Jun 22, 2026

71th BPSC - बाँदर की जानैत अहि अदरक्क स्वाद।

 

बाँदर की जानैत अहि अदरक्क स्वाद ।

“अज्ञानी के समक्ष ज्ञान बिखेरना वैसा ही है जैसे अंधे को दर्पण दिखाना।” - कबीर

 

भारतीय लोकजीवन की कहावतें पीढ़ियों के अनुभव, संघर्ष और जीवन-दर्शन का संचित ज्ञान होती हैं। मैथिली की प्रसिद्ध लोकोक्ति “बाँदर की जानैत अहि अदरक्क स्वाद” भी ऐसी ही एक गहरी मानवीय और दार्शनिक सच्चाई को व्यक्त करती है। बंदर को अदरक देने पर, वह उसे सूँघेगा, उलट-पलट करेगा और अंततः फेंक देगा, क्योंकि वह उसके स्वाद, गुण और महत्व को समझने की चेतना नहीं रखता। यह केवल हास्य नहीं, बल्कि मानव समाज की उस विडंबना पर तीखा व्यंग्य है जहाँ श्रेष्ठता का मूल्य कई बार अज्ञान, सतहीपन और अपरिपक्वता के बीच खो जाता है।

 

यह लोकोक्ति केवल “अज्ञान” की नहीं, बल्कि “मूल्य-बोध” की चर्चा करती है। जीवन में अनेक बार श्रेष्ठ विचार, महान व्यक्तित्व, उत्कृष्ट कला और गहन ज्ञान उन लोगों के बीच पहुँच जाते हैं जो उन्हें समझने के लिए तैयार ही नहीं होते। समस्या केवल यह नहीं कि “अदरक” दुर्लभ है बल्कि समस्या यह भी है कि “स्वाद पहचानने वाली चेतना” दुर्लभ होती जा रही है। यही कारण है कि समाज कई बार प्रतिभा से अधिक प्रचार को, ज्ञान से अधिक शोर को और चरित्र से अधिक चमक को महत्व देने लगता है। कबीर ने ठीक ही कहा था “जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ।” गहराई का अनुभव वही कर सकता है जो भीतर उतरने का साहस रखता हो।

 

इस लोकोक्ति का पहला आयाम व्यक्ति के आत्मिक और बौद्धिक विकास से जुड़ा है। मनुष्य को केवल अवसर मिल जाने से सफलता नहीं मिलती; उसके लिए पात्रता और परिपक्वता भी आवश्यक होती है। ज्ञान केवल पुस्तकों से नहीं आता, बल्कि अनुभव, संवेदनशीलता और आत्मचिंतन से विकसित होता है। भारतीय दर्शन में इसे “अधिकारिता” कहा गया है, अर्थात् किसी सत्य या ज्ञान को ग्रहण करने की पात्रता। उपनिषदों में गुरु तब तक गूढ़ ज्ञान नहीं देते थे जब तक शिष्य आत्मिक रूप से तैयार न हो जाए। प्लेटो ने भी ‘रिपब्लिक’ में कहा था कि न्याय और सत्य का बोध केवल उसी आत्मा को हो सकता है जिसने स्वयं को संयम और विवेक से परिष्कृत किया हो। इसका अर्थ स्पष्ट है - श्रेष्ठ वस्तु का मूल्य वही समझ सकता है जिसने स्वयं को उस स्तर तक विकसित किया हो।

 

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किन्तु यह प्रश्न केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है; यह समाज की सामूहिक चेतना से भी जुड़ा है। इतिहास गवाह है कि समाज ने कई बार सत्य और प्रतिभा को पहचानने में देर की है। जब गैलीलियो ने कहा कि पृथ्वी सूर्य के चारों ओर घूमती है, तब समाज उसकी बात स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं था। सत्य उपस्थित था, किंतु समाज में उसे स्वीकार करने की पात्रता नहीं थी। इसी प्रकार राजा राममोहन राय ने जब सती प्रथा के विरुद्ध आवाज उठाई, तब उन्हें सामाजिक विरोध का सामना करना पड़ा। यह दिखाता है कि हर युग में अदरक मौजूद थी, लेकिन उसका स्वाद पहचानने वाली चेतना विकसित होने में समय लगा।

 

आज के डिजिटल युग में यह लोकोक्ति और अधिक प्रासंगिक हो उठती है। सोशल मीडिया और तात्कालिक सूचना के इस दौर में गहराई की जगह त्वरित प्रतिक्रिया ने ले ली है। ज्ञान से अधिक “वायरलता” का मूल्य बढ़ गया है। गंभीर विचार मनोरंजन की भीड़ में दब जाते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता और इंटरनेट ने जानकारी को सुलभ बना दिया है, किंतु विवेक और संवेदनशीलता का संकट उतना ही गहरा होता जा रहा है। समस्या जानकारी की कमी नहीं, बल्कि उसे समझने की चेतना की कमी है। अज्ञान का अर्थ केवल अंधकार नहीं, बल्कि प्रकाश के महत्व को न समझ पाना भी है।

 

शिक्षा केवल डिग्री या रोजगार प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि चेतना और मूल्य-बोध का निर्माण करने की प्रक्रिया है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था- “शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर की पूर्णता को अभिव्यक्त करे।” वास्तविक शिक्षा मनुष्य को केवल कुशल नहीं बनाती, बल्कि उसे विवेकशील और संवेदनशील भी बनाती है। डॉ. भीमराव आंबेडकर इसका जीवंत उदाहरण हैं। सामाजिक उपेक्षा और भेदभाव के बावजूद शिक्षा ने उन्हें वह दृष्टि दी जिसके माध्यम से वे करोड़ों वंचितों के अधिकारों की आवाज बन सके। उन्होंने कहा था— “Cultivation of mind should be the ultimate aim of human existence.” वास्तव में शिक्षा वही है जो मनुष्य में स्वाद पहचानने की क्षमता विकसित करे।

 

यह लोकोक्ति सामाजिक न्याय के प्रश्न को भी सामने लाती है। सदियों तक महिलाओं, दलितों और वंचित वर्गों को शिक्षा और अवसरों से दूर रखा गया, फिर उन्हीं पर यह आरोप लगाया गया कि वे “योग्य” नहीं हैं। यह वैसा ही है जैसे किसी व्यक्ति को अंधेरे में रखकर उसके दृष्टिहीन होने का उपहास करना। इसलिए सकारात्मक भेदभाव केवल संवैधानिक नीति नहीं, बल्कि नैतिक आवश्यकता है। एक न्यायपूर्ण समाज वह नहीं जो केवल अवसर दे, बल्कि वह है जो अवसरों को ग्रहण करने योग्य परिस्थितियाँ भी निर्मित करे। किसी गरीब बच्चे के हाथ में पुस्तक दे देना पर्याप्त नहीं; उसे पढ़ने का वातावरण और आगे बढ़ने का अवसर भी देना होगा। अन्यथा वह पुस्तक भी उसके लिए उसी अदरक की तरह होगी जिसका स्वाद वह समझ ही नहीं पाएगा।

 

लोकतांत्रिक शासन और प्रशासन में किसी नीति की सफलता केवल उसकी गुणवत्ता पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि समाज उसे ग्रहण करने के लिए कितना तैयार है। मिड-डे मील योजना इसलिए सफल हुई क्योंकि उसने पहले भूख की वास्तविकता को समझा, फिर शिक्षा की बात की। डिजिटल इंडिया अभियान वहाँ अधिक प्रभावी हुआ जहाँ डिजिटल साक्षरता और आधारभूत संरचना विकसित थी।

 

जीवन का सबसे बड़ा दुःख असफलता नहीं होता, बल्कि वह है जब हमारी निष्ठा, प्रेम या संवेदनशीलता किसी ऐसे व्यक्ति के सामने पड़ जाती है जो उसके मूल्य को समझ ही नहीं पाता। तब हमें पहली बार एहसास होता है कि मूल्यवान वस्तु से अधिक मूल्यवान उसे पहचानने वाली दृष्टि होती है। बुद्ध ने कहा था “जब शिष्य तैयार होता है, तभी गुरु प्रकट होता है।” यह कथन केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि जीवन का गहरा व्यावहारिक सत्य है।

 

अंततः, “बाँदर की जानैत अहि अदरक्क स्वाद” केवल व्यंग्यात्मक लोकक्ति नहीं, बल्कि समाज और मनुष्य की चेतना का दर्पण है। यह सिखाती है कि श्रेष्ठता का मूल्य तभी है जब उसे पहचानने वाली दृष्टि मौजूद हो। किसी भी राष्ट्र की वास्तविक प्रगति तभी संभव है जब वह केवल संसाधन न बाँटे, बल्कि ऐसी संवेदनशील और विवेकशील चेतना का निर्माण करे जो उन संसाधनों का मूल्य समझ सके। क्योंकि इतिहास बताता है कि महान सभ्यताएँ केवल ज्ञान उत्पन्न नहीं करतीं बल्कि वे ज्ञान को पहचानने वाली दृष्टि भी विकसित करती हैं।

 

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