Sep 20, 2025

प्रश्‍न-भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय में ब्रिटिश नितियाँ कहाँ तक जिम्मेवार थीं?व्याख्या कीजिए । 38

प्रश्‍न-भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन के उदय में ब्रिटिश नितियाँ कहाँ तक जिम्मेवार थीं?व्याख्या कीजिए । 38



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उत्‍तर- भारतीय राष्ट्रीय आन्दोलन का उदय आकस्मिक नहीं था, बल्कि ब्रिटिश शासन की शोषणकारी नीतियों, दमनकारी उपायों और भेदभावपूर्ण व्यवहार का प्रत्यक्ष परिणाम था। यद्यपि राष्ट्रवाद का विकास आंतरिक सामाजिक-सांस्कृतिक परिवर्तनों और पुनर्जागरण से भी जुड़ा था, परंतु ब्रिटिश नीतियों ने इसे उत्प्रेरित करने में निर्णायक भूमिका निभाई।

 

आर्थिक शोषण और असंतोष

  • ब्रिटिश आर्थिक नीतियों ने भारतीय समाज को गहरे संकट में डाल दिया। भारी कराधान, कृषि का शोषण, परंपरागत उद्योगों का पतन ने देश को निर्धनता, बेरोजगारी और अकाल की ओर धकेला। बार-बार पड़ने वाले अकाल और भुखमरी प्रशासनिक उदासीनता और शोषण की नीतियों का दुष्परिणाम थे जिसने जनता के बीच असंतोष और विद्रोह की चिंगारी पैदा की।
  • दादाभाई नौरोजी के ‘ड्रेन थ्योरी’ ने स्पष्ट किया कि भारत की संपत्ति का निरंतर बहिर्गमन हो रहा है। यह आर्थिक शोषण भारतीयों को इस निष्कर्ष पर पहुँचाता है कि विदेशी शासन रहते विकास असंभव है।

 

राजनीतिक और सामाजिक दमन

  • ब्रिटिश प्रशासनिक एवं राजनीतिक नीतियाँ भी असंतोष का कारण बनीं। उच्च पदों पर अंग्रेजों का वर्चस्व, भारतीयों की उपेक्षा, न्यायपालिका में असमानता तथा लार्ड लिटन जैसे गवर्नरों के कठोर कानूनों ने जनता को क्षुब्ध किया।
  • वर्नाक्युलर प्रेस एक्ट, शस्त्र अधिनियम और इलबर्ट बिल विवाद ने जहां अंग्रेजों की जातीय श्रेष्ठता की मानसिकता को उजागर किया वहीं भारतीयों के धार्मिक-सामाजिक जीवन में हस्तक्षेप ने भारतीय संस्कृति पर चोट की जिसने भारतीयों में आत्मसम्मान की चेतना को जन्म दिया।

 

राष्ट्रवाद की भावना का विकास

  • ब्रिटिशों द्वारा लाई गई पश्चिमी शिक्षा और संचार के साधनों ने भी जाने अनजाने में राष्ट्रवाद की नींव रखी। पश्चिमी शिक्षा और अंग्रेजी भाषा ने एक शिक्षित मध्यम वर्ग तैयार किया, जिसने समान अधिकार और प्रतिनिधित्व की मांग की वहीं रेलवे, डाक और टेलीग्राफ ने भारत के विविध क्षेत्रों को जोड़ा और राष्ट्रव्यापी संचार संभव किया।
  • प्रेस और साहित्य ने जहां जनजागरण को बल दिया वहीं रॉलेट एक्ट (1919), साइमन कमीशन (1927) जैसी घटनाओं ने यह स्पष्ट कर दिया कि ब्रिटिश शासन भारतीयों को राजनीतिक अधिकार देने के इच्छुक नहीं है।

 

निष्कर्षत: जहां आर्थिक शोषण, राजनीतिक दमन और सांस्कृतिक हस्तक्षेप ने जनता को संघर्ष की राह पर अग्रसर किया वहीं, शिक्षा, संचार और प्रशासनिक केंद्रीकरण ने इस असंतोष को संगठित राष्ट्रवाद में परिवर्तित करने का अवसर दिया। इस प्रकार, ब्रिटिश शासन ने स्वयं वह जमीन तैयार की, जिस पर भारतीय स्वतंत्रता संग्राम खड़ा हुआ और अंततः 1947 में विजय प्राप्त हुई।


शब्‍द संख्‍या-387



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