GK BUCKET is best for BPSC and other competitive Exam preparation. gkbucket, bpsc prelims and mains, bpsc essay, bpsc nibandh, 71th BPSC, bpsc mains answer writing, bpsc model answer, bpsc exam ki tyari kaise kare

Jan 8, 2026

Bihar special mains Question answer for BPSC mains examination

Bihar special mains Question answer for BPSC mains examination



प्रश्न -भारत में कृषि क्षेत्र ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन के महत्त्वपूर्ण स्रोत के रूप में उभर रहा है। चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट के संदर्भ में कृषि-उत्सर्जन की प्रकृति तथा शमन रणनीतियों की समीक्षा कीजिए। 8 अंक 

उत्तर- भारत की चौथी द्विवार्षिक अद्यतन रिपोर्ट दर्शाती है कि ऊर्जा क्षेत्र के बाद कृषि, ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का दूसरा प्रमुख क्षेत्र है। धान की खेती में जलभराव के कारण मीथेन उत्सर्जन और नाइट्रोजन-आधारित उर्वरकों से नाइट्रस ऑक्साइड उत्सर्जन कृषि क्षेत्र के मुख्य कारण हैं वहीं पशुपालन से रूमिनेंट गैस उत्सर्जन तथा जैविक कचरे का विघटन भी उत्सर्जन भार बढ़ाते हैं।


भारत के कृषि ढांचे में छोटे और सीमांत किसानों की प्रधानता, सिंचाई आधारित फसल चक्र और न्यूनतम समर्थन मूल्य नीतियाँ अत्यधिक जल और उर्वरक आधारित उत्पादन प्रणाली को बढ़ावा देती हैं। हांलाकि शमन के क्षेत्र में भारत ने कई नीतियाँ अपनाई हैं जो अप्रत्यक्ष रूप से कृषि-चालित उत्सर्जन कम करने में भूमिका निभाती हैं जैसे -


  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन
  • ग्रीन क्रेडिट कार्यक्रम
  • प्रतिपूरक वनरोपण
  • मिट्टी स्वास्थ्य कार्ड योजना,

इसके अलाव तकनीकी हस्तक्षेप जैसे-जैव उर्वरक, नैनो यूरिया, सटीक सिंचाई, फसल चक्रण, कृषि-वानिकी और कम जुताई पद्धति उत्सर्जन घटाने में प्रभावी हैं।

 

उपरोक्‍त प्रयासों के बावजूद बड़े पैमाने पर किसानों के लिये वैकल्पिक फसल मॉडल विकसित करना, धान से मोटे अनाज की ओर संक्रमण, जल दोहन में कमी, तथा पराली प्रबंधन जैसे परिवर्तन की आवश्यकता है जिससे कृषि क्षेत्र को कम-कार्बन मार्ग पर ला सकते हैं।

 

निष्कर्षतः, कृषि-उत्सर्जन भारत के जलवायु जोखिम को बढ़ाते हैं, परंतु यदि नीति परिवर्तन, तकनीकी नवाचार और समुदाय भागीदारी संयुक्त रूप से आगे बढ़े, तो यह क्षेत्र उत्सर्जन घटाने के साथ-साथ खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा को भी मजबूत कर सकता है।

 

प्रश्न - कृषि-आधारित नीतियाँ भारत में भूजल दोहन को किस प्रकार बढ़ावा देती हैं? उदाहरण सहित समझाइए।

उत्तर – भारत कृषि प्रधान देश है और भारत में भूजल संकट का सबसे बड़ा कारण कृषि-आधारित नीतिगत ढाँचा है। उल्‍लेखनीय है कि भारत में कुल भूजल उपयोग का लगभग 87% हिस्सा कृषि में सिंचाई में जाता है और कृषि आधारित नीतियां दोहन को अनियंत्रित बनाता है जिसे निम्‍न प्रकार देख सकते हैं

 

बिजली सब्सिडी

  • सब्सिडी या निशुल्क बिजली किसानों को असीमित भूजल पंपिंग के लिए प्रेरित करती है, जिससे दोहन बढ़ता है।
  • अध्ययनों के अनुसार बिजली लागत में 10% वृद्धि से भूजल दोहन लगभग 1.8% घट सकता है, जिससे स्पष्ट है कि बिजली सब्सिडी जल-संकट का प्रमुख कारण है।

 

MSP नीति और जल-गहन फसलें

  • MSP आधारित खरीद से पंजाबहरियाणा जैसे शुष्क क्षेत्रों में धान व गन्ने जैसी जल-गहन फसलें लाभकारी बन जाती हैं। धान उत्पादन में प्रति किलोग्राम 4,000–5,000 लीटर पानी लगता है, जो पुनर्भरण क्षमता से अधिक है।
  • भूजल के अत्यधिक दोहन से सिंधुगंगा क्षेत्र के सैकड़ों ब्लॉकअतिदोहनश्रेणी में आ गए हैं। साथ ही शहरी क्षेत्रों में आधुनिक पंपिंग, कंक्रीटीकरण और बढ़ती मांग भूजल स्तर को और नीचे धकेल रही है।

 

इस प्रकार कृषि-नीतियाँ जाने-अनजाने में भूजल को आर्थिक रूप सेमुफ्त संसाधनबनाती हैं जिससे भूजल दोहन बढ़ता है। यह नीतिगत प्रोत्साहन संरचना पानी की उपलब्धता नहीं, बल्कि उपयोग व्यवहार को प्रभावित करता है और यही भूजल संकट की जड़ है।

 

 

प्रश्न : भारत में प्रवासी श्रमिकों की आर्थिक भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। साथ ही उनके सामने मौजूद प्रमुख कठिनाइयों को स्पष्ट कीजिए। 8 अंक 

उत्तर : भारतीय अर्थव्यवस्था में प्रवासी श्रमिकों की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण है। कृषि, निर्माण, कपड़ा, परिवहन, घरेलू कार्य और लघु उद्योग जैसे क्षेत्रों में प्रवासी श्रमिक श्रम-आधारित विकास को गति देते हैं ।

 

  • मौसमी और अस्थायी प्रवासी श्रमिक राष्ट्रीय सकल घरेलू उत्पाद में लगभग 10% योगदान देते हैं। उनके द्वारा भेजी गई धनराशि से ग्रामीण परिवारों के जीवन में शिक्षा, आवास, स्वास्थ्य और उद्यमिता के अवसर बढ़ते हैं। शहरों में भी प्रवासी श्रमिकों की उपलब्धता से उत्पादकता बढ़ती है और शहरी आर्थिक विस्तार होता है।

  • इस प्रकार प्रवासी श्रमिक आर्थिक प्रगति को मजबूत करते हैं हांलाकि उनके समक्ष अस्थिर आय, कठोर कार्य दशाएं एवं शर्तें, कार्य असंगठित क्षेत्र पर आधारित होना, सामाजिक सुरक्षा का अभाव जैसी अनेक कठिनाइयां भी होती है। कोविड-19 के दौरान 1.14 करोड़ से अधिक प्रवासी श्रमिकों का पैदल पलायन इस संरचनात्मक कमजोरी को उजागर करता है।

  • इसके अलावा आवास और जीवन स्थितियाँ खराब होना, साफ पानी, शौचालय और स्वास्थ्य सेवाओं की कमी का सामना भी करते हैं। वे भाषा और पहचान के आधार पर महाराष्ट्र,पंजाब, असम जैसे राज्‍यों भेदभाव का सामना करते हैं।

 

हांलाकि इनकी समस्‍याओं को देखते हुए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं जैसे प्रधान मंत्री गरीब कल्याण योजना, आयुष्मान भारत प्रधान मंत्री जन आरोग्य योजना, प्रधान मंत्री श्रम योगी मान-धन योजना, ई-श्रम पोर्टल और एक राष्ट्र एक राशन कार्ड चलायी जा रही है जिससे स्थिति थोड़ी बेहतर हुई है परंतु जमीन स्‍तर पर क्रियान्‍वयन अभी भी सीमित है।


कुल मिलाकर, प्रवासी श्रमिक भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं, परंतु उनकी सुरक्षा और गरिमा सुनिश्चित करना विकास मॉडल की अनिवार्य शर्त है।


प्रश्न- बिहार में शहरीकरण की वर्तमान स्थिति का विश्लेषण कीजिए। यह राष्ट्रीय औसत से भिन्न क्यों है? 8 अंक 

उत्तर- बिहार में तीव्र जनसंख्या वृद्धि और ग्रामीण–शहरी प्रवासन ने शहरीकरण की प्रक्रिया को तेज किया है, परंतु राज्य का शहरीकरण स्तर अब भी राष्ट्रीय औसत की तुलना में उल्लेखनीय रूप से कम है। बिहार में शहरीकरण की ‍स्थिति देखा जाए तो-

 

बिहार में शहरीकरण की स्थिति

  • 2011 की जनगणना में बिहार की केवल 11.3% आबादी शहरी थी, जो बढ़कर वर्तमान में 15.40% हो गई है। इसके विपरीत, भारत का शहरीकरण स्तर लगभग 36.87% है, जो बिहार की तुलना में दुगने से से अधिक है।

शहरी निकायों का विस्तार

  • बढ़ती शहरी जरूरतों को देखते हुए राज्य में नगरपालिकाओं का तेजी से विस्तार हुआ है। वर्तमान में बिहार में 19 नगर निगम, 88 नगर परिषद और 154 नगर पंचायतें हैं। वर्ष 2021–2024 के पुनर्गठन के दौरान बड़ी संख्या में ग्राम पंचायतों को शहरी निकायों में शामिल किया गया, जिससे शहरी आबादी में लगभग 3.85 लाख की वृद्धि हुई।

 

प्रमुख शहरी केंद्र

  • शहरी विस्तार का मुख्य केंद्र पटना है, जहाँ 44.3% आबादी शहरी है और राज्य की कुल शहरी आबादी का लगभग पाँचवां हिस्सा यहीं निवास करता है। इसके अलावा मुंगेर, नालंदा, गया, मुजफ्फरपुर और भागलपुर उभरते शहरी केंद्र के रूप में विकसित हो रहे हैं।

 

बिहार का शहरीकरण राष्ट्रीय औसत से पीछे रहने का मुख्य कारण औद्योगिक आधार की कमी, सीमित आर्थिक विकल्प, सेवाक्षेत्र की धीमी प्रगति और नगरीय अवसंरचना का कमजोर विकास है। साथ ही प्रवासन अधिकतर अन्य राज्यों की ओर होता है, जिससे शहरी जनसंख्या वृद्धि धीमी रहती है। इस प्रकार, बिहार में शहरीकरण आगे बढ़ रहा है, परंतु इसकी गति राष्ट्रीय औसत से अभी काफी पीछे है।


प्रश्न- बिहार में संतुलित एवं नियोजित शहरीकरण सुनिश्चित करने हेतु आवश्यक रणनीतिक उपाय सुझाइए। 8 अंक 

उत्तर- बिहार में तेजी से बढ़ते शहरीकरण को टिकाऊ और संतुलित बनाने के लिए समग्र, चरणबद्ध और आधुनिक तकनीक आधारित शहरी नीति अपनाने की आवश्‍यकता है जिसे निम्‍न प्रकार समझ सकते हैं

 

नियोजित शहरी विकास

  • अनियोजित बसावट रोकने हेतु मास्टर प्लान आधारित विकास लागू करना आवश्यक है। स्मार्ट सिटी परियोजनाओं का समयबद्ध क्रियान्वयन शहरी अवसंरचना को गति देगा।

 

शहरी भार का विकेंद्रीकरण

  • पटना पर बढ़ते दबाव को कम करने के लिए गया, मुजफ्फरपुर और भागलपुर जैसे मध्यम शहरों को क्षेत्रीय विकास केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए। छोटे जिलों में स्वास्थ्य, शिक्षा और औद्योगिक सेवाओं का विकेंद्रीकरण क्षेत्रीय असमानता घटाएगा।

 

रोजगार व आवास विस्तार

  • औद्योगिक क्लस्टर, आर्थिक कॉरिडोर और नए उपनगर रोजगार सृजन में सहायक होंगे। किफायती आवास, अतिक्रमण प्रबंधन और नियोजित भूमि-उपयोग शहरी मजबूती बढ़ाएंगे।

 

परिवहन व पर्यावरण सुधार

  • शहरी परिवहन नेटवर्क का विस्तार करते हुए  मेट्रो, इलेक्ट्रिक बसें, एकीकृत ग्रामीणशहरी परिवहन आवश्यक हैं। जलनिकासी, वर्षा जल संरक्षण, ठोस अपशिष्ट प्रबंधन और हरित क्षेत्रों का विस्तार शहरी पर्यावरण सुधारेगा।

 

सुशासन व वित्तीय सशक्तिकरण

  • नगर निकायों की वित्तीय क्षमता बढ़ाने, राजस्व सुधार और नागरिक सहभागिता से शहरी अनुशासन व सतत विकास सुनिश्चित किया जा सकता है।

 

इस प्रकार, बिहार का भविष्यगत शहरी विकास तभी सफल होगा जब नियोजन, अवसंरचना और प्रशासनिक क्षमता को समानांतर रूप से मजबूत किया जाए।

No comments:

Post a Comment