Jun 19, 2026

71th BPSC jekra lathi okra bhaish nibandh

 जे करा लाठी ओकरा भैंस 

शक्ति नैतिकता नहीं बनाती; किंतु नैतिकता के बिना शक्ति केवल अत्याचार बन जाती है।” - इमैनुएल कांट

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँवों में प्रचलित कहावत “जे करा लाठी, ओकरा भैंस” सदियों के अनुभव, संघर्ष और सामाजिक यथार्थ को व्यक्त करती है। ग्रामीण समाज में भैंस केवल एक पशु नहीं बल्कि वह किसान की पूँजी, और जीवन का आधार होती थी। ऐसे में यदि किसी शक्तिशाली व्यक्ति ने लाठी के बल पर भैंस छीन ली, तो वह उसके अस्तित्व पर आघात होता था। यह लोकोक्ति यह बताती है कि इतिहास और समाज में अक्सर ऐसा ही होता आया है। जिसके पास शक्ति होती है, वही संसाधनों, अवसरों और अधिकारों पर कब्ज़ा कर लेता है। यही कारण है कि यह कहावत केवल व्यंग्य नहीं, बल्कि समाज के उस दर्द का प्रतीक है जहाँ कई बार न्याय नहीं, शक्ति निर्णायक बन जाती है।

 

भारतीय समाज में यह कहावत सदियों तक सामाजिक असमानता के संदर्भ में दिखाई देती रही। जिनके पास भूमि, धन और सामाजिक प्रतिष्ठा की “लाठी” थी, वही निर्णय लेते थे। दलितों, आदिवासियों और वंचित समुदायों के पास अधिकार तो थे, लेकिन उन्हें सुरक्षित रखने की शक्ति नहीं थी। कई बार गरीब व्यक्ति अदालत में मुकदमा इसलिए नहीं हारता कि वह गलत होता है, बल्कि इसलिए हारता है क्योंकि उसके पास लंबी लड़ाई लड़ने की आर्थिक और सामाजिक शक्ति नहीं होती। डॉ. आंबेडकर ने इसी व्यवस्था को बदलने के लिए संविधान को “न्याय की लाठी” बनाया। उन्होंने कहा था- “सामाजिक लोकतंत्र के बिना राजनीतिक लोकतंत्र टिक नहीं सकता।” संविधान का मूल उद्देश्य ही यह था कि “भैंस” पर अधिकार किसी व्यक्ति की ताकत से नहीं, बल्कि कानून और समानता से तय हो।

 

इतिहास के अनेक ऐसे उदाहरण है जिसमें साम्राज्य तलवार के बल पर बने, उपनिवेश बंदूक की शक्ति से स्थापित हुए और समाज में प्रभुत्व अक्सर बलवान वर्गों के हाथ में रहा। औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने अपनी सैन्य और आर्थिक शक्ति के बल पर भारत के संसाधनों, व्यापार और श्रम पर अधिकार कर लिया। उनकी “लाठी” बंदूक, कानून और पूँजी थी। किंतु दूसरी ओर मानव सभ्यता का नैतिक विकास इसी सोच को चुनौती देने का प्रयास भी रहा है। बुद्ध ने करुणा की बात की, गांधी ने अहिंसा की, और डॉ. आंबेडकर ने संवैधानिक समानता की। महात्मा गांधी ने दुनिया को बताया कि नैतिक शक्ति भौतिक शक्ति से अधिक स्थायी हो सकती है। दांडी यात्रा में उनके हाथ की साधारण लाठी सत्य, साहस और आत्मबल का प्रतीक थी। गांधी ने यह सिद्ध किया कि शक्ति केवल हिंसा में नहीं, बल्कि आत्मसंयम और नैतिक दृढ़ता में भी होती है।

 

लोकतांत्रिक राजनीति में यह कहावत आज नए रूपों में दिखाई देती है। पहले “लाठी” केवल बाहुबल का प्रतीक थी, किंतु आज धनबल, मीडिया-बल और सूचना-बल इसके आधुनिक रूप बन चुके हैं। कई बार चुनाव विचारों से अधिक संसाधनों की प्रतिस्पर्धा बन जाते हैं। जिस व्यक्ति के पास अधिक धन, प्रचार और प्रभाव होता है, उसकी राजनीतिक शक्ति बढ़ जाती है। यही कारण है कि स्वतंत्र न्यायपालिका, चुनाव आयोग और नागरिक समाज जैसी संस्थाएँ लोकतंत्र के लिए आवश्यक हैं। ये संस्थाएँ उस “लाठी” को नियंत्रित करती हैं ताकि शक्ति मनमानी का साधन न बन जाए।

 

आज डेटा, तकनीक और पूँजी नई शक्ति बन चुके हैं। बड़ी डिजिटल कंपनियाँ केवल व्यापार नहीं नियंत्रित करतीं वे लोगों की पसंद, विचार और व्यवहार तक को प्रभावित करती हैं। डेटा पर नियंत्रण आधुनिक युग की सबसे बड़ी “लाठी” बनता जा रहा है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, एल्गोरिद्म और डिजिटल पूँजीवाद के इस दौर में यह प्रश्न और गंभीर हो गया है कि क्या भविष्य में “भैंस” केवल उन्हीं की होगी जिनके पास तकनीकी शक्ति होगी? वैश्विक स्तर पर विकसित और विकासशील देशों के बीच तकनीकी असमानता इसी शक्ति-संतुलन को दर्शाती है।

 

अंतरराष्ट्रीय राजनीति में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में वीटो शक्ति रखने वाले देशों की स्थिति आधुनिक “लाठी” का प्रतीक है। रूस-यूक्रेन युद्ध हो, पश्चिम एशिया संकट हो या आर्थिक प्रतिबंध, हर जगह शक्ति संतुलन निर्णायक दिखाई देता है। किंतु यदि केवल शक्ति ही अंतिम सत्य होती, तो छोटे राष्ट्र कभी स्वतंत्र नहीं रह पाते। वियतनाम, दक्षिण अफ्रीका और भारत का इतिहास बताता है कि जनशक्ति, नैतिकता और सामूहिक चेतना भी साम्राज्यवादी शक्ति को चुनौती दे सकती है।

 

प्रशासनिक शक्ति भी एक प्रकार की “लाठी” है। प्रश्न यह है कि उसका उपयोग किसके लिए हो-जनसेवा के लिए या निजी स्वार्थ के लिए? कौटिल्य ने कहा था-“प्रजा का सुख ही राजा का सुख है।” जो अपनी शक्ति को जनता के अधिकारों की रक्षा में लगाता है, वही वास्तविक अर्थों में लोकसेवक है। लेकिन जो शक्ति का उपयोग भय, भ्रष्टाचार या व्यक्तिगत लाभ के लिए करता है, वह लोकतंत्र की आत्मा को कमजोर करता है।

 

यह समझना भी आवश्यक है कि हर शक्ति अन्यायपूर्ण नहीं होती। यदि राज्य के पास वैध शक्ति न हो, तो समाज अराजकता में बदल जाएगा। पुलिस, न्यायपालिका और प्रशासन की शक्ति नागरिकों की सुरक्षा के लिए आवश्यक है। समस्या शक्ति में नहीं, बल्कि अनियंत्रित और अनैतिक शक्ति में है। लोकतंत्र का वास्तविक उद्देश्य शक्ति को समाप्त करना नहीं, बल्कि उसे जवाबदेह और संवैधानिक बनाना है। इसलिए संविधान आधुनिक समाज की सबसे बड़ी “लोकतांत्रिक लाठी” है, जो कमजोर व्यक्ति को भी न्याय पाने का अधिकार देती है।

 

अंततः यह लोककहावत मानव सभ्यता का गहरा आत्मविश्लेषण है जो यह हमें बताती है कि शक्ति यदि नैतिकता और न्याय से नियंत्रित न हो, तो वह शोषण में बदल जाती है। किंतु यह प्रेरणा भी देती है कि समाज ऐसी व्यवस्था बना सकता है जहाँ “भैंस” पर अधिकार लाठी से नहीं, न्याय से तय हो। सभ्यता की वास्तविक प्रगति तब नहीं होती जब सबसे शक्तिशाली और अधिक शक्तिशाली बन जाए, बल्कि तब होती है जब सबसे कमजोर व्यक्ति भी बिना भय के अपने अधिकार के साथ खड़ा हो सके। सच्चा लोकतंत्र वही है जहाँ लाठी न्याय की रक्षक बन जाए, न कि अन्याय की मालिक।

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