाओं के पास हैं।
कार्यबल में व्यवधान- स्वचालन के कारण
दोहराए जाने वाले कार्यों में शारीरिक कौशल की मांग लगभग 30% तक घट सकती है। वहीं
कोडिंग और डेटा विश्लेषण जैसे तकनीकी कौशल की मांग 50% से अधिक बढ़ने की संभावना
है।
साइबर सुरक्षा और लचीलापन- औद्योगिक
प्रणालियों के अधिक कनेक्टेड होने से साइबर हमलों, जासूसी और
महत्वपूर्ण अवसंरचना के बाधित होने का जोखिम बढ़ जाता है।
पर्यावरणीय दबाव- सेंसर, डेटा सेंटर और
कनेक्टेड डिवाइसेज़ के बढ़ते उपयोग से ऊर्जा और दुर्लभ संसाधनों की खपत बढ़ सकती
है।
चौथी
औद्योगिक क्रांति वैश्विक अर्थव्यवस्था और समाज को गहराई से रूपांतरित कर रही है।
यह उत्पादकता वृद्धि,
समावेशी विकास और पर्यावरणीय स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण अवसर प्रदान
करती है, किंतु इसके साथ तकनीकी असमानता, रोजगार परिवर्तन और साइबर सुरक्षा जैसी चुनौतियाँ भी जुड़ी हुई हैं। इसलिए
आवश्यक है कि देश तकनीकी नवाचार के साथ-साथ कौशल विकास, समावेशी
नीतियों और मजबूत नियामक ढांचे को भी प्राथमिकता दें।
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BPSC Mains special Notes
प्रश्न-बिहार में कौशल विकास कार्यक्रमों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी सामाजिक समावेशन और श्रम बाजार संरचना को कैसे प्रभावित कर रही है? विश्लेषण कीजिए। 8 अंक
उत्तर-असंगठित क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी लंबे समय तक अदृश्य और असुरक्षित रही है लेकिन हाल के वर्षों में बिहार सरकार द्वारा संचालित कौशल विकास कार्यक्रमों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी श्रम बाजार में संरचनात्मक परिवर्तन का संकेत देती है।
- कौशल युवा कार्यक्रम में 2016 में पुरुष-महिला अनुपात 80:20 था, जो 2024 में बदलकर 42:58 हो गया है। श्रम में बढ़ती लैंगिक समानता, दलित पिछड़ों की बढ़ती भागीदारी यह दर्शाता है कि प्रशिक्षण और रोजगार की नीतियों में अब महिलाओं को केंद्रीय स्थान मिल रहा है।
- महिलाओं के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, जीविका, शहरी निकायों के सहयोग से प्रशिक्षण तथा अनौपचारिक क्षेत्रों जैसे स्ट्रीट फूड, खुदरा विक्रय और घरेलू सेवाओं में कौशल मान्यता, टूल किट वितरण में महिलाओं को प्राथमिकता से महिला श्रमिकों की रोजगार क्षमता बढ़ी है।
इसका सामाजिक प्रभाव यह है कि महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता बढ़ रही है जिससे घरेलू निर्णयों में उनकी भूमिका मजबूत होती है। साथ ही, पारंपरिक रूप से पुरुष-प्रधान क्षेत्रों में महिलाओं की उपस्थिति सामाजिक संरचनाओं में बदलाव का संकेत देती है।
आर्थिक दृष्टि से यह परिवर्तन श्रम आपूर्ति का विस्तार करता है और घरेलू खपत को बढ़ावा देता है जिससे स्थानीय अर्थव्यवस्था सुदृढ़ होती है। इसके अतिरिक्त, महिला-नेतृत्व वाले स्वरोजगार से पलायन में कमी आने की संभावना भी बनती है।
इस प्रकार कौशल विकास कार्यक्रमों में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी केवल रोजगार नीति नहीं, बल्कि सामाजिक परिवर्तन की प्रक्रिया है जो लैंगिक समानता को बढ़ावा देते हुए असंगठित श्रम बाजार को अधिक समावेशी और उत्पादक बनाती है।
प्रश्न- भारत के 2070 के शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य के संदर्भ में बिहार की भूमिका को किस प्रकार समझा जा सकता है? उत्सर्जन संरचना और संभावित रणनीतियों के आधार पर चर्चा करें। 38 Marks
उत्तर- भारत द्वारा COP-26 में 2070 तक शुद्ध शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य घोषित किए जाने के बाद बिहार जैसे जनसंख्या बहुल एवं कृषि प्रधान राज्य की भूमिका विशेष महत्व रखती है। बिहार के उत्सर्जन संरचना में बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड एवं संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की रिपोर्ट देखा जाए तो स्पष्ट होता है कि
- वर्ष 2018 में भारत के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में बिहार का योगदान केवल 3.3% था, जबकि देश की जनसंख्या में उसकी हिस्सेदारी 8.8% है।
- वर्ष 2018 में 69% उत्सर्जन ऊर्जा क्षेत्र से हुआ और भविष्य में यह हिस्सा बढ़कर 93% तक पहुँच सकता है जिसका मुख्य कारण विद्युत उत्पादन में कोयले पर निर्भरता है।
- कृषि, वन एवं भूमि उपयोग, अपशिष्ट प्रबंधन और औद्योगिक प्रक्रियाएँ भी उत्सर्जन में योगदान देती हैं हांलाकि ऊर्जा क्षेत्र निर्णायक बना हुआ है।
वर्तमान में बिहार का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन अपेक्षाकृत कम है लेकिन यह चिंता का विषय यह है कि यदि वर्तमान प्रवृत्तियाँ बनी रहती हैं, तो वर्ष 2070 तक बिहार का कुल उत्सर्जन 5.2 गुना बढ़ने का अनुमान है। अत: इस रिपोर्ट के अनुसार शुद्ध शून्य की दिशा में रणनीतिक उपाय के तहत बिहार के लिए निम्न कदम अनिवार्य हैं-
- नवीकरणीय ऊर्जा संपन्न राज्यों के साथ दीर्घकालिक स्वच्छ ऊर्जा खरीद समझौते।
- आवासीय व सरकारी भवनों की छतों पर सोलर पैनल, फ्लोटिंग सोलर को बढ़ावा।
- उद्योग, परिवहन और रियल एस्टेट क्षेत्रों का विद्युतीकरण, ताकि नवीकरणीय ऊर्जा का उपयोग बढ़े।
- वर्ष 2030 के बाद नए थर्मल पावर प्लांट से परहेज।
उपरोक्त तथ्यों से स्पष्ट है कि बिहार शुद्ध शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की राह में दोहरी स्थिति में है। एक ओर कम ऐतिहासिक उत्सर्जन, दूसरी ओर भविष्य में तीव्र वृद्धि का खतरा है। यदि अभी से ऊर्जा संक्रमण की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन बिगड़ सकता है और भारत का लक्ष्य बाधित हो सकता है। अतः नवीकरणीय ऊर्जा आधारित विकास मॉडल ही बिहार को 2070 के शुद्ध शून्य लक्ष्य के साथ सतत विकास की ओर ले जा सकता है।
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