BPSC mains answer writing and model answer
BPSC Mains Daily answer writing programme से जुड़ सकते हैं
Whatsapp 74704-95829
प्रश्न-भारत
में बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था के संदर्भ में निजता के अधिकार और डेटा संरक्षण की
आवश्यकता का मूल्यांकन करें। डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम, 2023 इस दिशा में किस प्रकार
सहायक है?
8 Marks
उत्तर- भारत में
इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की संख्या 80 करोड़ से अधिक हो चुकी है, जिससे डिजिटल भुगतान, ई-गवर्नेंस और ऑनलाइन सेवाएँ तेजी से बढ़ी हैं।
लेकिन इसी वृद्धि के साथ डेटा लीक,
साइबर धोखाधड़ी और निगरानी, निजता उल्लंघन जैसे जोखिम भी बढ़े हैं। IBM 2025
रिपोर्ट के अनुसार भारत में एक डेटा लीक की औसत लागत 220 करोड़ रुपए तक पहुँच गई
है जो बताती है कि डेटा सुरक्षा केवल तकनीकी ही नहीं बल्कि आर्थिक और राष्ट्रीय
सुरक्षा का मुद्दा है।
भारत में निजता अधिकार
का विकास न्यायिक प्रक्रियाओं से आरंभ हुआ जिनमें के.एस. पुट्टस्वामी केस (2017)
ने निजता को मौलिक अधिकार माना वहीं जबकि जोरावर सिंह मुंडी (2021) व कर्मण्य सिंह
सरीन (2016) फैसलों ने भुलाए जाने का अधिकार और सहमति वापसी के सिद्धांत को मजबूत
किया।
इसी क्रम में डिजिटल
पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन अधिनियम,
2023 पारित हुआ। यह कानून नागरिकों
को डेटा पर अधिकार देता है तथा कंपनियों यानी डेटा फिड्युशियरी पर स्पष्ट दायित्व
निर्धारित करता है। इसके तहत डेटा उपयोग से पहले स्पष्ट सहमति, न्यूनतम डेटा संग्रह और उल्लंघन पर दंड का प्रावधान किया गया है। साथ ही
भारतीय डेटा प्रोटेक्शन बोर्ड स्थापित करने का प्रावधान है जो डेटा उल्लंघन मामलों
की सुनवाई करेगा।
डेटा संरक्षण कानून
2023 डिजिटल भारत के लिए मील का पत्थर है जो सुरक्षित, पारदर्शी
और नागरिक-केंद्रित डिजिटल भविष्य की ओर मार्ग प्रशस्त करता है। हालाँकि कृत्रिम
बुद्धिमत्ता और बड़े डेटा विश्लेषण के युग में एल्गोरिदमिक भेदभाव व निगरानी नई
चुनौतियाँ हैं। इसलिए मजबूत साइबर सुरक्षा ढाँचा, स्वतंत्र
डेटा नियामक और नागरिकों की डिजिटल जागरूकता भी उतनी ही आवश्यक है।
शब्द संख्या-256
प्रश्न
-भारतीय संविधान किस प्रकार लोक कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को स्थापित करता है? इसकी विशेषताएँ, संवैधानिक व्यवस्थाएँ तथा
आलोचनाओं सहित चर्चा कीजिए। 8 Marks
उत्तर- भारतीय संविधान
का भाग- IV (अनुच्छेद 36-51) राज्य के नीति निर्देशक तत्वों
के द्वारा स्पष्ट दर्शाता है कि भारत का स्वरूप एक लोक कल्याणकारी राज्य का है
जिसका उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं बल्कि नागरिकों के सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक जीवन स्तर को उन्नत बनाना है। एक कल्याणकारी राज्य की
विशेषताओं को निम्न प्रकार देख सकते हैं
- सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक न्याय की स्थापना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य, सुरक्षा एवं सार्वजनिक सुविधाओं की उपलब्धता।
- समान अवसर, आय व संपत्ति वितरण का प्रयास।
- धर्म, जाति, लिंग भेदभाव के बिना समान व्यवहार।
- कृषि, उद्योग और बाजार के नियमन की ज़िम्मेदारी राज्य पर।
भारत में संविधान
प्रावधानों और शासन व्यवस्था में कल्याणकारी राज्य की विशेषताओं को विशेष स्थान
दिया है जिसमें प्रमुख निम्नानुसार हैं-
- प्रस्तावना न्याय, समानता, स्वतंत्रता व बंधुत्व की दिशा निर्धारित करती है।
- मौलिक अधिकार (भाग-3) अनुच्छेद 14-18 समानता, 21A शिक्षा, 23-24 शोषण निषेध।
- राज्य के नीति निर्देशक तत्व (भाग-4) समान वेतन, श्रमिक भागीदारी, मातृत्व सहायता, पूर्व बाल्यकाल देखभाल, कुटीर उद्योग, सामाजिक सुरक्षा को प्रोत्साहन।
- कल्याणकारी योजनाएँ- मनरेगा, वृद्धा पेंशन, छात्रवृत्ति, राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017, कोविड-काल में सहायताएँ।
इस प्रकार भारत में
कल्याणकारी राज्य की अवधारणा को स्थापित किया गया है हांलाकि इसके साथ राज्य की
भूमिका अत्यधिक बढ़ना, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर संभावित नियंत्रण, लोक कल्याण योजनाओं से वित्तीय भार जैसी चुनौतियां भी है। फिर भी सरकार की
कल्याणकारी योजनाओं, कोरोना महामारी के दौरान राहत योजनाओं ने सिद्ध
किया कि भारत अपने कल्याणकारी चरित्र से विचलित नहीं हुआ। संविधान के प्रावधानों व
राज्य की नीतियाँ मिलकर आज भी भारत को एक सशक्त लोक कल्याणकारी राज्य के रूप में
आगे बढ़ा रही हैं।
Join our BPSC Mains special Telegram Group
For more whatsapp 74704-95829
BPSC Mains special Notes
प्रश्न
-भारतीय संविधान के नीति निदेशक तत्वों की प्रकृति एवं महत्व स्पष्ट कीजिए। साथ ही
संतुलित आर्थिक–सामाजिक विकास में इनके योगदान का विश्लेषण कीजिए। 38 अंक
उत्तर -भारतीय संविधान
के भाग-4 (अनुच्छेद 36-51) में राज्य के नीति निदेशक तत्व शामिल हैं, जिनका उद्देश्य शासन को ऐसे सिद्धांत प्रदान करना है जिनके आधार पर
सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक न्याय पर आधारित कल्याणकारी राज्य
की स्थापना हो सके।
डॉ. भीमराव अम्बेडकर
ने नीति निदेशक तत्वों को “भारतीय संविधान की अनोखी विशेषता” कहा है। यद्यपि ये
न्यायालय में प्रत्यक्ष रूप से लागू नहीं करवाए जा सकते पर अनुच्छेद 37 के अनुसार
इन सिद्धांतों को नीति निर्माण में लागू करना राज्य का कर्तव्य है। इन तत्वों में
व्यापक क्षेत्र शामिल है जैसे-
- अनुच्छेद 38 न्यायपूर्ण सामाजिक व्यवस्था
- अनुच्छेद 39 समान आजीविका व संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण
- अनुच्छेद 40 ग्राम पंचायतों की स्थापना
- अनुच्छेद 41 सामाजिक सुरक्षा
- अनुच्छेद 42 श्रमिक-कल्याण व प्रसूति सहायता
- अनुच्छेद 45 निःशुल्क शिक्षा
- अनुच्छेद 46 SC/ST कल्याण
- अनुच्छेद 47 पोषण व स्वास्थ्य सुधार
- अनुच्छेद 48 कृषि–पशुपालन विकास
- अनुच्छेद 48A पर्यावरण संरक्षण
- अनुच्छेद 50 न्यायपालिका-कार्यपालिका पृथक्करण
- अनुच्छेद 51 अंतरराष्ट्रीय शांति
संविधान के विभिन्न
अनुच्छेदों में शामिल नीति निदेश तत्वों का विशेष महत्व है क्योंकि
- यह शासन के लिए नीति-सूत्र एवं नैतिक मार्गदर्शन का कार्य करते हैं जैसे-
- भारत को कल्याणकारी राज्य बनाने का आधार हैं।
- सरकार की कार्य-प्रणाली को दिशा देते हैं।
- मौलिक अधिकारों के पूरक बनकर सामाजिक व आर्थिक रिक्तता भरते हैं।
- योजनाओं व कानूनों की आधारशिला हैं जैसे मनरेगा, खाद्य सुरक्षा कानून, शराबबंदी नीतियाँ, श्रम कानून, अधिकार आधारित शिक्षा, पंचायती राज व्यवस्था।
- न्यायपालिका संवैधानिक व्याख्या में इन्हें मार्गदर्शक मानती है।
नीति निदेश तत्वों ने
भारत में भूमि सुधार, कुटीर उद्योग प्रोत्साहन, श्रमिक अधिकार, SC/ST उत्थान, अनिवार्य
शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण सुधार, स्थानीय
स्वशासन, तथा कल्याणकारी योजनाओं के विस्तार को दिशा दी। ग्रामीण
विकास, सामाजिक सुरक्षा, महिला-कल्याण, पर्यावरण संरक्षण जैसे क्षेत्र इसी की देन हैं। इस प्रकार नीति निदेशक तत्व
देश की शासन व्यवस्था एवं नागरिकों के आर्थिक–सामाजिक विकास में योगदान योगदान
देते हैं।
निष्कर्षत: नीति
निदेशक तत्व बाध्यकारी न होकर राज्य के लिए आदर्श लक्ष्यों का रूप हैं। ये भारत को
केवल राजनीतिक लोकतंत्र नहीं, बल्कि आर्थिक व सामाजिक लोकतंत्र की ओर ले जाते
हैं। DPSP ही वह आधार हैं, जिनसे
प्रेरित होकर भारत एक समानता-आधारित, न्यायपूर्ण और मानव-केंद्रित
राज्य की दिशा में बढ़ रहा है।


No comments:
Post a Comment