"सोने के कुदारी माटी कोड़े के हअ"
मानव समाज में वस्तुओं और व्यक्तियों
का मूल्य प्रायः उनके बाहरी आडंबर, कीमत या प्रतिष्ठा से आँका
जाता है। सोना, राजसत्ता, पद, डिग्री या प्रसिद्धि ये सभी ऐसे प्रतीक हैं जो समाज में ऊँचाई और
विशिष्टता का बोध कराते हैं। किंतु बिहार में क्षेत्रीय रूप में प्रचालित कहावत
“सोने की कुदारी माटी कोड़े के हअ” ऐसी ही एक कहावत है जो इस सतही मूल्यांकन को
गहरी चुनौती देती है। यह कहावत स्पष्ट करती है कि किसी वस्तु या व्यक्ति का
वास्तविक मूल्य उसके उपयोग, कर्तव्य और प्रयोजन से निर्धारित
होता है, न कि उसकी चमक या कीमत से। चाहे कुदाल सोने की हो
या लोहे की उसका कार्य मिट्टी खोदना ही है,
अर्थात् मूल्य का अंतिम निर्धारण उपयोगिता और दायित्व-निर्वहन से होता
है, न कि बाह्य वैभव से।
भारतीय दर्शन में कर्म को ही जीवन की
सार्थकता का आधार माना गया है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं -
“कर्मण्येवाधिकारस्ते”,
अर्थात मनुष्य का अधिकार कर्म पर है, फल या
दिखावे पर नहीं। इसी भाव में यह कहावत कहती है कि व्यक्ति चाहे कितना ही महान,
संपन्न या शक्तिशाली क्यों न हो
यदि वह अपने कर्तव्य से विमुख है, तो उसकी महत्ता
अर्थहीन हो जाती है। साधन का मूल्य तभी है, जब वह साध्य की
पूर्ति करे। यदि साधन ही साध्य बन जाए, तो जीवन दिशाहीन हो
जाता है। सोने की कुदाल यदि मिट्टी न खोद सके, तो वह केवल
प्रदर्शन की वस्तु रह जाएगी। यह कहावत साधन और साध्य के संबंध को स्पष्ट करती है।
हमारे समाज में अनेक पद, संस्थाएँ
और भूमिकाएँ हैं जैसे शिक्षक, प्रशासक, नेता, चिकित्सक,
श्रमिक। इन सभी की सामाजिक प्रतिष्ठा अलग-अलग हो सकती है किंतु उनके
मूल्य का निर्धारण उनके योगदान से होता है। एक साधारण श्रमिक यदि ईमानदारी से अपना
कार्य करता है तो वह समाज के लिए उतना ही उपयोगी है जितना कोई उच्च पदस्थ अधिकारी।
महात्मा गांधी का जीवन इसका सशक्त उदाहरण है। उन्होंने सादा जीवन अपनाया, न कोई भौतिक वैभव, न पद की लालसा फिर भी उनका योगदान
भारत और विश्व के लिए अमूल्य सिद्ध हुआ। गांधीजी स्वयं कहते थे “मनुष्य की महानता उसके काम से आँकी जाती है,
न कि उसके साधनों से।” यह कथन इस कहावत के भाव को और पुष्ट करता है।
आधुनिक युग में यह कहावत उपभोगवादी
मानसिकता पर भी तीखा प्रहार करती है जब वस्तुओं की कीमत, ब्रांड
और विलासिता को गुणवत्ता का पर्याय मान लिया गया है। महँगी वस्तु को श्रेष्ठ और
साधारण वस्तु को तुच्छ समझने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। किंतु व्यवहारिक सत्य यह है
कि कार्यक्षमता और उपयोगिता ही वास्तविक कसौटी है। एक महँगा उपकरण यदि अपने
उद्देश्य में असफल है, तो उसका मूल्य शून्य है जबकि वहीं एक
साधारण साधन यदि कार्य सिद्ध करता है तो वही श्रेष्ठ है। अमर्त्य सेन के अनुसार
“विकास का अर्थ संसाधनों का संचय नहीं, बल्कि मानव क्षमताओं
का विस्तार है।” यदि संसाधन मानव कल्याण के काम नहीं आ रहे, तो
उनका मूल्य केवल आँकड़ों तक सीमित रह जाता है।
प्रशासनिक और राजनीतिक संदर्भ में यह
कहावत अत्यंत प्रासंगिक हो जाती है। लोकतंत्र में पद को सेवा का माध्यम माना गया
है, न कि विशेषाधिकार का। एक मंत्री, अधिकारी या
जनप्रतिनिधि यदि केवल पद की गरिमा में उलझा रहे और जनसेवा न करे, तो उसकी उपयोगिता समाप्त हो जाती है। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने स्पष्ट कहा था
“संविधान केवल शासन का दस्तावेज़ नहीं,
बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व का साधन है।” इसका अर्थ यही है कि पद और
शक्ति तभी सार्थक हैं, जब वे समाज के हित में प्रयुक्त हों।
सोने की कुदाल यदि मिट्टी न खोदे, तो वह किसान के लिए बोझ बन
जाती है।
आर्थिक दृष्टि से भी यह कहावत श्रम
और उत्पादन के महत्व को रेखांकित करती है। पूँजी, तकनीक और संसाधन तभी
मूल्यवान हैं, जब वे उत्पादन और मानव कल्याण में सहायक हों।
केवल धन-संचय, बिना सामाजिक उपयोग के, अर्थव्यवस्था
को खोखला बना देता है। कार्ल मार्क्स ने कहा था कि श्रम ही मूल्य का वास्तविक
स्रोत है। यह विचार इस कहावत से मेल खाता है कि साधन कितना भी कीमती हो, यदि वह श्रम और उत्पादन में सहायक नहीं, तो उसका
महत्व सीमित है।
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व्यक्तिगत जीवन में भी यह कहावत
आत्ममूल्यांकन का अवसर प्रदान करती है। आज डिग्रियों, संस्थानों
और रैंकिंग को सफलता का पर्याय बना दिया गया है और व्यक्ति प्रायः अपनी डिग्री,
पद या संपत्ति पर गर्व करता है, किंतु यदि वह
अपने परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति उत्तरदायित्व नहीं
निभा रहा, तो उसका मूल्य अधूरा है। वास्तविक शिक्षा वही है
जो व्यक्ति को समस्या-समाधान, नैतिकता और समाजोपयोगी बनाती
है। यदि उच्च शिक्षा प्राप्त व्यक्ति समाज के प्रति असंवेदनशील है, तो उसकी शिक्षा निष्फल हो जाती है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था “शिक्षा वह है जो जीवन-निर्माण करे।” यही बात
इस कहावत के भाव में निहित है जिसके अनुसार मूल्य प्रदर्शन में नहीं, प्रयोजन में है।
यह ध्यान देने योग्य है कि यह कहावत
भौतिक साधनों के महत्व को नकारती नहीं, बल्कि उन्हें उनके उचित
स्थान पर रखती है। सोने की कुदाल मिट्टी खोद सकती है अर्थात् कीमती साधन भी उपयोगी
हैं परंतु उनका उद्देश्य वही है जो साधारण साधनों का है। अतः साधनों का मूल्य तभी
है जब वे अपने प्रयोजन को दक्षता और नैतिकता से पूरा करें।
निष्कर्षतः, “सोने
के कुदारी माटी कोड़े के हअ” जीवन का एक गहन यथार्थ प्रस्तुत करती है कि मूल्य
प्रदर्शन में नहीं, प्रयोजन में है। चाहे व्यक्ति हो या
संस्था, साधन हो या सत्ता सबका वास्तविक महत्व उनके कर्म,
उपयोगिता और सामाजिक योगदान से निर्धारित होता है। यह कहावत हमें
विनम्रता, कर्तव्यनिष्ठा और यथार्थबोध सिखाती है। व्यक्ति,
पद, वस्तु या सत्ता सभी तभी तक सार्थक हैं, जब
तक वे अपने प्रयोजन को पूरा करते हैं। अंततः, जीवन में सच्ची
महानता वही है जो अपने दायित्व को ईमानदारी से निभाए चाहे वह लोहे की कुदाल हो या सोने की।


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