Sep 18, 2026

न्यायापालिका


संविधान के अभिरक्षक के रूप में उच्चतम न्यायालय

भारतीय संघीय व्यवस्था में संविधान की सुरक्षा का दायित्व न्यायपालिका पर है। उच्चतम न्यायालय संविधान की व्याख्या तथा संवैधानिक उपबंधों का क्रियान्वयन करती है। इस कारण यह संविधान के संरक्षक के रूप में स्थापित होता है।




न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी मूल संवैधानिक प्रावधान

संविधान में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कार्यपालिका को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया जबकि न्यायपालिका की भूमिका सलाहकारी रही जो निम्न प्रकार से स्पष्ट होती है।



यदयपि उपरोक्त प्रावधानों द्वारा न्यायिक नियुक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने की व्यवस्था संविधान में की गयी थी तथापि कई अवसर आए है जब न्यायाधीशों की नियुक्ति एवं बर्खास्तगी में राजनीतिक प्रभाव दिखाता है।

  1. वर्ष 1973 एवं 1977 में वरिष्ठता के सिद्धांत का उल्लंघन करते हुए सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की नियुक्ति की गयी।
  2. उल्लेखनीय है कि 1973 में वरिष्ठता क्रम के अनुसार जस्टिस J.M. Shalet मुख्य न्यायाधीश पद के दावेदार थे लेकिन इस पर पर नियुक्ति जस्टिस A.N. Ray को गयी गयी।  इसी प्रकार 1977 में जस्टिस H.R. Khanna सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश थे जबकि जस्टिस M.H. Beg को मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया।
  3. 1993 में वी रामास्वामी पर चलाया गया महाभियोग की प्रक्रिया भी कही न कही राजनीति से प्रेरित था।

 

भारत में न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया

मुख्य न्यायाधीश (CJI) की नियुक्ति

  • वरिष्ठता का सिद्धांत: परंपरा के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट के सबसे वरिष्ठ न्यायाधीश को मुख्य न्यायाधीश (CJI) बनाया जाता है।
  • सिफारिश की प्रक्रिया: वर्तमान CJI अपनी सेवानिवृत्ति से लगभग एक माह पूर्व सरकार को अपने उत्तराधिकारी के नाम की सिफारिश करता है।
  • यह सिफारिश विधि मंत्रालय को भेजी जाती है, जिसमें पात्र न्यायाधीश का नाम होता है और इसे प्रधानमंत्री की मंज़ूरी के बाद राष्ट्रपति औपचारिक रूप से मुख्‍य न्‍यायाधीश की नियुक्ति करते हैं।

सुप्रीम कोर्ट के अन्‍य न्यायाधीशों की नियुक्ति

  • राष्ट्रपति द्वारा नियुक्ति: अन्य न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति करते हैं। इसमें सिफारिश कॉलेजियम प्रणाली के माध्यम से होती है जिसमें मुख्‍य न्‍यायाधीश और चार वरिष्ठतम न्यायाधीश शामिल होते हैं।
  • योग्य उम्मीदवारों के नाम पर विचार कर कोलेजियम द्वारा सिफारिश की जाती है, जिसे सरकार के अनुमोदन के बाद राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं।

उच्‍च न्‍यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति (अनुच्छेद 217)

  • कॉलेजियम (मुख्य न्यायाधीश और दो वरिष्ठतम सुप्रीम कोर्ट न्यायाधीशों) की सिफारिश पर राष्ट्रपति नियुक्ति करते हैं।

 

न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधी विवाद एवं कॉलेजियम का उदय

उपरोक्त संवैधानिक प्रावधानों के संदर्भ में न्यायाधीशों की नियुक्ति में परामर्श शब्द विवाद का विषय रहा है। संवैधानिक प्रावधानों में परामर्श शब्द के प्रयोग से यह प्रश्न उठाता है कि

  1. मुख्य न्यायाधीश के परामर्श से क्या तात्पर्य है।
  2. न्यायाधीशों की नियुक्ति में क्या भारत के मुख्य न्यायाधीश का परामर्श मानना राष्ट्रपति के लिए बाध्यकारी है।

उपरोक्त प्रावधानों के संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा समय समय पर अपने निर्णयों के माध्यम से 'परामर्श' शब्द की व्याख्या दी गयी जिसके परिप्रेक्ष्य में कॉलेजियम प्रणाली का विकास होता है ।



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भारत में कॉलेजियम व्‍यवस्‍था का विकास

1980 के दशक से पूर्व

  • न्यायिक नियुक्तियां मुख्य रूप से कार्यपालिका के नियंत्रण में थी तथा राष्ट्रपति द्वारा CJI के परामर्श से न्यायाधीशों की नियुक्ति की जाती थी।

प्रथम न्यायाधीश मामले (1982) एस.पी.गुप्ता बनाम भारत संघ 1982

 

  • सर्वोच्‍च न्यायालय के अनुसार परामर्श का अर्थ सहमति नहीं है, इसका अर्थ सिर्फ विचारों के आदान-प्रदान से है। इस प्रकार इस निर्णय से न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में कोई मूलभूत बदलाव नहीं आया।
  • 1993 से पहले कार्यपालिका ने अनुच्छेद 124 को अपने आवश्यकता के अनुसार व्याख्या करते हुए न्यायाधीशों की नियुक्ति की शक्तियों को अपने हाथों में केन्द्रित रखा।

द्वितीय न्यायाधीश मामला (1993) अथवा सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स ऑन रिकार्ड बनाम भारत संघ 1993

  • न्यायालय ने अपने पूर्व के निर्णय को पलट दिया और परामर्श शब्द का अर्थ सहमति के रूप में परिवर्तित कर दिया। इस निर्णय से नियुक्ति प्रक्रिया का संवैधानिक संतुलन पूरी तरह न्यायपालिका के पक्ष में हो गया।
  • न्यायपालिका द्वारा कहा गया कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता संविधान के मूल ढांचे का भाग है और इसे सुनिशचित करने हेतु न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया को राजनीति से अलग रखा जाए।

तृतीय न्यायाधीश मामला (1998)

 

  • न्यायालय द्वारा कहा गया कि भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा अपनाई जाने वाली परामर्श प्रक्रिया के लिये न्यायाधीशों के सम्मिलित परामर्शकी आवश्यकता होती है।
  • इस प्रकार न्यायिक नियुक्ति में कॉलेजियम प्रणाली की शुरुआत होती है। भारत के मूल संविधान में कॉलेजियम का कोई उल्लेख नहीं है।

फोर्थ जजेज़ केस (2015)

  • सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग और 99वें संविधान संशोधन अधिनियम को असंवैधानिक ठहराते हुए कहा गया कि न्यायिक नियुक्ति में राजनीतिक कार्यपालिका की भागीदारी संविधान की मूल संरचना के सिद्धांतों के खिलाफ है। अतः कॉलेजियम प्रणाली को बरकरार रखा गया।  

 

इस प्रकार 'परामर्श' शब्द की व्याख्या पर उठे प्रश्नों के संदर्भ में कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच उत्पन्न विवाद से  न्यायाधीशों की नियुक्ति में कोलोजिमय की संकल्पना का उदय होता है । कार्यपलिका की भूमिका को समाप्त कर न्यायपलिका द्वारा अधिकारों को अपने हाथों में केन्द्रित कर लिया जाता है। इस प्रकार मूल संविधान में जो शक्ति संतुलन बनाया गया था वह निष्प्रभावी हो जाता है।

 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता

न्यायपालिका की स्वतंत्रता का अर्थ न्यायपालिका को कार्यपालिका या विधायिका के दबाव एवं हस्तक्षेपों से मुक्त रखा जाना है ताकि न्यायाधीश बिना किसी भय, पक्षपात के स्वतंत्र एवं निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित कर सके। उल्लेखनीय है कि न्यायपालिका का दायित्व संविधान एवं देश की जनता दोनों के प्रति है और इस कारण से न्यायपालिका की स्वतंत्रता अति आवश्यक है।


अंतर्राष्ट्रीय न्यायिक सम्मेलन 2020 में जहां उच्चतम न्यायालय के एक न्यायाधीश द्वारा भारतीय प्रधानमंत्री की प्रशंसा की गयी वही दूसरी ओर भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा उच्चतम न्यायालय द्वारा दिये गए कुछ महत्वपूर्ण निर्णयों का हवाला देते हुए भी उच्चतम न्यायालय के कार्यों की सराहना की गयी। उल्लेखनीय है कि कार्यपालिका और न्यायपालिका की इस प्रकार बढ़ती घनिष्ठता न्यायपालिका की निष्पक्षता एवं स्वतंत्रता की अवधारणा को कम करने के साथ न्यायपालिका के प्रति सामान्य जन के विश्वास को कम करता है।

 

न्यायपालिका के स्वतंत्रता की आवश्यकता

  • निष्पक्ष एवं स्वतंत्र न्याय को सुनिश्चित करने हेतु।
  • विधि का शासन सुनिश्चित करने हेतु।
  • जनता के प्रति दायित्वों के निर्वहन हेतु।
  • एवं नागरिकों के मूल अधिकारों के संरक्षण हेतु।
  • केन्द्र एवं राज्यों के बीच निष्पक्ष रूप से न्याय एवं संतुलन बनाने हेतु।
  • संविधान के संरक्षक होने के नाते संविधान की सर्वोच्चता सुनिश्चित करने हेतु।
  • संविधान द्वारा प्रदत दायित्वों को सुनिश्चित करने हेतु।

 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता हेतु प्रावधान

नियुक्ति की व्यवस्था

  • न्यायिक नियुक्तियों को राजनीतिक हस्तक्षेप से मुक्त रखने हेतु उच्चतम न्यायालय तथा उच्च न्यायलयों के न्यायाधीशों की नियुक्ति न्यायपालिका के कॉलेजियम की अनुशंसाओं के आधार पर राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। 
  • संवैधानिक प्रावधान के अनुसार न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक निष्ठा के बजाए अनुभव और विशेषज्ञता को आधार बनाया गया है।

कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण

  • अनुच्छेद 50 के तहत कार्यपालिका एवं न्यायपालिका का पृथक्करण का प्रावधान किया गया है ताकि न्यायालय को कार्यपालिका के हस्तक्षेप से मुक्त रखा जा सके तथा न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित किया जा सके।

कार्यकाल की सुरक्षा

  • संविधान द्वारा न्यायाधीशों के कार्यकाल की सुरक्षा की गयी है और उनको केवल संविधान में उल्लिखित आधारों पर ही हटाया जा सकता है जिसमें कार्यपालिका के बजाए विधायिका को महत्वपूर्ण भूमिका दी गयी है।

न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं

  • महाभियोग संबंधी प्रस्ताव के अलावे किसी भी परिस्थिति में किसी भी विधायिका में न्यायाधीशों के आचरण पर चर्चा नहीं की जा सकती। उल्लेखनीय है कि न्यायाधीशों के निर्णयों में हुइ भूल को भी कदाचार नहीं माना जाता है जिससे कि वे भयमुक्त होकर कार्य कर सके।

कार्यकाल के दौरान सेवा शर्तों में अलाभकारी परिवर्तन नहीं

  • न्यायाधीशों की नियुक्ति के पश्चात् उनके वेतन, भत्ते, विशेषाधिकार इत्यादि में अलाभकारी परिवर्तन नहीं किए जा सकते है।  न्यायाधीशों के वेतन भत्ते के व्यय भारत की संचित निधि पर भारित होते हो जो संसदीय मतदान से मुक्त होते हैं।

अवमानना हेतु दंड देने की शक्ति

  • न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने हेतु अवमानना की शक्ति दी गयी है ताकि न्यायालयी कार्यों और निर्णयों का मनमाने ढंग से विरोध या आलोचना नहीं की जा सके।

न्यापालिका के क्षेत्राधिकार में कमी न किया जाना

  • संसद को अधिकार है कि वह न्यायपालिका के क्षेत्राधिकार में वृद्धि कर सकती है लेकिन उसमें कमी नहीं ।

कर्मचारियों को नियुक्त करने की स्वतंत्रता

  • न्यायपालिका अपने कर्मचारियों को नियुक्त कर सकता है। इस प्रकार यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता को बनाए रखने में मदद करता है।

सेवानिवृत्ति पश्चात प्रैक्टिस नियुक्ति पर रोक

  • उच्च न्यायालय के न्ययाधीश तत्संबंधी न्यायालय के अतिरिक्त अन्य उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय में वकालत कर सकते हैं जबकि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश को किसी भी न्यायालय में वकालत करने की छूट नहीं है।

 

न्यायपालिका की स्वतंत्रता को सुनिश्चित करने हेतु उपाए

  • स्वतंत्र रूप से राष्ट्रीय न्यायिक आयोग की नियुक्ति की जाए।
  • मुख्य न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रिया में वरिष्ठता के नियम का पालन किया जाए।
  • न्यायाधीशों की नियुक्ति की अनुशंसा करते समय उनके पिछले कार्यकाल एवं जीवन रिकार्ड को भी ध्यान में रखा जाए।
  • भ्रष्टाचार तथा भाई-भतीजावाद रोकने हेतु न्यायिक कृत्यों के अलावा अन्य कार्यों को सूचना के अधिकार के तहत लाया जाए।
  • सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को सांसद, आयोगों के अध्यक्ष, राज्यपाल आदि पर नियुक्ति की परिपाटी समाप्त करने अथवा कूलिंग ऑफ पीरियड की व्यवस्था की जाए।

 

भारतीय शासन व्यवस्था में न्यायालय संविधान का संरक्षक है और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों से अपेक्षा की की जाती है कि वह संवैधानिक सिद्धांतों एवं विधि के शासन को सर्वोपरि रखते हुए कार्य करेंगे। चूँकि न्यायपालिका की स्वतंत्रता भारत के संविधान की मूल संरचना है अतः इस स्वतंत्रता को संरक्षित किया जाना चाहिये। 


न्यायपलिका के सूचना के अधिकार कानून में नहीं आने के पक्ष में तर्क

  • न्यायपलिका की स्वतंत्रता में बाधा आएगी।
  • न्यायिक प्रक्रिया बाधित होने से प्रकरण निपटारे में अनावश्यक विलम्ब होगा ।
  • न्यायिक प्रक्रिया पर प्रश्न उठाने से लोगों का विश्वास कम होगा ।
  • न्यायाधीशों की विश्वसनीयता तथा प्रतिष्ठा पर प्रश्न उठाने से न्याय कार्य बाधित होगा
  • न्यायपालिका में संसाधनों की कमी है, अतः इससे न्यायपलिका पर कार्य का बोझ बढ़ेगा ।
  • न्यायपलिका कई आवश्यक सूचनांए उपलब्ध कराता है। अतः सूचना के अधिकार की आवश्यकता नहीं।

न्यायपलिका के सूचना के अधिकार कानून में आने के पक्ष में तर्क

  • लोकतंत्र में शासन की सभी अंगों में पारदर्शिता होनी चाहिए ।
  • जन भागीदारी बढ़ने से न्यायपालिका की विश्वसनीयता तथा प्रतिष्ठा बढ़ेगी । 
  • न्यायपालिका में कॉलेजियम व्यवस्था जैसे विवादों पर विराम लगेगा ।
  • न्यायालय में पारदर्शिता तथा उत्तरदायित्व बढ़ने से प्रकरणों का शीघ्र निपटारा ।
  • यह कानून भारतीय लोकतंत्र के चेक एवं बैंलेन्स की अवधारणा को मजबूती देगा ।

न्यायपालिका की वर्तमान सूचना उपलब्ध कराने की व्यवस्था सूचना के अधिकार के अनुरूप  समय सीमा, अपील निवारण तंत्र, सूचना न देने की स्थिति में दंड की व्यवस्था आदि जैसे प्रावधान नहीं करता है।


न्यायपालिका की चुनौतियां

न्यायपलिका क्षमता में सुधार

  • कई अवसरों पर सर्वोच्च न्यायालय नागरिकों के मौलिक और संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करने के अपने दायित्त्वों को पूरा करने में विफल रहा।अतः न्यायालय की क्षमता में सुधार की आवश्यकता है।

न्याय प्रक्रिया में विलंब

  • न्याय मिलने में देरी एक प्रकार का अन्याय ही है। न्यायिक विलंब हेतु किसी भी प्रकार की कोई कठोर कार्रवाई का अभाव है जिसके कारण जज मुकदमा निपटान में समय को ज्यादा महत्व नहीं देता और अनावश्यक विलंब होता है।
  • अप्रैल 2026 में भारत के मुख्य न्यायाधीश ने कहा कि भारतीय न्याय प्रणाली की सबसे बड़ी चुनौती कानूनों की कमी नहीं, बल्कि आम नागरिकों की न्याय तक सीमित पहुँच (Access to Justice) है। भारत के न्‍यायालयों में सर्वोच्च न्यायालय में 69.76 हजार, उच्च न्यायालयों 60.6 लाख और जिला एवं अधीनस्‍थ न्‍यायालयों में 4.4 करोड लंबित मामले हैं। इस प्रकार लंबित मामलों से न्याय में देरी होती है जिससे  आर्थिक एवं सामाजिक विकास प्रभावित होता है।


कोलेजियम व्यवस्था में सुधार

  • भारत में कोलोजियम व्यवस्था जजों द्वारा जजों की नियुक्ति की व्यवस्था देता है जिस पर न्यायाधीशों की नियुक्ति, पदोन्नति में पारदर्शिता की कमी के आरोप लगते रहते हैं। इस प्रक्रिया में व्याप्त दोषों के कारण भाई भतीजावाद, भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं।


न्यायाधीशों की कमी

  • उच्च न्यायालयों में लगभग 40% तथा निचली न्यायपालिका में लगभग 35% पद रिक्त हैं जिससे  न्यायिक प्रक्रिया में बाधा आती है। भारत में 10 लाख लोगों पर लगभग 21 न्यायाधीश है जबकि विधि आयोग ने 10 लाख लोगों पर 50 न्यायाधीशों की सिफारिश की थी।
  • हाल ही में राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत 'उच्चतम न्यायालय (न्यायाधीशों की संख्या) संशोधन अध्यादेश, 2026' जारी किया। इसका उद्देश्य लंबित मामलों की संख्‍या को देखते हुए उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की संख्या 34 से बढ़ाकर 38 (मुख्य न्यायाधीश सहित) करना है।


न्यायपालिका अवसंरचना में कमी

  • भारतीय न्यायपालिका व्यवस्था में बढ़ते कार्यभार के अनुसार संसाधनों की वृद्धि नहीं हो पा रही है जिसके कारण न्यायपालिका भवन, मूलभूत सुविधाओं, इत्यदि की कमी का सामना कर रही है। न्यायपालिका के लिए बजटीय आवंटन GDP का 0.08 से 0.09 प्रतिशत है।

पोस्ट रिटायरमेंट नियुक्तियां

  • न्यायाधीशों की पोस्ट रिटायमेंट की प्रवृत्ति हाल के कुछ वर्षों में बढ़ी है। उदाहरण के लिए पूर्व सीजेआई को राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जाना या किसी पूर्व सीजेआई को किसी राज्य का राज्यपाल बनाया जाना। इस प्रकार की व्यवस्था से न्यायालय की साख प्रभावित होती है और लोगों का विश्वास कम होता है।


महिलाओं, अल्पसंख्यकों का अपर्याप्त प्रतिनिधित्व

  • महिलाओं की आबादी लगभग आधी होने के बावजूद सर्वोच्च न्यायालय में वर्तमान में केवल एक ही महिला न्यायाधीश हैं। इसी क्रम में अल्पसंख्यकों की संख्या भी काफी कम है।


न्यायपालिका के न्यायिक मूल्यों में गिरावट

  • हाल ही में न्यायालय ने अपनी आलोचना को दबाने के लिए न्यायालय की अवमानना को उपकरण के रूप में प्रयुक्त किया।
  • न्यायपालिका द्वारा स्वयं के  विरुद सूचना का अधिकार के आवेदन की अनुमति देने से इनकार करना।
  • उच्चतम न्यायालय के वरिष्ठ न्यायाधीशों और मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति सी एस कर्णन के मध्य विवाद।
  • दिल्ली हाई कोर्ट के जज जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ हाल ही में लगे भ्रष्‍टाचार के आरोप।

सुधार संबंधी निर्णय में कमी

  • संस्थागत सुधार, जजों की कमी, तकनीकी सुधार आदि में न्यायपालिका द्वारा निर्णय नहीं ले पाना ।

न्यायिक प्रक्रिया में भ्रष्टाचार

  • न्यायाधीश पर लगे भ्रष्टाचार तथा अनियमितता के आरोप, मीडिया में जजों का आना, न्यायपालिका द्वारा जांच की  विरुद्ध अवमानना प्रकरण, जस्टिस कर्णन मामला।
  • दिसंबर, 2021 को भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने कहा था कि "भ्रष्टाचार उतना ही पुराना है जितना कि समाज। भ्रष्टाचार जीवन का एक अंग बन गया है और न्यायाधीश स्वर्ग से नहीं आते हैं।
  • प्रिंट मीडिया में रिश्वतखोरी या हितों के टकराव या पक्षपात के आरोप लगते रहे हैं। आरोपों में एक व्यावसायिक घराने के पक्ष में निर्णय से लेकर, मामलों को सूचीबद्ध करने में प्राथमिकता से लेकर पूर्व मुख्य न्यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव तक के मुद्दे शामिल है।
  • ओडिशा उच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीश के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोप।

बढ़ता कार्यभार

  • न्यायपालिका पर बढ़ता कार्यभार तथा बढ़ते प्रकरणों की संख्या एवं लंबी न्यायिक प्रक्रिया।
  • विधि और न्याय मंत्रालय ने राज्य सभा को बताया कि देश की अलग-अलग अदालतों में 5.02 करोड़ से अधिक मामले लंबित हैं।
  • न्यायाधीशों की कम संख्या, कमजोर कानून आदि के कारण न्यायालयों में लंबित मामलों की संख्या बढ़ती जा रही है।
  • महामारी के कारण कई मामलों पर सुनवाई नहीं हो सकी जिससे लंबित मामलों की संख्या बढ़ती गयी।
  • बिहार में महामारी के अलावा शराबबंदी कानून के कठोर प्रावधान भी मामलों की संख्या बढ़ाने का एक कारण रहा है।   

जिस प्रकार से न्यायपालिका में भ्रष्टाचार, आपसी द्वंद्व तथा असहमति देखी जा रही है उससे आम जनता में इसकी छवि थोड़ी धूमिल हो रही है तथा ऐसा प्रतीत होता है कि न्यायिक व्यवस्था संक्रमण से गुजर रही है हालांकि वास्तविक स्थिति ऐसी नहीं है। हाल के वर्षों में कुछ ऐसी घटनाएं सामने आई है जिससे न्यायपालिका की साख तथा प्रतिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह उठाए गए लेकिन फिर भी अभी भी आम जनता को भारतीय न्यायपालिका में पूरा विश्वास है तथा न्यायपलिका ने समय समय पर अनेक महत्वपूर्ण निर्णय दिए हैं। 


न्यायपालिका में सुधार हेतु उपाय

  • न्यायालय में सूचना का अधिकार अधिनियम लागू किया जाए।
  • न्यायालय में प्रकरण निपटाने समय सीमा तय की जानी चाहिए, न्यायिक प्रक्रिया सरल बनाई जाए ।
  • जजों की योग्यता के आधार पर पदोन्नति देने की व्यवस्था।
  • राष्ट्रीय न्यायिक सेवा जैसी व्यवस्था एवं नालसा का विस्तार किया जाए।
  • आवश्‍यकतानुसार तदर्थ न्‍यायाधीशों को नियुक्ति किया जाए ।
  • न्यायालय की कार्रवाई, जजों की नियुक्ति संबंधी सूचनाओं को सार्वजनिक किया जाए।
  • पारिवारिक मामलों पर सुनवाई, मामलों के शीघ्र निपटारे हेतु फास्ट ट्रैक कोर्ट की स्थापना।
  • लोक अदालत, आर्बिट्रेशन, मध्‍यस्‍थता, सुलह को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • सरकारी विभागों में मजबूत आंतरिक शिकायत निवारण तंत्र स्थापित किया जाए। 
  • न्यायालय के बुनियादी ढांचे के विकास, न्यायिक कर्मचारियों के प्रशिक्षण आदि के लिए पर्याप्त धन उपलब्ध कराया जाए।
  • कम गंभीर अपराधों आदि को रोकने के लिए निषेधात्मक दंड आरोपित किए जाने चाहिए।
  • नागरिकों द्वारा कानून का पालन सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्‍साहन और दंड आधारित मॉडल ।
  • 1997 न्यायिक जीवन के मूल्यों की पुनर्स्थापना- इसमें न्यायिक जीवन के मूल्यों को पुनर्स्थापित करते हुए न्यायाधीशों के लिए आचरण संहिता का उल्लेख किया गया था। 


 

न्यायालय में लंबित मामलों को कम करने हेतु पहल

प्रक्रिया ज्ञापन

इसके तहत सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए नियमों एवं प्रक्रियाओं को सूचीबद्ध किया गया है।

न्यायिक नियुक्तियों में पारदर्शिता लाना

हाई कोर्ट के न्यायाधीशों के रिकॉर्ड बनाए रखने हेतु सुप्रीम कोर्ट में एक स्थायी सचिवालय स्थापित करना।

प्रोजेक्ट सहयोग (Sahyog)

लंबित मामलों को कम करने हेतु आरंभ किया गया अभियान।

कानूनी सूचना प्रबंधन और ब्रीफिंग सिस्टम

केंद्र सरकार से जुड़े मामलों की बेहतर रूप में और पारदर्शी तरीके से निगरानी करने हेतु आरंभ वेव-आधारित एप्‍लीकेशन।

मध्यस्थता विधेयक 2023

मामले के पक्षकारों के लिए मुकदमे से पूर्व मध्यस्थता का प्रावधान करने हेतु आरंभ ।

फास्ट ट्रैक कोर्ट

लंबित मामले को निपटारे तथा त्वरित न्याय प्रदान करने के उद्देश्य से इसे लाया गया ।

ई- न्यायालय

प्रौद्योगिकी उपयोग द्वारा लोगों तक आसानी से न्‍याय तक पहुंच बनाने हेतु ।

प्रशासनिक तंत्र

अंतर मंत्रालयी विभागीय विवादों को सुलझाने हेतु बनाया गया तंत्र

लोक अदालत एवं ADR

कम खर्च में त्वरित एवं सौहार्दपूर्ण विवाद समाधान

ग्राम न्यायालय अधिनियम, 2008

ग्रामीण क्षेत्रों में स्थानीय स्तर पर सुलभ न्याय उपलब्ध कराना

राष्ट्रीय न्यायिक डेटा ग्रिड (NJDG)

लंबित मामलों की निगरानी एवं पारदर्शिता बढ़ाना

विचाराधीन कैदी समीक्षा समिति

अनावश्यक हिरासत को कम करना

राष्ट्रीय न्याय वितरण एवं विधिक सुधार मिशन 2011

इसका उद्देश्य मामलों के निस्तारण में देरी तथा लंबित मामलों के बोझ को कम करना है।

 

न्यायिक प्रणाली की दक्षता बढ़ाने के लिए उच्चतम न्यायालय के सुझाव

हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने लंबित मामलों तथा सुनवाई के लिए मामलों को सूचीबद्ध करने में हो रही देरी पर चिंता व्यक्त करते हुए उच्च न्यायालयों को न्यायिक प्रणाली की दक्षता बढ़ाने के लिए कई सुझाव दिए हैं।

 

उच्चतम न्यायालय के प्रमुख सुझाव

  • मामलों की समयबद्ध सूचीबद्धता-जमानत मामलों को स्वचालित सॉफ्टवेयर आधारित प्रणाली से सूचीबद्ध किया जाए।
  • लंबित मामलों का स्वतः पुनः सूचीबद्धीकरण-जिन मामलों की सुनवाई नहीं हो सके, उन्हें स्वतः दोबारा सूचीबद्ध किया जाए और मामलों के निस्तारण के लिए निश्चित समय-सीमा निर्धारित की जाए।
  • स्टेटस रिपोर्ट-पहली सुनवाई से पहले स्टेटस रिपोर्ट दाखिल करना अनिवार्य किया जाए।
  • अनावश्यक स्थगन पर रोक-विशेष रूप से सरकारी वकीलों द्वारा मांगे जाने वाले अनावश्यक स्थगनों को हतोत्साहित किया जाए।

 

जमानत याचिकाओं के त्वरित निस्तारण की आवश्यकता

  • संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन एवं दैहिक स्वतंत्रता के अधिकार की रक्षा के लिए दोषसिद्धि से पूर्व अनावश्यक हिरासत से बचाना आवश्यक है।
  • जमानती अपराध में बिना वारंट गिरफ्तार व्यक्ति को कार्यवाही के किसी भी चरण में जमानत पर रिहा होने का अधिकार प्राप्त है। उल्‍लेखनीय है कि जेल सांख्यिकी भारत, 2024 के अनुसार वर्ष 2024 में जेलों में कैदियों की संख्या क्षमता से 112.7% अधिक थी तथा लगभग 3.7 लाख कैदी विचाराधीन थे।




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