डालर निर्भरता में कमी और बदलती वैश्विक आर्थिक व्यवस्था
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BPSC Mains special Notes
“मुद्राएँ केवल आर्थिक उपकरण नहीं होतीं; वे वैश्विक शक्ति, विश्वास और प्रभुत्व की अभिव्यक्ति भी होती
हैं।”
21वीं सदी की वैश्विक
राजनीति केवल सीमाओं और सेनाओं का संघर्ष नहीं रही; अब यह
वित्तीय संस्थाओं, भुगतान प्रणालियों और मुद्राओं के प्रभाव का भी
संघर्ष बन चुकी है। कभी अमेरिकी डॉलर वैश्विक अर्थव्यवस्था का निर्विवाद केंद्र था
और तेल व्यापार से लेकर विदेशी मुद्रा भंडार तक, अंतरराष्ट्रीय
लेन-देन का अधिकांश हिस्सा उसी के इर्द-गिर्द घूमता था। किंतु आज विश्व व्यवस्था
एक मौन किंतु गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध, अमेरिकी प्रतिबंधों की राजनीति, चीन का आर्थिक उदय, BRICS का विस्तार और डिजिटल मुद्राओं का विकास—इन सबने
“डी-डॉलराइजेशन” अर्थात डॉलर निर्भरता में कमी की प्रक्रिया को तेज कर दिया है। यह
केवल मुद्रा परिवर्तन नहीं, बल्कि बदलते वैश्विक शक्ति-संतुलन का संकेत है।
द्वितीय विश्वयुद्ध के
बाद 1944 के ब्रेटन वुड्स समझौते ने डॉलर को वैश्विक आरक्षित मुद्रा का दर्जा
दिया। अमेरिका की आर्थिक और सैन्य शक्ति ने डॉलर को विश्व व्यापार का आधार बना
दिया। 1970 के दशक में पेट्रोडॉलर व्यवस्था के कारण तेल व्यापार भी डॉलर में होने
लगा, जिससे उसकी स्थिति और मजबूत हुई। परिणामतः विश्व की
अर्थव्यवस्था अमेरिकी मौद्रिक नीतियों पर अत्यधिक निर्भर हो गई। आज भी वैश्विक
विदेशी मुद्रा भंडार का लगभग 57% हिस्सा डॉलर में है, किंतु
यह उल्लेखनीय है कि वर्ष 2001 में यह हिस्सा 72% था। यह गिरावट इस बात का संकेत है
कि विश्व धीरे-धीरे वैकल्पिक वित्तीय ढाँचों की ओर बढ़ रहा है।
डॉलर निर्भरता में कमी
के पीछे सबसे बड़ा कारण भू-राजनीतिक अविश्वास है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद
पश्चिमी देशों द्वारा रूस के लगभग 300 अरब डॉलर के विदेशी मुद्रा भंडार को फ्रीज़
करना एक ऐतिहासिक घटना थी। इससे अनेक देशों को यह एहसास हुआ कि डॉलर-आधारित
वित्तीय व्यवस्था केवल आर्थिक नहीं,
बल्कि राजनीतिक नियंत्रण का माध्यम
भी बन सकती है। ईरान, वेनेजुएला और रूस पर अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस
आशंका को और गहरा किया। यही कारण है कि कई राष्ट्र अब अपनी आर्थिक संप्रभुता
सुरक्षित रखने के लिए वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों और स्थानीय मुद्रा व्यापार की ओर
बढ़ रहे हैं।
चीन इस परिवर्तन का सबसे
सक्रिय खिलाड़ी बनकर उभरा है। उसने SWIFT के विकल्प के रूप
में क्रास बार्डर इंटरबैंक पेमेंट सिस्टम विकसित किया है, जिससे
2026 तक 100 से अधिक देश जुड़ चुके हैं। चीन युआन आधारित व्यापार को बढ़ावा दे रहा
है, विशेषकर ऊर्जा व्यापार में। रूस और चीन के बीच अधिकांश
व्यापार अब डॉलर के बजाय स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। BRICS देशों ने भी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने तथा एक
साझा डिजिटल भुगतान प्रणाली विकसित करने की दिशा में पहल की है। यह परिवर्तन इस
बात का संकेत है कि विश्व धीरे-धीरे एक बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था की ओर बढ़ रहा
है।
हालाँकि यह मान लेना
जल्दबाजी होगी कि डॉलर का वर्चस्व शीघ्र समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी ट्रेज़री बाजार
आज भी विश्व का सबसे सुरक्षित और तरल वित्तीय बाजार माना जाता है। संकट के समय
निवेशक अब भी डॉलर को “Safe
Haven” के रूप में देखते हैं। इसके
अतिरिक्त, युआन अभी पूर्णतः परिवर्तनीय मुद्रा नहीं है और
यूरो अपनी राजनीतिक सीमाओं से जूझ रहा है। इसलिए निकट भविष्य में डॉलर का पूर्ण
विकल्प उभरना कठिन प्रतीत होता है। किंतु यह भी उतना ही सत्य है कि विश्व अब
एकमात्र मुद्रा पर निर्भर रहने को लेकर पहले जितना आश्वस्त नहीं है।
भारत के लिए यह परिवर्तन
चुनौती और अवसर दोनों लेकर आया है। भारत अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा
आयात करता है, इसलिए डॉलर में उतार-चढ़ाव सीधे उसकी
अर्थव्यवस्था को प्रभावित करता है। इसी कारण भारत ने “मुद्रा विविधीकरण” की
व्यावहारिक नीति अपनाई है। रूस,
UAE और अन्य देशों के साथ स्थानीय
मुद्रा व्यापार, स्पेशल रूपी वास्ट्रो एकाउंट की व्यवस्था तथा
डिजिटल रुपया की दिशा में RBI की पहल इसी रणनीति का हिस्सा हैं। भारत BRICS के भीतर भी संतुलित भूमिका निभा रहा है। एक ओर वह
पश्चिमी देशों से आर्थिक संबंध बनाए रखना चाहता है, वहीं
दूसरी ओर वैश्विक दक्षिण की आर्थिक आकांक्षाओं का प्रतिनिधित्व भी करता है। यहाँ
भारत की “रणनीतिक स्वायत्तता” विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हो जाती है। भारत खुलकर
अमेरिकी-विरोधी डी-डॉलराइजेशन का समर्थन नहीं करता, बल्कि
बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था में संतुलन बनाने का प्रयास करता है।
इस बदलती आर्थिक
व्यवस्था में ब्लॉकचेन, डिजिटल भुगतान और केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्राएँ
अंतरराष्ट्रीय वित्त को नई दिशा दे रही
हैं। भविष्य में संभव है कि सीमापार व्यापार में डिजिटल मुद्राएँ डॉलर की भूमिका
को आंशिक रूप से चुनौती दें। चीन का डिजिटल युआन, यूरोपीय
संघ की डिजिटल यूरो परियोजना और भारत का डिजिटल रुपया इसी दिशा में संकेत देते
हैं।
इतिहास बताता है कि जब
भी किसी एक शक्ति का अत्यधिक केंद्रीकरण हुआ है, विश्व
ने संतुलन स्थापित करने के नए मार्ग खोजे हैं। कभी पाउंड स्टर्लिंग का प्रभुत्व था, फिर डॉलर का युग आया, अब संभवतः विश्व बहुध्रुवीय मुद्रा व्यवस्था की
ओर बढ़ रहा है। यह परिवर्तन केवल आर्थिक नहीं, बल्कि
वैश्विक न्याय और प्रतिनिधित्व का प्रश्न भी है। हांलांकि यह प्रक्रिया जोखिमों से
मुक्त नहीं है। यदि वैश्विक वित्तीय प्रणाली अत्यधिक खंडित होती है तो व्यापारिक
अनिश्चितता, मुद्रा अस्थिरता और आर्थिक ध्रुवीकरण बढ़ सकता
है। प्रतिस्पर्धी मुद्रा गुट वैश्विक सहयोग कमजोर भी कर सकते हैं। इसलिए परिवर्तन
प्रतिस्पर्धा के बजाय सहयोग के आधार पर होना चाहिए। बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था
तभी सफल होगी जब वह विश्वास, पारदर्शिता और साझा उत्तरदायित्व पर आधारित हो।
अंततः, डॉलर निर्भरता में कमी केवल आर्थिक घटना नहीं, बल्कि
बदलती विश्व राजनीति का दर्पण है। भारत जैसे देशों के लिए यह अवसर है कि वे अपनी
आर्थिक संप्रभुता को मजबूत करें,
तकनीकी नवाचार में नेतृत्व करें और
वैश्विक दक्षिण की आवाज़ को प्रभावी रूप से सामने रखें। 21वीं सदी का संघर्ष केवल
भूभाग या सैन्य शक्ति का नहीं होगा;
यह वित्तीय विश्वास, आर्थिक वैधता और संस्थागत संतुलन का संघर्ष होगा। जो राष्ट्र इस परिवर्तन
को दूरदृष्टि और संतुलन के साथ समझेंगे, वही भविष्य की विश्व
व्यवस्था को आकार देंगे।
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