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Jan 28, 2026

BPSC Answer writing-“सार्वभौमिक आधारिक आय, परिसीमन, रेवड़ी संस्कृति/उभरती मुफ्त योजना

 BPSC civil service mains writing test  


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प्रश्न -सार्वभौमिक आधारिक आय (UBI) को पारंपरिक कल्याणकारी योजनाओं का विकल्प नहीं बल्कि उनके पूरक के रूप में देखा जाना चाहिए।इस कथन के आलोक में भारत में UBI की भूमिका का विश्लेषण कीजिए। 38 अंक 

उत्तर-भारत में कल्याणकारी राज्य की अवधारणा ऐतिहासिक रूप से लक्षित सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर आधारित रही है जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, वृद्धावस्था एवं विधवा पेंशन एवं बीमा योजनाएँ आदि। इन योजनाओं ने गरीबी उन्मूलन और सामाजिक संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया है किंतु लाभार्थी की सही पहचान,  रिसाव, भ्रष्टाचार और प्रशासनिक जटिलताएँ इनकी प्रभावशीलता सीमित करती रही हैं। 

 

इसी संदर्भ में सार्वभौमिक आधारिक आय को इन योजनाओं का विकल्प भी कहा जाता है जिसकी अवधारणा प्रत्येक नागरिक को उसकी आय, रोजगार या सामाजिक स्थिति की परवाह किए बिना किसी शर्त के एक नियत नकद राशि प्रदान करने से है। सार्वभौमिक आधारिक आय अपनी विशेषताओं के आधार पर निम्‍न प्रकार समाज कल्‍याण को लक्षित करता है 

 

  • उन नागरिकों को भी सुरक्षा जो किसी कारणवश लक्षित योजनाओं से बाहर रह जाते हैं जैसे अनौपचारिक क्षेत्र और गिग इकॉनमी के श्रमिक। 
  • आय-अस्थिरता, बेरोजगारी, बीमारी और आपदा जैसे जोखिमों के विरुद्ध एक सार्वभौमिक सुरक्षा जाल निर्मित किया जा सकता है।
  • नकद अंतरण व्यक्तियों को आत्मनिर्णय की स्वतंत्रता देता है जिससे वे अपनी आवश्यकताओं के अनुसार संसाधनों का उपयोग कर सकते हैं। 
  • यह गरिमा-आधारित कल्याण की अवधारणा को मजबूती देता है जो वस्तु-आधारित सहायता में अक्सर अनुपस्थित रहती है।

 

इस प्रकार इस प्रकार सार्वभौमिक आधारिक आय समाज कल्‍याण लक्षित करता है लेकिन सभी सामाजिक समस्याओं का समाधान मानना उचित नहीं है। इसी कारण इसे विकल्‍प के बजाय पूरक के रूप में देखना अधिक व्यावहारिक और यथार्थपरक प्रतीत होता है क्‍योंकि भारत जैसे विकासशील देश में अभी शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण जैसी सेवाओं की बेहतर पहुंच गरीबों से दूर है वहां सार्वजनिक निवेश अपरिहार्य है।


इसी क्रम में भारत में एक तिहाई से अधिक आबादी गरीबी रेखा से नीचे है जिसे केवल नकद सहायता से प्रतिस्थापित नहीं किया जा सकता। अतः भारत जैसे देश में सार्वभौमिक आधारिक आय को मौजूदा योजनाओं के साथ समन्वयात्मक रूप में लागू किया जाना उचित होगा।

 

निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि सार्वभौमिक आधारिक आय को पारंपरिक कल्याणकारी योजनाओं जैसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली, वृद्धावस्था पेंशन योजनाओं, बीमा योजनाओं का विकल्प नहीं बल्कि एक ऐसा आधारभूत ढाँचा के रूप में देखा जाना चाहिए जो सामाजिक सुरक्षा को व्यापक, सरल और अधिक समावेशी बना सकता है।

शब्‍द संख्‍या-355

 

प्रश्न-भारत में परिसीमन की प्रक्रिया लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने के लिए आवश्यक है, किंतु बदलती जनसंख्या संरचना  (असमान जनसंख्या वृद्धि ) ने इसे संघीय तनाव का विषय बना दिया है।चर्चा कीजिए।

उत्तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 82 और 170 के अंतर्गत प्रत्येक जनगणना के बाद लोकसभा और राज्य विधानसभाओं की सीटों के परिसीमन का प्रावधान किया गया है। परिसीमन का मूल उद्देश्य जनसंख्या के अनुपात में समान राजनीतिक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है और भारत में अंतिम परिसीमन 2008 में हुआ था।

 

उल्लेखनीय है कि 84वें संविधान संशोधन (2001) द्वारा 2026 तक लोकसभा और विधानसभा सीटों के पुनर्विन्यास पर रोक लगा दी गई थी और अब 2027 की जनगणना के बाद परिसीमन की प्रक्रिया पुनः प्रारंभ होने की संभावना है। हांलाकि अगले परिसीमन से पूर्व ही भारत में असमान जनसंख्या वृद्धि ने इस प्रक्रिया को राजनीतिक और संघीय विवाद का विषय बना दिया है और उत्तर और दक्षिण भारत के बीच नई बहस को जन्म दिया है जिसे निम्‍न प्रकार देख सकते हैं-


  • जनसांख्यिकीय दृष्टि से दक्षिणी राज्यों जैसे केरल और तमिलनाडु ने परिवार नियोजन में उल्लेखनीय सफलता प्राप्त की है जहाँ कुल प्रजनन दर लगभग 1.8 है। इसके विपरीत बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों में यह दर अब भी लगभग 3.0 के आसपास बनी हुई है।
  • यदि परिसीमन केवल जनसंख्या के आधार पर हुआ तो दक्षिणी राज्यों की लोकसभा सीटें घटेंगी जबकि उत्तरी राज्यों की सीटें बढ़ेंगी।
  • 2001 और 2011 की जनगणना के आधार पर किए गए अनुमानों के अनुसार तमिलनाडु, केरल और अविभाजित आंध्र प्रदेश को 8–8 सीटों का नुकसान हो सकता है जबकि उत्तर प्रदेश को 11 और बिहार को 10 सीटों का लाभ मिल सकता है।

 

यही कारण है कि दक्षिणी राज्य इसे अपने विकास और जनसंख्या नियंत्रण में सफलता के बावजूद राजनीतिक दंड के रूप में देख रहे हैं जबकि उनका राष्ट्रीय जीडीपी में योगदान 30% से अधिक है। यह स्थिति संघवाद, राजनीतिक प्रतिनिधित्व और वित्तीय संतुलन तीनों को प्रभावित कर सकती है।

 

हालाँकि परिसीमन लोकतांत्रिक आवश्यकता है परंतुएक व्यक्ति, एक वोटके सिद्धांत और संघीय समानता के बीच संतुलन बनाना एक बड़ी चुनौती है। इसी क्रम में परिसीमन आयोग आयोग के निर्णयों के विरुद्ध न्यायिक अपील का अभाव और जनगणना में विलंब ने इस अविश्वास को और गहरा किया है।

 

अंत: असमान जनसंख्या वृद्धि और परिसीमन प्रक्रिया से उत्‍पन्‍न तनाव में कमी के लिए सीटों की कुल संख्या बढ़ाना, जनसंख्या के साथ सामाजिक संकेतकों को भार देना तथा केंद्र–राज्य संवाद को मजबूत करना आवश्यक होगा और आगामी परिसीमन भारत के संघीय ढाँचे और लोकतांत्रिक संतुलन की परीक्षा होगी जिसके लिए संवेदनशील, समावेशी और सहमति-आधारित दृष्टिकोण अनिवार्य होगा।



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प्रश्न-भारतीय लोकतंत्र में रेवड़ी संस्कृति/उभरती मुफ्त योजनाओं की राजनीति के स्वरूप, प्रभाव तथा इससे उत्पन्न चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। 38 अंक 

उत्तर -भारतीय लोकतंत्र में पिछले एक दशक में चुनावी राजनीति की एक नई प्रवृत्ति तीव्रता से उभरी है, जिसे आम भाषा मेंरेवड़ी संस्कृतिकहा जा रहा है। इसका आशय चुनावों से ठीक पहले सत्तारूढ़ दलों द्वारा बड़े पैमाने पर मुफ्त योजनाओं, नकद अंतरण और सब्सिडी घोषणाओं से है।

 

वर्तमान में मुफ्त योजनाओं/रेवड़ी संस्कृति को केवल कल्याणकारी नीति नहीं बल्कि एक राजनीतिक रणनीति के रूप में देखा जाने लगा है । मुफ्त या सब्सिडी योजनाएं, प्रत्यक्ष नकद अंतरण, कर्ज़ माफी, वस्तुओं अथवा सेवाओं का नि:शुल्क वितरण आदि इसके विभिन्‍न स्‍वरूप हैं।

 

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सत्ता पक्ष के पास राजकोषीय संसाधनों तथा प्रशासनिक तंत्र तक सीधी पहुँच होती है जिससे इन योजनाओं में उसे चुनावी प्रतिस्पर्धा में स्वाभाविक बढ़त मिलती है। यह प्रवृत्ति हाल के वर्षों में प्रवृत्ति क्षेत्रीय सीमाओं से बाहर निकलकर राष्ट्रीय चुनावी रणनीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन चुकी है जैसे

  • मध्य प्रदेश मेंलाड़ली बहना योजनाने  2023 के विधानसभा चुनाव में महिला मतदाताओं को निर्णायक रूप से प्रभावित किया।
  • इसी प्रकार बिहार में बेरोजगार स्नातकों को भत्ता, चुनाव से पहले 125 यूनिट मुफ्त बिजली, महिलाओं को 10 हजार की नकद सहायता जैसे निर्णय ने महिला मतदाताओं को प्रभावित किया।
  • महाराष्ट्र में भी चुनाव पूर्व लगभग 18,500 करोड़ रुपए की नकद सहायता वितरित की गई।

इस प्रकार हालिया विभिन्न राज्यों में घोषित मुफ्त योजनाओं का कुल मूल्य इसरो के वार्षिक बजट से कई गुना अधिक है जिसके प्रभाव निम्‍न हैं

 

राजनीतिक प्रभाव

  • मुफ्त योजनाएँ विशेषकर महिला और गरीब मतदाताओं को लक्षित करती हैं। बिहार में महिला मतदाताओं की संख्या पुरुषों से अधिक है और वे अपेक्षाकृत जाति-तटस्थ मतदान करती हैं। विश्लेषकों के अनुसार बिहार विधानसभा चुनाव 2025 में निर्णायक जीत में ऐसी योजनाओं की महत्वपूर्ण भूमिका रही।

 

आर्थिक प्रभाव

  • RBI ने चेतावनी दी है कि अत्यधिक मुफ्त योजनाएँ राजकोषीय घाटा और सार्वजनिक ऋण बढ़ाती हैं।
  • अध्ययनों के अनुसार चुनावी वर्षों में राज्यों का राजकोषीय घाटा GSDP के 1–1.7% तक बढ़ जाता है जबकि दीर्घकाल में पूंजीगत व्यय, अवसंरचना विकास और मानव पूंजी निवेश प्रभावित हो सकता है।

 

सर्वोच्च न्यायालय ने फरवरी 2025 में चेतावनी दी कि बिना उत्पादक उद्देश्य के मुफ्त सुविधाएँपरजीवी मानसिकताको बढ़ावा दे सकती हैं। चुनाव आयोग ने राजनीतिक दलों से चुनावी वादों के वित्तीय स्रोत स्पष्ट करने को कहा है यद्यपि उसके नियामक अधिकार सीमित हैं।

 

मुफ्त योजनाओं का उद्देश्य सामाजिक कल्याण हो सकता है, किंतु जब वे चुनावी प्रतिस्पर्धा में अनुचित बढ़त का साधन बन जाती हैं तब यह लोकतांत्रिक समानता, वित्तीय उत्तरदायित्व और नीति-निर्माण की निष्पक्षता को प्रभावित करती हैं। अतः आवश्यक है कि कल्याणकारी योजनाओं और लोकलुभावन रेवड़ी संस्कृति के बीच स्पष्ट नीति-मानक स्थापित किए जाएँ।

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