GK BUCKET is best for BPSC and other competitive Exam preparation. gkbucket, bpsc prelims and mains, bpsc essay, bpsc nibandh, 71th BPSC, bpsc mains answer writing, bpsc model answer, bpsc exam ki tyari kaise kare

Jan 12, 2026

geography for bpsc mains answer writing bharat ka bhugol

Geography for BPSC mains answer writing bharat ka bhugol


Join our BPSC Mains special Telegram Group 
For more whatsapp 74704-95829 


प्रश्‍न- भारत में हिमालय और पश्चिमी घाट/नीलगिरि क्षेत्रों में भूस्खलन के स्वरूप में अंतर तथा भविष्य की चुनौतियों सहित विश्लेषण कीजिए। 8 अंक

उत्तर- सामान्‍यत: चट्टान, मलबे या मिट्टी के एक समूह के ढलान से नीचे की ओर खिसकने को भूस्‍खलन कहा जाता है। भारत में भूस्खलन का सर्वाधिक प्रभाव हिमालयी क्षेत्र में देखा जाता है, जबकि पश्चिमी घाट-नीलगिरि विवर्तनिक रूप से अपेक्षाकृत स्थिर होते हुए भी संवेदनशील हैं। दोनों क्षेत्रों में घटनाएँ समान दिखाई देती हैं परन्तु उसके स्‍वरूप, उत्प्रेरक तत्व आदि में भिन्‍नता को प्रकार देख सकते हैं:

 

हिमालय नवीन, सजीव व विवर्तनिक रूप से सक्रिय पर्वत प्रणाली है जहाँ परतदार, असंघटित व अर्ध-संघटित शैल प्रचुर हैं। तीव्र ढाल, मानसूनी वर्षा, अपक्षय और नदियों का तीव्र कटाव मलवा-धसाव को प्रेरित करते हैं। इसके अलावा सड़क निर्माण, वनों की कटाई, सुरंग परियोजनाएँ, चारधाम सड़क जैसे अवसंरचना विस्तार अस्थिरता बढ़ा रहे हैं। इसलिए यहाँ सामान्यतः भूस्खलन धीमी स्लोप मूवमेंट (mass wasting) और डेब्री फ्लो के रूप में देखे जाते हैं।

 

इसके विपरीत नीलगिरि व पश्चिमी घाट क्रिस्टलीय, कठोर आग्नेय-रूपांतरित शैलों से निर्मित हैं और पुरानी स्थिर भू-प्रणाली मानी जाती है। हांलाकि अत्यधिक खड़ी ढाल, कम समय में भारी वर्षा, तापमान उतार-चढ़ाव यांत्रिक अपक्षय तथा डायरेक्ट रॉक-फॉल की संभावना बढ़ाते हैं। जुलाई 2024 वायनाड घटना इसका ताज़ा उदाहरण है। यहाँ चाय बागान आधारित कृषि विस्तार, सड़क निर्माण, अनियंत्रित रिसॉर्ट-पर्यटन संवेदनशीलता बढ़ा रहे हैं।

 

हिमालय और पश्चिमी घाट दोनों संवेदनशील हैं परंतु भूगर्भीय प्रकृति के कारण खतरे की गतिशीलता अलग है।  हांलाकि भविष्य में जलवायु परिवर्तन के कारण अल्प अवधि में अति वर्षा (Cloud burst) दोनों क्षेत्रों में जैव विविधता संकट, जल की कमी, पलायन आदि का खतरा बढ़ाएगी जिसके समाधान के लिए ढाल की स्थिरता, भू-जोखिम मैपिंग, भूमि-उपयोग प्रतिबंध, पूर्व चेतावनी व्‍यवस्‍था, वनीकरण एवं सुरंग-सुरक्षा मानकों का कठोर अनुपालन के साथ क्षेत्र-विशिष्ट आपदा प्रबंधन रणनीति ही प्रभावी उपाय होगी।

शब्‍द संख्‍या- 267  

 


Join our BPSC Mains special Telegram Group 
For more whatsapp 74704-95829 



BPSC Mains special Notes

Whatsapp/call 74704-95829


प्रश्न- भारत में कृषि क्षेत्र में डिजिटल परिवर्तन आपदा-जोखिम प्रबंधन और सतत कृषि को कैसे सशक्त बना रहा है? उदाहरणों सहित बताएं। 8 अंक

उत्तर- भारत की कृषि जलवायु-जनित जोखिमों के प्रति अत्यधिक संवेदनशील है और बाढ़, सूखा, कीट प्रकोप तथा बाजार उतारचढ़ाव जैसे कारक फसल हानि और किसानों की आय पर सीधा प्रभाव डालते हैं। ऐसे परिदृश्य में कृषि में डिजिटल परिवर्तन की प्रक्रिया आपदा-जोखिम प्रबंधन को प्रतिक्रियात्मक व्यवस्था से पूर्व-चेतावनी आधारित प्रबंधन की ओर ले जा रहा है जो कृषि-उत्पादन और किसान सुरक्षा दोनों के लिए गेम-चेंजर साबित हो रहा है।

 

रियल-टाइम डेटा, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और उपग्रह आधारित निगरानी कृषि जोखिम को समय से पहले पहचानने की क्षमता प्रदान करते हैं। संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन ने भी सुझाव दिया है कि राहत-पश्चात नीति के बजाय पूर्वानुमान-आधारित मॉडल अपनाना ही दीर्घकालिक समाधान है। Global Information and Early Warning System इसी सोच का उदाहरण है जो चेतावनी, बाजार रुझान और मौसम जोखिम की जानकारी उपलब्ध कराता है।

 

भारत में कृषि-मौसम सलाह सेवाओं से प्रति हेक्टेयर लगभग 29.65 डॉलर तक की लागत बचत दर्ज की गई है जिससे स्पष्ट है कि डिजिटल सूचना उत्पादकता भी बढ़ाती है। प्रौद्योगिकी अपनाने हेतु भारत ने अनेक पहलें की हैं-

 

  • एआई और आईओटी आधारित Farmer e-mitra चैटबॉट, तथा National Pest Surveillance System कीट-नियंत्रण में सहायक है।
  • FASAL परियोजना उपग्रह, मौसम एवं भूमि अवलोकन द्वारा फसल पूर्वानुमान देती है।
  • Namo Drone Didi योजना और ड्रोन आधारित सटीक कृषि उर्वरक उपयोग, सिंचाई एवं कीटनाशक को अधिक कुशल बनाती है।
  • स्वामित्व योजना ड्रोन से भूमि मापन कर संपत्ति अधिकार पारदर्शी बनाती है।

 

निष्कर्षतः, डिजिटल कृषि केवल तकनीकी उन्नति नहीं बल्कि आपदा-रोधी, लाभदायक और सतत कृषि की दिशा में परिवर्तनकारी कदम है । भविष्य में जोखिमरोधी कृषि हेतु डिजिटल अवसंरचना विस्तार, बीमा दावा डिजिटलीकरण, जलवायु-स्मार्ट कृषि तकनीक आदि को प्राथमिकता देना होगी।

 

प्रश्‍न- Global Drought Outlook 2025 सूखे कोभविष्य का वैश्विक जल संकटक्यों बताती है? भारत इसके जोखिम को कैसे कम कर सकता है? 8 अंक

उत्तर- Global Drought Outlook 2025 रिपोर्ट चेतावनी देती है कि सूखा अब मौसमी घटना नहीं, बल्कि स्थायी और आवर्ती खतरा बनता जा रहा है । रिपोर्ट के अनुसार विश्व का लगभग 40% भूमि भाग लगातार सूखे जोखिम में है ।  1980 के बाद मृदा नमी में 37% कमी, भूजल में गिरावट, जल चक्र का कमजोर होना, अनियमित वर्षा, कृषि उत्पादकता में 22% तक गिरावट की आशंका भावी जल संकट का संकेत देती है।  

 

उल्‍लेखनीय है कि वैश्विक आपदा-मृत्यु में लगभग 34% सूखे का योगदान है जिससे स्पष्ट है कि इसका प्रभाव केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं बल्कि आर्थिक, स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा और प्रवासन तक जाता है। इस प्रकार यह रिपोर्ट सूखे को भविष्‍य का वैश्विक जल संकट की संज्ञा देती है।

 

भारत जैसे मानसूनी देश में इसका जोखिम अधिक है क्‍योंकि यहां वर्षा की अनिश्चितता बाढ़-सूखा एक साथ उत्पन्न करती है जिससे कृषक आय, पेयजल उपलब्धता और ऊर्जा उत्पादन प्रभावित होते हैं। बिहार में देखा जाए तो जहां उत्‍तरी बिहार जहां बाढ़ग्रस्‍त रहता है तो दक्षिण बिहार सूखा प्रभावित। अत: समाधान हेतु भारत निम्‍न उपायों के साथ जोखिम कम कर सकता है

 

  • जलवायु-संवेदनशील कृषि अपनाते हुए सूखा-रोधी बीज, कम-जल फसल-चक्र, जल दक्ष सिंचाई के साथ जल बजटिंग, भूजल दोहन नियमन, जल-भंडार क्षमता बढ़ाना जैसे समाधान अपनाना।
  • इसके साथ ही आकाशीय जल भंडारण, जल पुनर्भरण, झील-तालाब पुनर्जीवन, वनीकरण, डेझर्ट एग्रीकल्चर और ग्रामीण जल-अर्थव्यवस्था को नीति में स्थान देना होगा।
  • तकनीकी पक्ष में AI आधारित पूर्वानुमान, ड्रोन निगरानी व C-FLOOD/C-DROUGHT जैसे निर्णय प्लेटफॉर्म भविष्य की तैयारी मजबूत करेंगे।

 

निष्कर्षतः, सूखा एक पर्यावरणीय संकट नहीं बल्कि जल-आर्थिक जोखिम है और समय रहते यदि रणनीति नहीं बदली तो खाद्य सुरक्षा चुनौती बन सकती है।

No comments:

Post a Comment