Jun 29, 2026

प्रश्‍न- प्रारम्भिक संवैधानिक आंदोलन से लेकर जन-आंदोलन तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूपांतरण की चर्चा कीजिए तथा विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में विहार की भूमिका को रेखांकित कीजिए। 71th BPSC [38]

प्रश्‍न- प्रारम्भिक संवैधानिक आंदोलन से लेकर जन-आंदोलन तक भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के रूपांतरण की चर्चा कीजिए तथा विभिन्न ऐतिहासिक चरणों में विहार की भूमिका को रेखांकित कीजिए। 

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उत्‍तर- भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास देखा जाए तो संवैधानिक प्रयासों से प्रारम्भ होकर व्यापक जनभागीदारी वाले स्वतंत्रता संग्राम तक हुआ। राष्‍ट्रीय आंदोलन का यह रूपांतरण भारतीय राष्ट्रवाद की परिपक्वता, राजनीतिक चेतना के विस्तार तथा जनता की बढ़ती सहभागिता का परिणाम था जिसमें बिहार ने भी वैचारिक, राजनीतिक और जन-संघर्षात्मक योगदान दिया।

 


उदारवादी चरण (1885-1905) संवैधानिक राजनीति का दौर

  1. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के प्रारम्भिक नेताओं जैसे दादाभाई नौरोजी, गोपालकृष्ण गोखले एवं फिरोजशाह मेहता ने प्रार्थना-पत्र, याचिकाओं और संवैधानिक सुधारों के माध्यम से भारतीय हितों की रक्षा का प्रयास किया। इस चरण का उद्देश्य ब्रिटिश शासन में सुधार लाना था न कि उसे समाप्त करना।
  2. इस दौर में बिहार में शिक्षित मध्यम वर्ग, प्रेस तथा नवोदित राजनीतिक नेतृत्व के माध्यम से राष्ट्रीय चेतना का प्रसार हुआ जो आगे चलकर जन-आंदोलनों की आधारभूमि बना।

 

उग्रवादी चरण (1905-1919): राष्ट्रवाद का विस्तार

  1. यह चरण 1905 के बंग-भंग ने राष्ट्रीय आंदोलन को नई दिशा दी। स्वदेशी, बहिष्कार और राष्ट्रीय शिक्षा आंदोलनों के माध्यम से राष्ट्रवाद पहली बार व्यापक जनसमूह तक पहुँचा। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चन्द्र पाल ने संघर्षशील राष्ट्रवाद को बढ़ावा दिया।
  2. इस चरण में बिहार में स्वदेशी आंदोलन का प्रभाव दिखाई पड़ा। विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार, स्वदेशी उपयोग तथा राष्ट्रवादी विचारों के प्रसार ने राजनीतिक जागरण को गति दी।

 

गांधीवादी चरण (1919-1947): जन-आंदोलन का युग

  1. महात्मा गांधी ने सत्याग्रह और अहिंसा को आधार बनाकर राष्ट्रीय आंदोलन को किसानों, मजदूरों, महिलाओं और विद्यार्थियों से जोड़ दिया। असहयोग आंदोलन, सविनय अवज्ञा आंदोलन तथा भारत छोड़ो आंदोलन ने स्वतंत्रता संघर्ष को वास्तविक जन-आंदोलन का स्वरूप प्रदान किया।
  2. इस चरण में हुए चंपारण सत्याग्रह (1917) ने गांधीवादी राजनीति की प्रयोगशाला के रूप में बिहार को राष्ट्रीय आंदोलन के केंद्र में स्थापित किया। डॉ. राजेन्द्र प्रसाद, अनुग्रह नारायण सिंह और श्रीकृष्ण सिंह ने राष्ट्रीय आंदोलन को संगठनात्मक शक्ति प्रदान की। भारत छोड़ो आंदोलन (1942) में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में भूमिगत गतिविधियों ने बिहार को क्रांतिकारी प्रतिरोध का प्रमुख केंद्र बना दिया।

 


निष्‍कर्षत: कहा जा सकता है कि भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का विकास संवैधानिक राजनीति से हुआ जो क्रमिक रूप से जन-आधारित राष्ट्रीय संघर्ष में रुपांतरित हुआ। इस रूपांतरण में बिहार का चंपारण सत्‍याग्रह, डॉ. राजेन्द्र प्रसाद के संगठनात्मक नेतृत्व तथा जयप्रकाश नारायण के क्रांतिकारी योगदान आदि ने राष्ट्रवाद को जनशक्ति में परिवर्तित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई।


बिहार भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन का केवल सहभागी नहीं, बल्कि उसके जनाधारित स्वरूप के निर्माण का एक महत्वपूर्ण प्रेरक केंद्र था।



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