“मुरुगा
ना रही त बिहाने नाहीं होई।”
एक नदी सूख
जाए तो समंदर नहीं रोता,
एक दीप बुझ
जाए तो उजाला नहीं खोता,
जीवन की गति, प्रकृति
का प्रवाह और समाज की व्यवस्था आदि सबकी नियति सतत रूप में निरंतर आगे बढ़ना है जो
किसी एक व्यक्ति की उपस्थिति या
अनुपस्थिति पर नहीं रुकती। लोक कहावत “मुरुगा ना रही त बिहाने नाहीं होई” इसी सत्य
को बड़े सहज किंतु गहन अर्थों में व्यक्त करती है । प्रथम दृष्टि में यह एक
सामान्य ग्रामीण वाक्य जैसा प्रतीत होता है जिसका शाब्दिक अर्थ यह है कि मुर्गा
चाहे न रहे, लेकिन भोर अवश्य होगी लेकिन इसमें छिपा दार्शनिक और सामाजिक संदेश अत्यंत गहरा है जो
यह बताता है कि संसार की गति किसी एक व्यक्ति, पद, प्रतिभा या सत्ता पर नहीं टिकी होती बल्कि प्रकृति के अनिवार्य नियम पर
आधारित है ।
मनुष्य का अहंकार
प्रायः उसे यह भ्रम दे देता है कि वह अपरिहार्य है और उसके बिना संसार की धुरी रुक
जाएगी। यह भ्रम राजनीति,
परिवार, संस्थाओं और प्रशासन हर जगह देखा जाता
है। परंतु इतिहास गवाह है कि जिसने भी स्वयं को अनिवार्य समझा, समय ने उसे बदलकर यह सिखाया कि स्थान किसी का स्थायी नहीं। सम्राट अशोक
चले गए पर मौर्य साम्राज्य चलता रहा, गांधीजी नहीं रहे फिर
भी स्वतंत्र भारत आगे बढ़ता रहा। राष्ट्रपति,
मुख्यमंत्री या प्रशासक बदलते रहते हैं, मगर
शासन व्यवस्था चलती रहती है। यही वह गति है जिसमें व्यक्ति अस्थायी है और व्यवस्था
स्थायी।
यह कहावत बताती है
कि सभी को अपनी सीमाएँ समझनी चाहिए। जैसे नदी का प्रवाह चट्टानों से टकराकर मार्ग
बदल सकता है पर रुकता नहीं वैसे ही समाज भी बाधाओं के बीच स्वयं विकल्प खोज लेता
है। गीता में कहा गया है “कर्म करो, फल की चिंता मत करो।” कर्म
करने वाला बदल सकता है, पर कर्म की धारा नहीं रुकती। व्यक्ति
मात्र माध्यम है सृजन, परिवर्तन और प्रगति का वास्तविक
संचालक वह नहीं है।
परिवार या समाज में
माता-पिता,
बुजुर्ग, शिक्षक, किसान,
मजदूर किसी के जाने के बाद जीवन नहीं रुकता, बल्कि
नई पीढ़ी जिम्मेदारी संभालती है। पुराने बीज मिट्टी में विलीन होते हैं तब ही नए
पौधे अंकुरित होते हैं। प्रकृति का यही नियम है। इसलिए किसी एक व्यक्ति के जाने को
अंत नहीं, एक नई शुरुआत समझना चाहिए। शेक्सपियर ने कहा था “The
show must go on.” यानी जीवन का रंगमंच कलाकारों के बदलने पर भी
निरंतर चलता रहता है।
यदि कोई यह मान
लेता है कि उसके बिना कोई विभाग या संगठन नहीं चलेगा तो यह गलत सोच है जो व्यवस्था
को कमजोर भी बनाता है। एक सशक्त व्यवस्था वही है जहाँ कार्य व्यक्ति से ऊपर हो और
संस्था व्यक्ति के जाने बाद भी उतनी ही सुचारू रहे। आधुनिक अर्थशास्त्र कहता है कि
व्यवस्थाएँ टिकाऊ तभी हैं जब वे व्यक्ति-आश्रित न होकर प्रणाली-आश्रित हों। कोई
उद्योग,
संगठन या आर्थिक इकाई तभी स्थाई बनती है, जब
वह व्यक्ति-निर्भर नहीं बल्कि तंत्र-निर्भर हो। यदि व्यापार मालिक के बिना रुक जाए,
या स्कूल एक शिक्षक के अभाव में ठहर जाए तो यह व्यवस्था की कमजोरी
है। भारत में पंचायती राज, सहकारी समितियाँ, सार्वभौमिक शिक्षा और डिजिटल शासन इसी स्थायी ढांचे को व्यक्त करता है।
मनुष्य का कर्तव्य
है कि वह पूरे मनोयोग से कार्य करें लेकिन अपने अभाव को संसार का अभाव न समझे। जब
व्यक्ति समझता है कि उसके जाने पर भी जीवन चलता रहेगा, वह
कम तनावग्रस्त, अधिक जिम्मेदार और अधिक विनम्र बनता है। तब
वह दूसरों को विकसित होने, सीखने और नेतृत्व संभालने का अवसर
देता है। भारतीय दर्शन भी यही कहता है “चलायमान ही जीवन है।” नदी एक जगह रुक जाए
तो गंदी हो जाती है जबकि वह बहती रहे तो जीवन को जन्म देती है। स्वामी विवेकानंद
कहते हैं “जो मनुष्य यह सोचता है कि उसके बिना कुछ नहीं होगा, वह या तो भ्रम में है या अहंकार में।” इस दृष्टि से यह लोकोक्ति व्यक्ति
को नश्वरता और निरंतरता दोनों की स्मृति कराती है।
इस कहावत का दूसरा
पहलू यह बताता है कि कार्य किसी के न रहने से नहीं रुकता, पर
इसका अर्थ व्यक्ति की भूमिका को कम करना नहीं। मुर्गा भोर नहीं करता लेकिन भोर का
संकेत देता है और संकेत का अपना महत्व है। किसी वैज्ञानिक के जाने से विज्ञान
रुकता नहीं, कोई शिक्षक विद्यालय छोड़ दे तो शिक्षा ठहरती
नहीं परंतु यह भी उतना ही सत्य है कि उनकी भूमिका अगली पीढ़ी को आगे ले जाने वाली
होती है। यदि हमारे पूर्वज न भी होते तो मानव अस्तित्व चलता पर उनके कारण ही आज हम
सभ्यता के इस स्तर पर हैं। गांधीजी नहीं होते तो स्वतंत्रता के संघर्ष का चरित्र
शायद भिन्न होता, अंबेडकर नहीं होते तो सामाजिक न्याय का
प्रश्न संवैधानिक ढाँचे में इतनी प्रखरता से सम्मिलित नहीं होता। अर्थात व्यक्ति
आवश्यक है, पर अपरिहार्य नहीं और उसका योगदान मूल्यवान है पर
समाज का संपूर्ण आधार नहीं।
यही दोनों पक्ष
मिलकर संतुलन सिखाते हैं। एक ओर व्यक्ति को कर्तव्यपरायणता, परिश्रम,
नैतिकता तथा योगदान देने की प्रेरणा मिलती है तो दूसरी ओर उसे यह भी
ज्ञात रहता है कि अहंकार व्यर्थ है। गांधीजी ने कहा था “मैं
स्वयं महत्वहीन हूँ, पर मेरा विचार अमर हो।’’ वे व्यक्ति
नहीं, विचार की स्थायित्व पर बल देते थे। यह कहावत बताता है
कि समाज में हर व्यक्ति एक कड़ी है और कड़ी हटेगी तो कमजोर अवश्य होगी पर श्रृंखला
नहीं टूटेगी। इसलिए न घमंड उचित है, न ही निराशावाद। दोनों
के बीच संतुलन ही समाज और राष्ट्र को आगे बढ़ाता है।
निष्कर्षतः, “मुरुगा
ना रही त बिहाने नाहीं होई” केवल लोकभाषा की सूक्ति नहीं, बल्कि
जीवन-दृष्टि का सार है। यह बताती है कि कार्य और व्यवस्था व्यक्ति से बड़ी होती है;
व्यक्ति बदलता है, समाज चलता है। सूर्य
प्रतिदिन उगता है और वह चाहे कोई जगाकर बताए या नहीं बताएं। यह कहावत हमें अहंकार
से मुक्त होकर कर्तव्य, विनम्रता, सामूहिकता
और निरंतरता की ओर ले जाती है। जीवन का सार यही है कि हम अपनी भूमिका निभाएँ,
व्यवस्था को मजबूत करें, दूसरों को तैयार करें
और यह जानें कि भोर मुर्गे से नहीं, प्रकृति से होती है और
कार्य व्यक्ति से नहीं, सामूहिक सत्य से आगे बढ़ता है।
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