Jun 9, 2026

औद्योगिक विस्तार के युग में पर्यावरणीय जिम्मेदारी

 औद्योगिक विस्तार के युग में पर्यावरणीय जिम्मेदारी

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प्रकृति मनुष्य की आवश्यकता पूरी कर सकती है, लेकिन उसके लालच को नहीं।”-महात्मा गांधी

 

मानव सभ्यता का इतिहास विकास, नवाचार और प्रकृति के साथ उसके संबंधों का इतिहास है। औद्योगिक क्रांति के बाद से मानव ने अभूतपूर्व आर्थिक प्रगति की है। बिजली, परिवहन, संचार, चिकित्सा और डिजिटल तकनीक ने जीवन को अधिक सुविधाजनक बनाया है। किंतु इस विकास की एक गंभीर कीमत भी चुकानी पड़ी है - प्रदूषित नदियाँ, विषैली हवा, घटते वन, पिघलते ग्लेशियर और असंतुलित जलवायु। आज विश्व एक ऐसे मोड़ पर खड़ा है जहाँ प्रश्न केवल औद्योगिक विकास का नहीं, बल्कि उसके नैतिक और पर्यावरणीय परिणामों का भी है और आज की सबसे बड़ी चुनौती विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संतुलन स्थापित करना है।

 

औद्योगिक विस्तार ने विश्व अर्थव्यवस्था को नई गति दी है। आज भारत विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनने की ओर अग्रसर है। किन्तु विकास की इस चमक के पीछे गहरी पर्यावरणीय चिंताएं भी मौजूद है। IPCC के अनुसार औद्योगिक गतिविधियों के कारण वैश्विक तापमान लगभग 1.1°C बढ़ चुका है और वातावरण में कार्बन डाइऑक्साइड की मात्रा अत्‍यधिक हो गयी है। भारत के संदर्भ में देखे तो दिल्ली की जहरीली हवा, यमुना का प्रदूषण, हिमालयी पारिस्थितिकी का संकट और अनियमित मानसून इस असंतुलित विकास के प्रत्यक्ष उदाहरण हैं।

 

औद्योगिक विस्तार का सबसे गंभीर प्रभाव जलवायु परिवर्तन के रूप में सामने आया है। बढ़ते तापमान ने सूखा, बाढ़, चक्रवात और हीटवेव जैसी आपदाओं की तीव्रता बढ़ा दी है। उत्तराखंड की आपदाएँ, केरल की बाढ़, राजस्थान की असामान्य वर्षा और समुद्री तटीय क्षेत्रों में कटाव इस संकट की चेतावनी हैं। यह केवल पर्यावरणीय संकट नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक संकट भी है।

 

कारखानों की चिमनियों से उठता धुआँ केवल आसमान को नहीं, भविष्य को भी धुंधला कर रहा है।”

 

सबसे बड़ी विडंबना यह है कि जलवायु परिवर्तन का प्रभाव उन समुदायों पर अधिक पड़ता है जिन्होंने प्रदूषण सबसे कम किया है। छोटे किसान, आदिवासी समुदाय, तटीय आबादी और गरीब देश इसके सबसे बड़े पीड़ित हैं। इसे “जलवायु न्याय” का प्रश्न कहा जाता है। यदि विकास कुछ वर्गों की समृद्धि के लिए करोड़ों लोगों के जीवन और भविष्य को संकट में डाल दे, तो वह विकास नैतिक रूप से अधूरा है।

 

भारतीय चिंतन परंपरा सदैव प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व की बात करती रही है। अथर्ववेद में कहा गया है - “माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः” अर्थात् पृथ्वी हमारी माता है। भारतीय संस्कृति में नदियों, पर्वतों, वृक्षों और पशुओं को केवल संसाधन नहीं, बल्कि जीवन का अंग माना गया। आधुनिक औद्योगिक मॉडल ने प्रकृति को “संसाधनके रूप में देखा, जबकि भारतीय दृष्टि ने उसे “साथीके रूप में स्वीकार किया। यही दृष्टिकोण आज सतत विकास की वैश्विक अवधारणा में दिखाई देता है।

 

रवीन्द्रनाथ टैगोर ने कहा था - “प्रकृति से कट जाना मनुष्य की सबसे बड़ी दरिद्रता है।” आज यह दरिद्रता केवल अस्तित्वगत संकट बन चुकी है। मनुष्य ने विकास की दौड़ में पृथ्वी को केवल बाज़ार समझ लिया, जबकि वह जीवन का आधार थी। उल्‍लेखनीय है कि औद्योगिक विकास और पर्यावरणीय जिम्मेदारी परस्पर विरोधी नहीं हैं बल्कि सही नीति और तकनीक के माध्यम से दोनों साथ साथ चल सकते है। हरित औद्योगिकीकरण, नवीकरणीय ऊर्जा, सर्कुलर इकोनॉमी, स्वच्छ तकनीक और ऊर्जा दक्षता इस दिशा में महत्त्वपूर्ण प्रयास हैं।

 

 



2070 तक नेट-ज़ीरो उत्सर्जन का लक्ष्य, अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन, राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन और 500 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का संकल्प भारत की पर्यावरणीय प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं। “नमामि गंगे”, “स्वच्छ भारत अभियान” और “मिशन लाइफजैसे कार्यक्रम पर्यावरणीय चेतना को सामाजिक आंदोलन में बदलने का प्रयास हैं। विशेष रूप से “सर्कुलर इकोनॉमी” भविष्य का सबसे व्यावहारिक मॉडल बन सकती है। वर्तमान आर्थिक मॉडल “उत्पादन-उपयोग-निपटान” पर आधारित है, जबकि सर्कुलर इकोनॉमी “उत्पादन-उपयोग-पुनर्चक्रण” की अवधारणा प्रस्तुत करती है। इससे संसाधनों का संरक्षण, प्रदूषण में कमी और हरित रोजगार सृजन संभव है।

 

पर्यावरणीय जिम्मेदारी केवल सरकारों या उद्योगों तक सीमित नहीं हो सकती। यह व्यक्ति, समाज, कॉर्पोरेट और राज्य- सभी की साझा जिम्मेदारी है। उद्योगों को पर्यावरणीय, सामाजिक और प्रशासनिक  मानकों को अपनाना होगा। “प्रदूषणकर्ता भुगतान सिद्धांत” को प्रभावी रूप से लागू करना होगा। उपभोक्ताओं को भी विवेकपूर्ण उपभोग, ऊर्जा संरक्षण और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनानी होगी।

 

जितनी तेजी से तकनीक विकसित हुई है, उतनी तेजी से मानवीय विवेक नहीं।”

 

यही कारण है कि आज केवल तकनीकी समाधान पर्याप्त नहीं हैं; नैतिक दृष्टिकोण भी आवश्यक है। यदि विकास केवल GDP वृद्धि तक सीमित रह जाए और मानव तथा प्रकृति के संबंधों को नष्ट कर दे, तो वह अंततः विनाश का कारण बनेगा। भारत की चुनौती यह है कि उसे गरीबी उन्मूलन और औद्योगिक विकास भी चाहिए तथा पर्यावरणीय संतुलन भी बनाए रखना है। इसलिए भारत को पश्चिमी देशों के प्रदूषण-आधारित औद्योगिक मॉडल के बजाए “सतत विकास” का संतुलित मॉडल अपनाना चाहिए।

 

निकर्षत: औद्योगिक विस्तार और पर्यावरणीय जिम्मेदारी के बीच संघर्ष नहीं, बल्कि संतुलन की आवश्यकता है। भविष्य की सबसे बड़ी उपलब्धि ऊँची इमारतें या विशाल कारखाने नहीं होंगे, बल्कि वह पृथ्वी होगी जिसे हम आने वाली पीढ़ियों के लिए सुरक्षित छोड़ पाएँगे। यदि विकास पृथ्वी को ही रहने योग्य न छोड़े, तो वह प्रगति नहीं, विनाश है। इसलिए आर्थिक समृद्धि के साथ पर्यावरणीय संतुलन, सामाजिक न्याय और मानवीय उत्तरदायित्व को भी सुनिश्चित करना सतत भविष्य की वास्तविक आधारशिला है।


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