Jun 16, 2026

71th-BPSC - अकेला चना भाड़ न फोरि सकेला।

 

अकेला चना भाड़ न फोरि सकेला।

बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश की लोकभाषा में प्रचलित कहावत- “अकेला चना भाड़ न फोड़ सकेला” मनुष्य के सामाजिक अस्तित्व का गहरा दर्शन है। यहां पर भाड़ शब्‍द बड़ी चुनौती, कठिन व्यवस्था और विशाल लक्ष्य का प्रतीक है, जबकि चना व्यक्ति की सीमित शक्ति का। अकेला चना भाड़ नहीं फोड़ सकता, किंतु जब अनेक चने एक साथ पड़ते हैं, तब वही असंभव प्रतीत होने वाला कार्य संभव हो जाता है। यह कहावत हमें सिखाती है कि मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति उसकी व्यक्तिगत प्रतिभा नहीं, बल्कि सामूहिकता, सहयोग और साझा संकल्प है। इसीलिए कहा गया है कि

 

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“यदि तुम तेज़ चलना चाहते हो तो अकेले चलो, लेकिन यदि दूर तक जाना चाहते हो तो साथ चलो।”

 

मानव सभ्यता का पूरा विकास इसी सिद्धांत पर आधारित है। यदि मनुष्य केवल अकेले जीवन जीता, तो वह न जंगलों को पार कर पाता, न नगर बसाता और न विज्ञान, संस्कृति तथा लोकतंत्र जैसी संस्थाओं का निर्माण कर पाता। अरस्तू ने कहा था- “मनुष्य स्वभावतः सामाजिक प्राणी है।” यह सामाजिकता केवल साथ रहने का माध्यम नहीं, बल्कि अस्तित्व की आवश्यकता है। मनुष्य की व्यक्तिगत शक्ति सीमित होती है, किंतु सामूहिक शक्ति उसे असाधारण बना देती है। यही कारण है कि भारतीय चिंतन “मैं” से अधिक “हम” की चेतना पर आधारित रहा है। उपनिषदों में उल्‍लेखित साथ चलो, साथ विचार करोमानव जीवन के इसी सामूहिक दर्शन को व्यक्त करता है।

 

प्रकृति में पानी की एक बूँद मिट्टी में खो जाती है, लेकिन लाखों बूँदें मिलकर नदी बन जाती हैं, जो पर्वतों को भी काट देती है। एक तिनका आसानी से टूट सकता है, किंतु तिनकों का समूह घोंसला बनाता है। मधुमक्खियाँ अकेले शहद नहीं बना सकतीं; उनका पूरा जीवन सहयोग पर आधारित है। चींटियों की छोटी-सी पंक्ति सामूहिक अनुशासन और श्रम से अपने से कई गुना बड़े कार्य पूरे कर लेती है। प्रकृति का यह शाश्वत नियम है कि सहयोग जीवन को स्थायित्व देता है और विखंडन विनाश को जन्म देता है।

 

आज के डिजिटल और प्रतिस्पर्धी युग में मनुष्य पहले से अधिक जुड़ा हुआ दिखाई देता है, लेकिन भीतर से अधिक अकेला होता जा रहा है। मानसिक तनाव, अवसाद और सामाजिक अलगाव का बढ़ना इसी का परिणाम है। परिवारों में सहयोग समाप्त होते ही संबंध टूटने लगते हैं। समाज में संवाद और विश्वास कमजोर पड़ते ही विघटन प्रारंभ हो जाता है। बाढ़, महामारी या किसी प्राकृतिक आपदा के समय सबसे पहले पड़ोसी ही एक-दूसरे का हाथ पकड़ते हैं; वहीं से समाज की वास्तविक शक्ति दिखाई देती है। ऐसे समय में यह कहावत हमें याद दिलाती है कि जीवन केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सहभागिता भी है। स्वामी विवेकानंद ने कहा था-“संगठन में ही शक्ति है।” यह शक्ति केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि मानसिक, सामाजिक और आध्यात्मिक भी होती है।

 

1857 का विद्रोह वीरता के बावजूद इसलिए असफल हुआ क्योंकि उसमें व्यापक संगठन और साझा रणनीति का अभाव था। दूसरी ओर, महात्मा गांधी के नेतृत्व में जब करोड़ों भारतीय एक साथ खड़े हुए, तब ब्रिटिश साम्राज्य जैसी विशाल शक्ति भी टिक नहीं सकी। नमक सत्याग्रह, असहयोग आंदोलन और भारत छोड़ो आंदोलन सामूहिक चेतना और जनशक्ति की अभूतपूर्व अभिव्यक्ति थे। गांधी स्वयं महान थे, किंतु यदि किसान, मजदूर, महिलाएँ और सामान्य नागरिक उनके साथ न जुड़ते, तो स्वतंत्रता आंदोलन इतिहास नहीं बन पाता। नेल्सन मंडेला ने ठीक ही कहा था- “कोई व्यक्ति अकेले इतिहास नहीं बदलता, इतिहास तब बदलता है जब लोग साथ खड़े होते हैं।”

 

अमूल जैसी सहकारी संस्था लाखों छोटे किसानों और दुग्ध उत्पादकों की साझा शक्ति का परिणाम है। यदि प्रत्येक किसान अकेले बाजार से लड़ता, तो वह असफल हो जाता लेकिन संगठन ने उन्हें सम्मान और आत्मनिर्भरता दी। स्वयं सहायता समूहों ने ग्रामीण महिलाओं के जीवन को बदला है। एक अकेली महिला बैंक जाने में संकोच करती थी, किंतु समूह ने उसे आत्मविश्वास और आर्थिक स्वतंत्रता प्रदान की।

 

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21वीं सदी की वैश्विक चुनौतियाँ जैसे जलवायु परिवर्तन, महामारी, आतंकवाद और आर्थिक असमानताएं आदि किसी एक राष्ट्र द्वारा हल नहीं की जा सकतीं। कोविड-19 ने पूरी दुनिया को यह सिखाया कि मानवता का भविष्य सहयोग पर निर्भर है। वैज्ञानिकों ने डेटा साझा किया, देशों ने वैक्सीन सहयोग किया और वैश्विक संस्थाओं ने मिलकर संकट से लड़ने का प्रयास किया। इसी प्रकार जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पेरिस समझौता, अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन और सतत विकास लक्ष्य (SDGs) सामूहिक वैश्विक प्रयासों के उदाहरण हैं। पृथ्वी का भविष्य “मैं” से नहीं, बल्कि “हम” से सुरक्षित होगा।

 

लोकतंत्र की पूरी अवधारणा भी इसी सिद्धांत पर आधारित है। लोकतंत्र केवल चुनाव नहीं, बल्कि सामूहिक सहभागिता की संस्कृति है। पंचायत से संसद तक निर्णय सामूहिक सहमति से लिए जाते हैं। सहकारी संघवाद भी इसी विचार को मजबूत करता है, जहाँ केंद्र और राज्य मिलकर राष्ट्रीय विकास की दिशा तय करते हैं। प्रशासन केवल आदेशों से नहीं चलता बल्कि उसमें जनता की भागीदारी, विश्वास और सहयोग आवश्यक होता है। स्वच्छ भारत मिशन, पोलियो उन्मूलन और जल संरक्षण जैसे अभियानों की सफलता भी तभी संभव हुई जब सरकार और समाज साथ आए। कोई भी नीति तभी सफल होती है जब जनता उसमें सहयोग देती है।

 

हालाँकि, इस कहावत से यह अर्थ नहीं निकाला जा सकता कि व्यक्ति महत्‍वहीन है। इतिहास में अनेक बार परिवर्तन की शुरुआत एक अकेले व्यक्ति से हुई है। बुद्ध अकेले निकले, विवेकानंद अकेले शिकागो पहुँचे और उनका अकेलापन अंततः सामूहिक चेतना का बीज बना। इसलिए सही अर्थ यह है कि व्यक्ति दिशा देता है, किंतु परिवर्तन समाज मिलकर करता है।

 

अंततः, “अकेला चना भाड़ न फोड़ सकेला” केवल एक लोककहावत नहीं, बल्कि मानव सभ्यता का मूल दर्शन है जो यह सिखाती है कि सहयोग कमजोरी नहीं, बल्कि सबसे बड़ी शक्ति है। सभ्यता की सबसे बड़ी उपलब्धियाँ किसी एक व्यक्ति की नहीं, बल्कि सामूहिक श्रम, साझा विश्वास और संयुक्त संकल्प की देन हैं। आज जब दुनिया विभाजन, असहिष्णुता और संकीर्ण स्वार्थों से जूझ रही है, तब यह कहावत और भी अधिक प्रासंगिक हो जाती है।

 

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