प्रश्न- मौर्य कला और वास्तुकला की प्रमुख विशेषताओं का विश्लेषण करें और आकलन करें कि उन्होंने उस काल के राजनीतिक और सांस्कृतिक मूल्यों को किस हद तक व्यक्त किया। [38] 71th BPSC
उत्तर-
मौर्य काल भारतीय इतिहास में प्रथम अखिल-भारतीय साम्राज्य का युग था। इस काल में
कला एवं वास्तुकला को राजकीय संरक्षण प्राप्त हुआ, जिसके परिणामस्वरूप
भारतीय कला ने पहली बार साम्राज्यवादी भव्यता और सांस्कृतिक परिष्कार का स्वरूप
ग्रहण किया। मौर्य कला केवल सौंदर्यबोध की अभिव्यक्ति नहीं थी, बल्कि तत्कालीन राजनीतिक शक्ति, प्रशासनिक दृष्टि
तथा सांस्कृतिक आदर्शों का भी दर्पण थी।
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राजकीय कला |
मौर्य कला का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण अशोक के एकाश्म प्रस्तर
स्तंभ हैं, जो सारनाथ, वैशाली, लौरिया नंदनगढ़ और रामपुरवा जैसे स्थलों
पर स्थापित किए गए। इन स्तंभों की पॉलिश उनकी विशिष्ट पहचान है जो
भारतीय कला की अद्वितीय उपलब्धि मानी जाती है। सारनाथ का सिंहशीर्ष भारत का
राष्ट्रीय प्रतीक है। |
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वास्तुकला |
मौर्यकालीन वास्तुकला में पाटलिपुत्र की सुव्यवस्थित नगर
योजना, विशाल राजप्रासाद तथा बराबर
एवं नागार्जुनी की शैलकृत गुफाएँ उल्लेखनीय हैं। अशोक द्वारा निर्मित एवं संरक्षित स्तूपों ने
बौद्ध वास्तुकला की आधारशिला रखी, जिनमें सांची स्तूप प्रमुख है। |
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मूर्तिकला एवं लोक कला |
इस काल में यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाएँ लोक
परंपराओं की सशक्त अभिव्यक्ति थीं। इन मूर्तियों में जनजीवन, लोकविश्वास और धार्मिक आस्थाओं का चित्रण
मिलता है। |
राजनीतिक एवं
सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति
मौर्य
कला और वास्तुकला केवल कलात्मक उपलब्धियाँ नहीं थीं, बल्कि वे राज्य की
विचारधारा तथा समाज की सांस्कृतिक चेतना का दृश्य रूप थीं। स्तंभ, शिलालेख, स्तूप और गुफाएँ राजनीतिक सत्ता एवं
सांस्कृतिक मूल्यों दोनों के वाहक बने।
राजनीतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति
- राजनीतिक एकीकरण- पूरे साम्राज्य में समान शैली के स्तंभों की स्थापना ने राजनीतिक एकीकरण को प्रदर्शित किया।
- शक्ति एवं वैधता-विशाल
स्तंभ,
राजप्रासाद और सिंहशीर्ष राजसत्ता की प्रतिष्ठा एवं सार्वभौमिकता के
प्रतीक थे।
- प्रशासनिक दक्षता-अशोक के शिलालेख शासक और प्रजा के मध्य संवाद तथा उत्तरदायी शासन को व्यक्त करते हैं।
सांस्कृतिक मूल्यों की अभिव्यक्ति
- धम्म, अहिंसा एवं नैतिकता-अशोक द्वारा प्रतिपादित धम्म का संदेश स्तंभों एवं शिलालेखों में स्पष्ट दिखाई देता है।
- धार्मिक सहिष्णुता-विभिन्न संप्रदायों के प्रति सम्मान और सह-अस्तित्व की भावना प्रोत्साहित किया गया।
- लोक संस्कृति संरक्षण -यक्ष-यक्षिणी प्रतिमाएँ स्थानीय परंपराओं एवं जनविश्वासों को अभिव्यक्त करती हैं।
यद्यपि
मौर्य कला ने तत्कालीन मूल्यों को व्यापक रूप से अभिव्यक्त किया फिर भी इसका
प्रमुख स्वरूप राजकीय था। अतः सामान्य जनजीवन और समाज के सभी वर्गों का
प्रतिनिधित्व सीमित रूप में ही दिखाई देता है।
निष्कर्षत:
मौर्य कला एवं वास्तुकला न केवल उस युग की कलात्मक उत्कृष्टता को दर्शाती हैं बल्कि
राजनीतिक केंद्रीकरण,
नैतिक शासन, धार्मिक सहिष्णुता तथा सांस्कृतिक
समन्वय की भी अभिव्यक्ति करती हैं।
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