71th BPSC Mains PYQ- History Short Q&A
Write short notes on the following: निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :
- Birsa Munda Movement, बिरसा मुंडा आंदोलन [7]
- Indian Councils Act, 1909 [7], भारतीय परिषद अधिनियम, 1909
- Impact of Western Education in Bihar (1858-1914) [6], बिहार में पश्चिमी शिक्षा का प्रभाव (1858-1914)
- Jay Prakash Narayan and Quit India Movement [6], जयप्रकाश नारायण और भारत छोड़ो आंदोलन
- Pala Art of Eastern India [6], पूर्वी भारत की पाल कला
- Rabindranath Tagore's Contribution to Indian Culture [6], भारतीय संस्कृति में रवीन्द्रनाथ टैगोर का योगदान
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Write short notes
on the following: निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए :
Birsa
Munda Movement, बिरसा मुंडा आंदोलन
उत्तर - उन्नीसवीं
शताब्दी के उत्तरार्ध में छोटानागपुर क्षेत्र में बिरसा मुंडा के नेतृत्व में
संचालित उलगुलान (महाविद्रोह) भारतीय जनजातीय प्रतिरोध का एक महत्वपूर्ण आंदोलन
था। यह केवल ब्रिटिश शासन के विरुद्ध विद्रोह नहीं, बल्कि जल, जंगल, जमीन और जनजातीय अस्मिता की रक्षा का संघर्ष
था।
आंदोलन
के प्रमुख कारण
- भूमि अधिकारों का हनन- ब्रिटिश नीतियों से पारंपरिक खूँटकट्टी व्यवस्था कमजोर हुई।
- आर्थिक शोषण-जमींदारों, महाजनों
और ठेकेदारों द्वारा आदिवासियों का शोषण।
- सांस्कृतिक हस्तक्षेप-मिशनरी
गतिविधियों,
औपनिवेशिक नीतियों से जनजातीय पहचान पर संकट।
- वन नीतियाँ- वन संसाधनों पर पारंपरिक अधिकारों का ह्रास।
आंदोलन
का स्वरूप
1895-1900 के बीच
बिरसा मुंडा ने "अपना राज स्थापित होगा, रानी का राज समाप्त
होगा" का आह्वान किया। आंदोलन ने राजनीतिक प्रतिरोध के साथ-साथ
सामाजिक-सांस्कृतिक नवजागरण का रूप भी ग्रहण किया। बिरसा ने अंधविश्वासों और
सामाजिक कुरीतियों का विरोध कर जनजातीय समाज में आत्मसम्मान और एकता की भावना
विकसित की।
महत्व
एवं परिणाम
- जनजातीय चेतना उदय तथा स्वशासन की भावना का विकास।
- ब्रिटिश प्रशासन को जनजातीय प्रश्नों पर विचार हेतु बाध्य किया।
- छोटानागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 लागू हुआ।
- जनजातीय भूमि के गैर-जनजातीय हस्तांतरण पर नियंत्रण हुआ।
- स्वतंत्रता संग्राम में जनजातीय योगदान को नई पहचान मिली।
निष्कर्षत: बिरसा
मुंडा आंदोलन केवल भूमि-संघर्ष नहीं था, बल्कि सामाजिक सुधार,
सांस्कृतिक अस्मिता और स्वशासन की स्थापना का आंदोलन था। इसलिए
बिरसा मुंडा आज भी जनजातीय स्वाभिमान, प्रतिरोध और अधिकारों
के प्रतीक के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
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Indian
Councils Act, 1909 [7], भारतीय परिषद अधिनियम, 1909
उतर- भारतीय परिषद
अधिनियम,
1909, जिसे मार्ले-मिंटो सुधार कहा जाता है,
ब्रिटिश भारत में संवैधानिक विकास का एक महत्वपूर्ण चरण था। इसे
भारत सचिव जॉन मार्ले और तथा वायसराय लार्ड मिंटो के नाम पर जाना जाता है। इसका
उद्देश्य राष्ट्रवादी आंदोलन को शांत करना तथा भारतीयों को सीमित राजनीतिक
भागीदारी देना था।
प्रमुख
प्रावधान
- केंद्रीय एवं प्रांतीय विधान परिषदों का विस्तार किया गया।
- पहली बार अप्रत्यक्ष निर्वाचन प्रणाली को मान्यता मिली।
- सदस्यों को बजट पर चर्चा तथा प्रश्न पूछने का सीमित अधिकार मिला।
- वायसराय की कार्यकारिणी परिषद में भारतीय सदस्य नियुक्त करने का प्रावधान जिसके फलस्वरूप सत्येन्द्र प्रसाद सिन्हा पहले भारतीय सदस्य बने।
- मुसलमानों के लिए पृथक निर्वाचन की व्यवस्था की गई जिसने द्विराष्ट्र सिद्धांत और विभाजन की राजनीति को अप्रत्यक्ष रूप से बल प्रदान किया।
यह अधिनियम एक ओर
प्रतिनिधिक शासन की शुरुआत का प्रतीक था तो दूसरी ओर "फूट डालो और शासन
करो" की औपनिवेशिक नीति का भी परिचायक था।
सकारात्मक
पक्ष
- भारत में प्रतिनिधिक शासन की दिशा में प्रारम्भिक कदम।
- चुनाव सिद्धांत का प्रथम संस्थागत प्रयोग।
- भारतीयों की प्रशासनिक भागीदारी में वृद्धि।
नकारात्मक
पक्ष
- वास्तविक सत्ता ब्रिटिश अधिकारियों के हाथों में ही रही।
- पृथक निर्वाचन ने सांप्रदायिक राजनीति को संस्थागत स्वरूप दिया।
- राष्ट्रवादियों ने इसे "बहुत कम और बहुत देर से" किया गया सुधार माना।
निष्कर्षत:
मार्ले-मिंटो सुधार भारतीय संवैधानिक विकास की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे, परंतु
पृथक निर्वाचन प्रणाली ने आगे चलकर सांप्रदायिक राजनीति को बढ़ावा दिया जिससे
"फूट डालो और शासन करो" की औपनिवेशिक नीति को बल मिला।
Impact
of Western Education in Bihar (1858-1914) [6], बिहार में पश्चिमी
शिक्षा का प्रभाव (1858-1914)
उतर-1858 के बाद
ब्रिटिश शासन के अधीन पश्चिमी शिक्षा के प्रसार ने बिहार के सामाजिक, बौद्धिक
और राजनीतिक जीवन में महत्वपूर्ण परिवर्तन उत्पन्न किए। यह आधुनिक चेतना और
राष्ट्रवाद के विकास का प्रमुख माध्यम बनी।
प्रमुख
प्रभाव
- शैक्षिक संस्थाओं
का विकास- Patna
College तथा Bihar School of Engineering जैसे
संस्थानों ने आधुनिक एवं तकनीकी शिक्षा को बढ़ावा दिया।
- शिक्षित मध्यम वर्ग
का उदय- वकीलों,
शिक्षकों, पत्रकारों और प्रशासकों का नया वर्ग
उभरा, जिसने सामाजिक एवं राजनीतिक नेतृत्व प्रदान किया।
- सामाजिक जागरण-जातिगत रूढ़ियों,
अंधविश्वासों तथा सामाजिक कुरीतियों की आलोचना को बल मिला।
- राष्ट्रवादी चेतना
का विकास-आधुनिक शिक्षा ने स्वतंत्रता, समानता और संवैधानिक
अधिकारों के विचारों का प्रसार किया, जिससे बिहार राष्ट्रीय
आंदोलन का सक्रिय केंद्र बना।
- वैज्ञानिक एवं तार्किक दृष्टिकोण- समाज में आलोचनात्मक सोच और आधुनिक मूल्यों का विकास हुआ।
सीमाएँ
- शिक्षा का लाभ मुख्यतः शहरी एवं उच्चवर्गीय समूहों तक सीमित रहा।
- ग्रामीण जनता, महिलाओं
तथा वंचित वर्गों की भागीदारी अपेक्षाकृत कम रही।
पश्चिमी शिक्षा ने
बिहार में आधुनिक बौद्धिक चेतना, सामाजिक सुधार और राष्ट्रवादी राजनीति
की नींव रखी। यद्यपि इसका प्रसार सीमित था, फिर भी इसने
बिहार को पारंपरिक समाज से आधुनिक समाज की ओर अग्रसर करने में निर्णायक भूमिका
निभाई।
Jay
Prakash Narayan and Quit India Movement [6], जयप्रकाश नारायण और
भारत छोड़ो आंदोलन
उत्तर- जय प्रकाश
नारायण भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के प्रमुख समाजवादी नेता थे। 1942 के भारत छोड़ो
आंदोलन में उन्होंने ब्रिटिश दमन के बीच आंदोलन को जीवित रखने में केंद्रीय भूमिका
निभाई।
प्रमुख
योगदान
- अगस्त 1942 में हज़ारीबाग केंद्रीय कारागार से अपने साथियों के साथ साहसिक ढंग से फरार होकर पुनः आंदोलन में सक्रिय हुए।
- राम मनोहर लोहिया एवं अरुणा आसफ अली के साथ मिलकर भूमिगत आंदोलन का नेतृत्व किया।
- गुप्त प्रचार, संदेश-संचार
और संगठन के माध्यम से ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनप्रतिरोध को बनाए रखा।
- नेपाल में "आजाद दस्ता" का गठन कर क्रांतिकारी कार्यकर्ताओं को संगठित किया।
- युवाओं और विद्यार्थियों को आंदोलन से जोड़कर उसे जन-आंदोलन का स्वरूप दिया।
महत्त्व
- गांधी, नेहरू
और पटेल जैसे शीर्ष नेताओं की गिरफ्तारी के बाद आंदोलन को नेतृत्व प्रदान किया।
- बिहार सहित उत्तर भारत में भारत छोड़ो आंदोलन को नई ऊर्जा दी।
- उनके साहस और संगठनात्मक क्षमता ने ब्रिटिश शासन की दमनात्मक नीति को चुनौती दी।
निष्कर्षत:
जयप्रकाश नारायण भारत छोड़ो आंदोलन के सबसे प्रभावशाली भूमिगत नेताओं में थे।
हज़ारीबाग जेल से पलायन,
भूमिगत संगठन तथा आजाद दस्ता के गठन ने उन्हें स्वतंत्रता संग्राम
के साहसी और संघर्षशील नायकों की अग्रिम पंक्ति में स्थापित किया। इसी कारण वे
भारतीय इतिहास में "लोकनायक" के रूप में स्मरण किए जाते हैं।
Pala
Art of Eastern India [6], पूर्वी भारत की पाल कला
उत्तर- पाल शासकों
के संरक्षण में बिहार एवं बंगाल क्षेत्र में विकसित पाल कला भारतीय बौद्ध कला की
अंतिम महान शास्त्रीय परंपरा मानी जाती है। इसका विकास मुख्यतः महायान एवं वज्रयान
बौद्ध धर्म के प्रभाव में हुआ तथा इसने भारतीय कला को अंतरराष्ट्रीय पहचान प्रदान
की। इसकी प्रमुख विशेषताएँ निम्न है-
लघु
चित्रकला
- ताड़पत्रों एवं बौद्ध ग्रंथों पर सूक्ष्म चित्रांकन।
- लाल, पीले,
नीले एवं काले रंगों का संतुलित प्रयोग।
- बुद्ध, तारा,
अवलोकितेश्वर तथा अन्य बौद्ध देवताओं का चित्रण प्रमुख विषय।
मूर्तिकला
- काले बेसाल्ट पत्थर एवं कांस्य धातु का व्यापक उपयोग।
- मूर्तियों में
सौम्य मुखमुद्रा,
सूक्ष्म अलंकरण तथा आध्यात्मिक गरिमा का सुंदर समन्वय।
- बुद्ध, बोधिसत्त्व,
तारा एवं मंजुश्री की प्रतिमाएँ विशेष रूप से उल्लेखनीय।
वास्तुकला
- प्रमुख विशेषता- ईंट-निर्मित
महाविहार एवं मंदिर।
- उत्कृष्ट उदाहरण - सोमपुरा,
विक्रशिला, नालंदा तथा ओदंतपुरी महाविहार।
पाल कला बौद्ध
शिक्षा,
सांस्कृतिक आदान-प्रदान तथा भारतीय कला की वैश्विक पहुँच का सशक्त
माध्यम बनी और इस कला ने नेपाल, तिब्बत तथा दक्षिण-पूर्व
एशिया की बौद्ध कला पर गहरा प्रभाव डाला।
निष्कर्षत: पाल कला
पूर्वी भारत की सांस्कृतिक समृद्धि और बौद्ध परंपरा का उत्कृष्ट प्रतीक है। अपनी
परिष्कृत मूर्तिकला,
लघु चित्रकला एवं महाविहार स्थापत्य के कारण यह भारतीय कला इतिहास
की सर्वाधिक प्रभावशाली एवं अंतरराष्ट्रीय प्रभाव वाली कलात्मक परंपराओं में गिनी
जाती है।
Rabindranath
Tagore's Contribution to Indian Culture [6], भारतीय संस्कृति में
रवीन्द्रनाथ टैगोर का योगदान
उत्तर- “गुरुदेव”
रविन्द्रनाथ टैगोर भारतीय सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रमुख शिल्पी थे। उन्होंने
भारतीय परंपरा और पाश्चात्य आधुनिकता के बीच सेतु का कार्य करते हुए साहित्य, संगीत,
शिक्षा और सामाजिक चिंतन के माध्यम से भारतीय संस्कृति को वैश्विक
पहचान प्रदान की। भारतीय संस्कृति में उनके प्रमुख योगदान निम्न हैं
साहित्यिक
पुनर्जागरण- गीतांजलि, गोरा,
आदि कृतियों के माध्यम से भारतीय आध्यात्मिकता, प्रकृति-प्रेम और मानवीय संवेदनाओं को अभिव्यक्ति दी। 1913 में गीतांजलि
के लिए साहित्य का नोबेल पुरस्कार प्राप्त कर उन्होंने भारतीय साहित्य को विश्व
मंच पर प्रतिष्ठित किया।
संगीत
एवं सांस्कृतिक राष्ट्रवाद- भारत का राष्ट्रगान
“जन गण मन” तथा बांग्लादेश का राष्ट्रगान “अमर सोनार बांग्ला” उनकी सांस्कृतिक
विरासत के अमर प्रतीक हैं। “एकला चलो रे” जैसे गीतों ने राष्ट्रीय चेतना को नई
ऊर्जा प्रदान की।
शिक्षा
में नवाचार- 1901
में शांति निकेतन तथा 1921 में विश्व-भारती विश्वविद्यालय की स्थापना कर उन्होंने
प्रकृति-आधारित,
सृजनात्मक और मानवतावादी शिक्षा का मॉडल प्रस्तुत किया, जो औपनिवेशिक शिक्षा व्यवस्था का वैकल्पिक दृष्टिकोण था।
सामाजिक
एवं सांस्कृतिक सुधार- टैगोर ने जातिवाद, सांप्रदायिकता
और सामाजिक असमानता का विरोध किया। उनका मानवतावादी दृष्टिकोण भारतीय संस्कृति में
उदारता, सहिष्णुता और विश्वबंधुत्व के मूल्यों को सुदृढ़
करता है।
रवीन्द्रनाथ टैगोर
केवल एक कवि नहीं,
बल्कि भारतीय सांस्कृतिक चेतना के विश्वदूत थे। उनकी बहुआयामी
विरासत आज भी भारतीय संस्कृति की सार्वभौमिकता और जीवंतता का आधार बनी हुई है।
केवल 199/- रु. में 72th BPSC Mains का कंटेट
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- इसकी सदस्यता शुल्क 199/- है। लेकिन अभी 25 जून 2026 तक इसका शुल्क 100/- रखा गया है।
- इसमें केवल मुख्य परीक्षा से संबंधित कंटेट (GK BUCKET Notes का अध्यायवार पीडीएफ, उत्तर लेखन ग्रुप का मॉडल उत्तर ) पीडीएफ शेयर किया जाएगा।
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