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Jan 27, 2026

“हिंसा बाधा को शीघ्र हटा सकती है, पर वह कभी सृजनात्मक नहीं हो सकती”

 

हिंसा बाधा को शीघ्र हटा सकती है, पर वह कभी सृजनात्मक नहीं हो सकती


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मानव इतिहास संघर्षों, आंदोलनों और सत्ता-परिवर्तनों से भरा पड़ा है। जब भी समाज अन्याय, शोषण या दमन की स्थिति में फँसता है तब परिवर्तन की आकांक्षा तीव्र हो जाती है और हिंसा कई बार एक त्वरित समाधान के रूप में उभरती है। किंतु यह कथन किहिंसा बाधा को जल्दी हटा सकती है, पर वह कभी सृजनात्मक नहीं हो सकती”, परिवर्तन और निर्माण के बीच के मूलभूत अंतर को रेखांकित करता है। बाधा को गिराना अपेक्षाकृत सरल हो सकता है पर एक न्यायपूर्ण, स्थायी और मानवीय सामाजिक व्यवस्था का निर्माण केवल विनाश से संभव नहीं होता।

 

लोग टूट जाते हैं, एक घर बनाने में तुम तरस नहीं खाते, बस्तियाँ जलाने में

 

हिंसा मूलतः नकारात्मक शक्ति है जो समस्या का समाधान नहीं बल्कि केवल विद्यमान संरचना का विघटन करती है। निर्माण के लिए विवेक, सहमति, नैतिकता और धैर्य जैसे मूल्यों की आवश्यकता होती है किंतु हिंसा उन सभी को कमजोर कर देती है। अरस्तू ने कहा था कि राज्य केवल शक्ति से नहीं, बल्कि न्याय से टिकता है और जहाँ भय व्यवस्था का आधार बन जाता है, वहाँ समाज स्थायित्व नहीं पा सकता। इसलिए हिंसा भले ही तात्कालिक परिवर्तन ला दे, पर वह स्थायी सामाजिक पुनर्निर्माण का आधार नहीं बन सकती।

 

यह विचार महात्मा गांधी के अहिंसा सिद्धांत में भी मिलता है। उन्‍होंने कहा था कि हिंसा से प्राप्त विजय क्षणिक होती है, पर उससे जन्मा घाव पीढ़ियों तक समाज को पीड़ित करता है।उनके लिए साधन और साध्य में एकरूपता अनिवार्य थी और यदि साधन ही हिंसक हों, तो उनसे निकला परिणाम भी अस्थिर और अन्यायपूर्ण ही होगा। इसी कारण उन्होंने कहा था किअहिंसा केवल कमजोरों का हथियार नहीं, बल्कि साहसी और नैतिक समाज की पहचान है।गांधी का संघर्ष केवल सत्ता-परिवर्तन नहीं बल्कि सामाजिक चेतना और नैतिक पुनर्निर्माण की प्रक्रिया भी था जो बिना किसी हिंसा के चला।

 

इतिहास में अनेक उदाहरण मिलते हैं जहाँ हिंसा ने तात्कालिक रूप से सत्ता गिराई, पर उसके बाद समाज और अधिक अस्थिर हो गया। फ्रांसीसी क्रांति ने राजतंत्र को समाप्त किया, पर उसके बादआतंक का शासनआया जिसने समाज को भय और अराजकता में धकेल दिया। रूस की क्रांति ने साम्राज्य को गिराया, किंतु सत्ता के केंद्रीकरण और दमन ने नई प्रकार की असमानताओं को जन्म दिया। इन घटनाओं से स्पष्ट होता है कि हिंसा व्यवस्था को गिरा सकती है, पर नई व्यवस्था के नैतिक और संस्थागत आधार स्वयं नहीं बना सकती।

 

इसके विपरीत, जहाँ परिवर्तन संवैधानिक और अहिंसक मार्गों से हुआ, वहाँ संस्थाएँ अधिक मजबूत बनीं। भारत का स्वतंत्रता आंदोलन इसका श्रेष्ठ उदाहरण है, जहाँ सत्ता परिवर्तन के साथ-साथ स्वतंत्रता सेनानियों के सपनों के भारत के साथ संविधान, लोकतांत्रिक संस्थाएँ और मौलिक अधिकारों की व्यवस्था भी स्थापित हुई। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने सामाजिक क्रांति को कानून, शिक्षा और अधिकारों से जोड़ा न कि हिंसा से। उनका विश्वास था कि बिना संस्थागत सुधार और सामाजिक चेतना के कोई भी परिवर्तन टिकाऊ नहीं हो सकता। अर्थात बदलाव सत्ता परिवर्तन से नहीं, बल्कि प्रेम और मानवीय मूल्यों से आता है।

 

पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय; ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय

 

भय से उत्पन्न परिवर्तन व्यवहार बदल सकता है, पर मूल्यों को नहीं। हिंसा भय, अविश्वास और प्रतिशोध की मानसिकता को जन्म देती है जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी संघर्ष की संस्कृति को जन्म देती है। इसके विपरीत, सृजनात्मक समाज विश्वास, सह-अस्तित्व और सहभागिता पर आधारित होता है। जाति-उन्मूलन, महिला सशक्तीकरण और मानवाधिकार जैसे क्षेत्र हिंसा से नहीं, बल्कि शिक्षा, कानून और सामाजिक आंदोलनों से आगे बढ़े हैं। मार्टिन लूथर किंग जूनियर का नागरिक अधिकार आंदोलन इस तथ्य की पुष्टि करता है कि अहिंसक प्रतिरोध समाज की चेतना को स्थायी रूप से बदलने में अधिक सक्षम होता है।

 

सतत विकास के लिए भी शांति और स्थिरता अनिवार्य शर्तें हैं। संघर्षग्रस्त समाजों में निवेश, शिक्षा और स्वास्थ्य प्रणाली प्रभावित होती है जिससे मानव पूंजी का क्षरण होता है। अफगानिस्तान, सीरिया और यमन जैसे देशों के उदाहरण दिखाते हैं कि लंबे समय तक हिंसा समाज को विकास के पथ से दशकों पीछे धकेल देती है। विश्व बैंक की रिपोर्टें बताती हैं कि हिंसाग्रस्त क्षेत्रों में गरीबी और बेरोजगारी अधिक स्थायी हो जाती है। इस प्रकार, हिंसा न केवल सामाजिक बल्कि आर्थिक भविष्य को भी खोखला कर देती है।

 



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यहां यह भी स्वीकार करना होगा कि इतिहास में कुछ परिस्थितियाँ ऐसी रही हैं जहाँ प्रतिरोध अनिवार्य हो गया जैसे- औपनिवेशिक दमन या आत्मरक्षा की स्थितियाँ। किंतु यहाँ भी निर्णायक प्रश्न यह नहीं होता कि संघर्ष हुआ या नहीं, बल्कि यह होता है कि संघर्ष के बाद किस प्रकार की व्यवस्था स्थापित की गई। यदि प्रतिरोध केवल विनाश तक सीमित रह जाए और पुनर्निर्माण की नैतिक दिशा स्पष्ट न हो, तो वह नई समस्याओं को जन्म देता है। इसीलिए केवल हिंसा को साधन मानना सामाजिक परिवर्तन का अधूरा और खतरनाक दृष्टिकोण है।

 

समकालीन विश्व में यह सत्य और अधिक स्पष्ट हो रहा है। अरब स्प्रिंग के कई देशों में सत्ता तो बदली, पर स्थिर लोकतांत्रिक संस्थाएँ स्थापित नहीं हो सकीं। यूक्रेनरूस संघर्ष, इज़राइलफिलिस्तीन संघर्ष तथा हालिया दक्षिण एशियाई राजनीतिक अस्थिरताएँ यह दिखाती हैं कि हिंसा शासन को अस्थिर करती है, राज्य की वैधता को कमजोर करती है और नई पीढ़ियों को असुरक्षा की विरासत सौंपती है। आधुनिक राजनीतिक सिद्धांत भी मानता है कि राज्य की शक्ति जनता की सहमति से आती है, न कि भय से। अतः हिंसक सत्ता-परिवर्तन दीर्घकालिक स्थिरता नहीं दे सकता।

 

सृजनात्मकता का मूल तत्व कल्पना, सहयोग और निरंतर प्रयास होता है। राज्य का उद्देश्य केवल कानून-व्यवस्था बनाए रखना नहीं, बल्कि सामाजिक विश्वास का निर्माण करना होता है। यह विश्वास बल प्रयोग से नहीं, बल्कि न्यायपूर्ण नीतियों, पारदर्शिता और समावेशी विकास से आता है। विद्यालयों का निर्माण, स्वास्थ्य ढाँचे का विकास, सामाजिक समरसता और लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्थापना आदि ये सभी दीर्घकालिक, सामूहिक और शांतिपूर्ण प्रक्रियाओं से ही संभव होते हैं। कोई भी सभ्यता तब तक स्थायी नहीं हो सकती जब तक वह संवाद और सहमति की संस्कृति विकसित न करे क्‍योंकि हिंसा इस संस्कृति का सबसे बड़ा शत्रु है।

 

निष्कर्षतः यह कथन गहरे दार्शनिक और व्यावहारिक सत्य को प्रकट करता है कि हिंसा बाधाओं को गिरा सकती है पर सृजनात्‍मक समाज का निर्माण नहीं कर सकती। विध्वंस और निर्माण की प्रक्रियाएँ स्वभाव से भिन्न होती हैं। जहाँ विध्वंस के लिए आक्रोश पर्याप्त होता है वहीं निर्माण के लिए विवेक, करुणा, धैर्य और संस्थागत सोच आवश्यक होती है। स्थायी, न्यायपूर्ण और मानवीय समाज की रचना केवल शांतिपूर्ण, संवैधानिक और नैतिक मार्गों से ही संभव है। इसलिए यदि मानवता को वास्तव में आगे बढ़ना है, तो उसे बाधाओं को तोड़ने से अधिक उन्हें सृजनात्मक रूप से पार करने की क्षमता विकसित करनी होगी।


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