प्रश्न-भारत में राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियों पर टिप्पणी लिखे।8 अंक
उत्तर -भारतीय संविधान के अनुच्छेद 72 के अंतर्गत राष्ट्रपति को क्षमादान
की शक्ति प्रदान की गई है। यह शक्ति न्यायिक कठोरता को मानवीय दृष्टिकोण से
संतुलित करने का संवैधानिक माध्यम है, जिसका उद्देश्य न्याय
के साथ करुणा और सुधार की भावना को बनाए रखना है। के प्रकार निम्न हैं
राष्ट्रपति की क्षमादान शक्तियां
क्षमा (Pardon)- इसमें दोषी व्यक्ति को सजा, दंडादेश तथा
उससे उत्पन्न सभी दुष्परिणामों से पूर्णतः मुक्त कर दिया जाता है।
लघुकरण (Commutation)- सजा की प्रकृति को बदला
जाता है, जैसे मृत्युदंड को कठोर कारावास में परिवर्तित करना।
परिहार (Remission)- सजा की प्रकृति में बदलाव
किए बिना उसकी अवधि को घटा दिया जाता है।
विराम (Respite)- विशेष परिस्थितियों, जैसे
गर्भावस्था या शारीरिक अक्षमता के आधार पर सजा में रियायत दी जाती है।
प्रविलंबन (Reprieve)- दंड के निष्पादन को कुछ समय
के लिए स्थगित करना, जैसे फाँसी को अस्थायी रूप से टालना।
क्षमादान शक्ति की संवैधानिक सीमाएँ
यद्यपि यह शक्ति व्यापक प्रतीत होती है परंतु यह पूर्णतः विवेकाधीन नहीं
है। राष्ट्रपति इसे केंद्रीय मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना प्रयोग नहीं कर सकते।
मारूराम बनाम भारत संघ (1980) और धनंजय चटर्जी बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1994)
में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि राष्ट्रपति को दया
याचिकाओं पर निर्णय मंत्रिपरिषद की सलाह के अनुसार ही करना होगा।
अनुच्छेद 74(1) के अंतर्गत राष्ट्रपति को सलाह को एक बार पुनर्विचार
हेतु लौटाने का अधिकार प्राप्त है किंतु पुनः वही सलाह भेजे जाने पर उसे स्वीकार
करना अनिवार्य होता है।
इस प्रकार, राष्ट्रपति की क्षमादान शक्ति मानवीय न्याय का संवैधानिक
उपकरण है जो लोकतांत्रिक उत्तरदायित्व और मंत्रिपरिषद की सलाह द्वारा नियंत्रित
रहती है ।
प्रश्न-“सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के सिद्धांत भारतीय
संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री की शक्ति के वास्तविक स्रोत हैं।” इस कथन की व्याख्या कीजिए। 8 अंक
उत्तर-भारतीय संसदीय व्यवस्था में प्रधानमंत्री की शक्ति केवल औपचारिक पद
से नहीं, बल्कि सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के सिद्धांतों से वास्तविक रूप
ग्रहण करती है। यद्यपि संविधान मंत्रिपरिषद को लोकसभा के प्रति उत्तरदायी ठहराता
है परंतु इस उत्तरदायित्व को व्यवहार में प्रभावी बनाने का कार्य प्रधानमंत्री
करता है। इसी कारण उसे शासन-तंत्र की धुरी माना जाता है । इसे निम्न प्रकार समझ
सकते हैं
सामूहिक उत्तरदायित्व का सिद्धांत
अनुच्छेद 75 के अनुसार मंत्रिपरिषद लोकसभा के प्रति सामूहिक रूप से
उत्तरदायी होती है और मंत्रिमंडल के निर्णय सभी मंत्रियों पर बाध्यकारी होते हैं।
भले ही किसी मंत्री ने निर्णय का विरोध किया हो उसे सार्वजनिक रूप से उसका समर्थन
करना होता है। असहमति की स्थिति में त्यागपत्र देना अपेक्षित है।
इस प्रकार यह व्यवस्था मंत्रिपरिषद को एक इकाई के रूप में कार्य करने के
लिए बाध्य करती है जिसका केन्द्र प्रधानमंत्री होते हैं।
व्यक्तिगत उत्तरदायित्व का सिद्धांत
यह प्रधानमंत्री की स्थिति को और सुदृढ़ करता है। मंत्री राष्ट्रपति के
प्रसादपर्यंत पद पर रहते हैं किंतु राष्ट्रपति किसी मंत्री को केवल प्रधानमंत्री
की सलाह पर ही हटाता है। इससे मंत्रियों का कार्यकाल और राजनीतिक भविष्य
प्रधानमंत्री के नेतृत्व और विश्वास से जुड़ जाता है।
डॉ. बी. आर. अंबेडकर ने कहा था कि जब तक प्रधानमंत्री को मंत्रियों को
नियुक्त और बर्खास्त करने की शक्ति नहीं दी जाती, तब तक सामूहिक उत्तरदायित्व
व्यवहार में संभव नहीं हो सकता।
इस प्रकार सामूहिक और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के सिद्धांत प्रधानमंत्री को
मंत्रिपरिषद के समन्वयक से आगे बढ़ाकर शासन की वास्तविक शक्ति का केंद्र बना देते
हैं। इसी कारण भारतीय संसदीय व्यवस्था को व्यवहार में ‘प्रधानमंत्री
सरकार’ के रूप में देखा जाता है।
शब्द संख्या-270
2 प्रश्न: दल-बदल विरोधी कानून
अपने उद्देश्य की पूर्ति किस हद तक करता है? विश्लेषण कीजिए। 38 अंक
उत्तर- दल-बदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य दलीय निष्ठा, राजनीतिक
स्थिरता और जनादेश की रक्षा करते हुए “खरीद-फरोख्त आधारित
राजनीति” को रोकना था लेकिन कानून लागू होने के चार दशक बाद
यह कानून स्वयं राजनीतिक हेरफेर का साधन बनता दिखता है जिसे निम्न प्रकार समझ
सकते हैं: -
अध्यक्ष की भूमिका एवं निष्पक्षता पर प्रश्न
दसवीं अनुसूची के तहत दलबदल
मामले में अंतिम निर्णय का अधिकार अध्यक्ष/सभापति को दिया गया है, जबकि वे
स्वयं किसी दल से आते हैं। यही कारण है कि किहोटो होलोहन (1992) ने इनके निर्णय को न्यायिक समीक्षा योग्य माना।
निर्णय में देरी से कानून की अप्रभाविता
कई मामलों में स्पीकर द्वारा
महीनों-सालों तक अयोग्यता याचिकाएँ लंबित रखने से दल बदल कानून की प्रभावशीलता
कमजोर हुई है जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 2025 के पाडी कौशिक रेड्डी केस में
“ऑपरेशन सफल, लेकिन मरीज मर गया” कहा। कई राज्यों में सरकारें गिर गईं, नए गठबंधन बन
गए और अध्यक्ष ने वर्षों तक अयोग्यता याचिकाओं को लंबित रखा।
सामूहिक दल-बदल का वैध रास्ता
यह कानून “व्यक्ति-आधारित
दल-बदल” को तो रोकता है लेकिन “समूह
आधारित दलबदल” यानी दो-तिहाई के सामूहिक विलय को वैध मान
लेता है। परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर दलबदल का रास्ता खुला रहता है, जैसा महाराष्ट्र (2022) और कर्नाटक (2019) में देखा गया।
व्हिप व्यवस्था एवं दलीय अनुशासन
व्हिप व्यवस्था भी आलोचना के
केंद्र में है, क्योंकि यह विधायकों को विवेक से वंचित कर “दलीय
तानाशाही” पैदा करती है। इससे विधायी स्वतंत्रता सीमित होती
है और सांसद/विधायक पार्टी-उच्च कमान के आदेशों तक सिमट जाते हैं।
इस कानून में सुधार की दिशा में पाडी कौशिक रेड्डी केस (2025) में
सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार अध्यक्ष की निष्क्रियता को लोकतांत्रिक नैतिकता के
विरुद्ध बताते हुए समय-सीमा तय की तीन माह के भीतर निर्णय अनिवार्य बताया आर सुझाव
दिया कि अध्यक्ष की जगह स्वतंत्र न्यायाधिकरण अयोग्यता तय करे । न्यायालय का
सुझाव संकेत है कि वर्तमान संरचना कानून के उद्देश्य को कमजोर कर रही है।
समग्रतः, कानून का उद्देश्य लोकतंत्र और जनादेश की रक्षा था पर
वर्तमान व्यवस्था में यह न तो खरीद-फरोख्त रोक पा रहा है और न राजनीतिक स्थिरता
सुनिश्चित कर पा रहा है। न्यायपालिका ने अपने निर्णयों में सुधारों की दिशा में ठोस
संकेत दिए हैं पर स्थायी समाधान तभी होगा जब स्वतंत्र अधिकरण, समयबद्ध प्रक्रिया और व्हिप-व्यवस्था में सुधार लागू हों।
शब्द संख्या-375
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