Jul 10, 2026

71th BPSC GS-II भारतीय राजव्‍यवस्‍था प्रश्‍न एवं उत्‍तर

71th BPSC GS-II भारतीय राजव्‍यवस्‍था प्रश्‍न एवं उत्‍तर 

Write short answer of the following questions:
निम्नलिखित प्रश्नों के लघु उत्तर लिखिए :


Briefly describe the main features and significance of the 42nd Constitutional Amendment Act of 1976. [8]

संक्षेप में 42वे संविधान संशोधन अधिनियम 1976 की मुख्य विशेषताओं और महत्त्व की चर्चा करें।

उत्‍तर- आपातकाल (1975-77) के दौरान पारित 42वाँ संविधान संशोधन अधिनियम, 1976 भारतीय संविधान का सबसे व्यापक संशोधन माना जाता है क्‍योंकि इस संशोधन ने संविधान की मूल संरचना, केंद्र-राज्य संबंधों तथा न्यायपालिका-विधायिका संतुलन को गहराई से प्रभावित किया।

 

प्रमुख विशेषताएँ

  1. प्रस्तावना में परिवर्तन-प्रस्तावना में “समाजवादी”, “पंथनिरपेक्ष” तथा “अखंडता” शब्द जोड़े गए।
  2. मौलिक कर्तव्यों का समावेश- नागरिक उत्तरदायित्व और राष्ट्रभक्ति को प्रोत्साहित करने हेतु अनुच्छेद 51A के अंतर्गत नागरिकों के 10 मौलिक कर्तव्य जोड़े गए।
  3. केंद्र की शक्तियों का विस्तार-शिक्षा, वन एवं वन्यजीव जैसे विषयों को राज्य सूची से समवर्ती सूची में स्थानांतरित कर केंद्र को अधिक शक्तिशाली बनाया गया।
  4. न्यायपालिका की शक्तियों में कटौती-न्यायिक समीक्षा को सीमित करने तथा संसद की संशोधन शक्ति व्यापक बनाने का प्रयास किया।
  5. विधायिकाओं का कार्यकाल- लोकसभा और राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल 5 से बढ़ाकर 6 वर्ष किया गया।

 

महत्त्व

इस संशोधन ने सामाजिक न्याय, धर्मनिरपेक्षता तथा नागरिक कर्तव्यों को संवैधानिक आधार प्रदान करने के साथ प्रशासनिक केंद्रीकरण को मजबूत किया। हालाँकि, इसे न्यायपालिका की स्वतंत्रता, संघवाद तथा लोकतांत्रिक संतुलन पर आघात के रूप में भी देखा गया। बाद में मिनर्वा मिल्स वाद (1980) में सर्वोच्च न्यायालय ने इसके कुछ प्रावधानों को असंवैधानिक घोषित कर “मूल संरचना सिद्धांत” को पुनः सुदृढ़ किया।

 


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b)There has been conflicting debate about Supremacy between Parliament and Judiciary in the light of debate, explain your views. [8]

भारत में संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच सर्वोच्चता का विवाद पैदा होता है। इस कथन के नजरीए से आप अपने विचार प्रस्तुत करें।

उत्‍तर- भारतीय संविधान ने ब्रिटेन की संसदीय सर्वोच्चता और अमेरिका की न्यायिक सर्वोच्चता के बीच संतुलित व्यवस्था अपनाई है जिसे संवैधानिक सर्वोच्चता कहा जाता है। संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच उत्पन्न विवाद “शक्ति-संघर्ष” नहीं, बल्कि संविधान की व्याख्या और उसकी सीमाओं के निर्धारण का प्रश्न है।

 

विवाद का मूल आधार

  1. अनुच्छेद 368 - संसद को संविधान संशोधन की शक्ति।
  2. अनुच्छेद 13 एवं न्यायिक समीक्षा - सर्वोच्च न्यायालय को असंवैधानिक कानून निरस्त करने का अधिकार।

 

उपरोक्‍त आधारों पर समय-समय पर दोनों संस्थाओं के बीच विवाद उत्पन्न हुआ जिसे विभिन्‍न संवैधानिक पड़ावों  के माध्‍यम से देख सकते हैं-

 

  1. शंकरी प्रसाद मामला (1951) -संसद की संशोधन शक्ति को मान्यता।
  2. गोलकनाथ मामला (1967)- संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।
  3. 24वाँ संविधान संशोधन (1971)- संसद ने अपनी शक्ति पुनः स्थापित की।
  4. केशवानंद भारती मामला (1973)- संसद संशोधन कर सकती है, पर संविधान की मूल संरचना नष्ट नहीं कर सकती।
  5. 42वाँ संविधान संशोधन (1976)- संसद द्वारा अपनी शक्ति बढ़ाने का प्रयास।
  6. मिनर्वा मिल्स मामला (1980) - न्यायिक समीक्षा को मूल संरचना माना।
  7. NJAC मामला (2015) - न्यायपालिका की स्वतंत्रता पुनः मूल संरचना घोषित।

 

इस प्रकार संसद और सर्वोच्च न्यायालय के बीच उत्पन्न विवाद से स्‍पष्‍ट है कि संसद जन-इच्छा और लोकतांत्रिक वैधता का प्रतिनिधित्व करती है जबकि न्यायपालिका मौलिक अधिकारों एवं संवैधानिक मूल्यों की संरक्षक है। संसद की असीमित शक्ति बहुमतवाद को जन्म दे सकती है, जबकि न्यायपालिका की अति-सक्रियता “न्यायिक अतिक्रमण” का खतरा उत्पन्न कर सकती है।

 

अत: भारत में न संसद सर्वोच्च है और न सर्वोच्च न्यायालय बल्कि संविधान सर्वोच्च है। संसद और न्यायपालिका के बीच संतुलन ही भारतीय लोकतंत्र, विधि के शासन तथा नागरिक स्वतंत्रताओं की रक्षा सुनिश्चित करता है।

 



c) Explain the concept of 'Writ Jurisdiction' and name any three of the five writs that can be issued by the Supreme Court or High Courts to enforce Fundamental Rights. [8]

रिट ज्यूरिडिक्शन (न्यायिक क्षेत्राधिकार) की अवधारणा को स्पष्ट करें और उन पाँच रीटों में से किन्हीं तीन ऐसे रिट की चर्चा करें जो सर्वोच्च न्यायालय या उच्च न्यायालय मूलभूत अधिकारों के लागू करने में इसका प्रयोग कर सकते है।


उत्‍तर-रिट न्यायाधिकार से आशय उस विशेष न्यायिक शक्ति से है जिसके माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय (अनुच्छेद 32) तथा उच्च न्यायालय (अनुच्छेद 226) नागरिकों के मौलिक अधिकारों एवं अन्य कानूनी अधिकारों की रक्षा हेतु रिट जारी करते हैं। डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुच्छेद 32 को संविधान का “हृदय और आत्मा” कहा था।

भारतीय संविधान पाँच प्रकार की रिटों- बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, प्रतिषेध, उत्प्रेषण तथा अधिकार-पृच्छा की व्यवस्था करता है। इनमें से तीन प्रमुख रिटें निम्न हैं:

 

  1. बंदी प्रत्यक्षीकरण (Habeas Corpus)- इसका अर्थ है-“बंदी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो।” जब किसी व्यक्ति को अवैध रूप से हिरासत में रखा जाता है, तब न्यायालय उसकी रिहाई का आदेश देता है। यह व्यक्तिगत स्वतंत्रता तथा अनुच्छेद 21 की रक्षा का सबसे प्रभावी साधन है।
  2. परमादेश (Mandamus)- यह रिट किसी लोक अधिकारी या सार्वजनिक संस्था को वैधानिक कर्तव्य के पालन हेतु जारी की जाती है। यह प्रशासनिक जवाबदेही तथा विधि के शासन को सुनिश्चित करती है।
  3. उत्प्रेषण (Certiorari)- यह रिट उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय द्वारा अधीनस्थ न्यायालय अथवा अधिकरण के त्रुटिपूर्ण आदेश को निरस्त करने हेतु जारी की जाती है। इसका उद्देश्य प्राकृतिक न्याय तथा न्यायिक अनुशासन बनाए रखना है।

 

निष्कर्षत: रिट न्यायाधिकार भारतीय लोकतंत्र में नागरिक स्वतंत्रता, न्यायिक समीक्षा तथा विधि के शासन की व्यावहारिक गारंटी है। यह राज्य की मनमानी पर संवैधानिक नियंत्रण स्थापित करता है।

 

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d) Define Judicial Review in the context of Indian Constitution. What is its basic purpose? [7]

भारतीय संविधान के अंतर्गत न्यायिक पुर्नवालोकन को स्पष्ट करें। इसका मुख्य उद्देश्य क्या है?

 

उत्‍तर- न्यायिक पुनरावलोकन (Judicial Review) वह शक्ति है, जिसके द्वारा Supreme Court of India तथा उच्च न्यायालय विधायिका एवं कार्यपालिका की कार्यवाहियों की संवैधानिक वैधता की जाँच करते हैं। यदि कोई कानून, नीति अथवा कार्य संविधान विरुद्ध पाया जाता है, तो न्यायालय उसे शून्य घोषित कर सकता है। भारतीय न्यायिक पुनरावलोकन का संवैधानिक आधार मुख्यतः अनुच्छेद 13, 32, 226, 131-136 तथा 245-246 में निहित है।

 

न्यायिक पुनरावलोकन के मुख्य उद्देश्य

  1. संविधान की सर्वोच्चता- भारत में न संसद सर्वोच्च है और न न्यायपालिका, बल्कि संविधान सर्वोच्च है। न्यायिक पुनरावलोकन यह सुनिश्चित करता है कि राज्य की सभी संस्थाएँ संवैधानिक सीमाओं में कार्य करें। केशवानंद भारती वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने “मूल संरचना सिद्धांत” प्रतिपादित किया।
  2. मौलिक अधिकारों का संरक्षण- यह नागरिकों को राज्य की मनमानी से सुरक्षा प्रदान करता है। यदि कोई कानून मौलिक अधिकारों का उल्लंघन करता है, तो न्यायालय उसे निरस्त कर सकता है।
  3. शक्ति पृथक्करण एवं संतुलन-न्यायिक पुनरावलोकन विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच संवैधानिक संतुलन बनाए रखता है तथा किसी भी अंग को निरंकुश बनने से रोकता है। एस आर बोम्‍बई बनाम भारत संघ में अनुच्छेद 356 के दुरुपयोग पर न्यायिक नियंत्रण स्थापित किया गया।
  4. विधि के शासन की स्थापना- यह सुनिश्चित करता है कि शासन “कानून के शासन” पर आधारित हो, न कि सत्ता की मनमानी पर।

 

न्यायिक पुनरावलोकन भारतीय लोकतंत्र का “संवैधानिक सुरक्षा कवच” है। यह संविधान की सर्वोच्चता, मौलिक अधिकारों की रक्षा तथा लोकतांत्रिक संतुलन को बनाए रखता है। मिनर्वा मिल्‍स वाद में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायिक पुनरावलोकन संविधान की मूल संरचना का अभिन्न भाग है; अतः इसे समाप्त नहीं किया जा सकता।

 


 

e) What is the Primary role of the Finance Commission of India? Which article provides for its establishment? [7]

भारत के वित्त आयोग की मुख्य भूमिका क्या है? संविधान के किस अनुच्छेद में इसकी शुरूआत की चर्चा की गई है?


उत्‍तर- भारत में वित्त आयोग एक संवैधानिक निकाय है जिसका उद्देश्य केंद्र और राज्यों के बीच वित्तीय संसाधनों का न्यायसंगत वितरण सुनिश्चित करना है। भारतीय संघवाद में जहाँ राजस्व संग्रह का बड़ा भाग केंद्र के पास होता है वहीं व्यय की जिम्मेदारियाँ राज्यों पर अधिक होती हैं। इस वित्तीय असंतुलन को दूर करने हेतु संविधान में वित्त आयोग की व्यवस्था की गई।

वित्त आयोग की स्थापना का प्रावधान संविधान के अनुच्छेद 280 में किया गया है। इसके अंतर्गत राष्ट्रपति प्रत्येक पाँच वर्ष पर अथवा आवश्यकता होने पर वित्त आयोग का गठन करते हैं।

 


वित्त आयोग की मुख्य भूमिकाएँ

  1. कर राजस्व वितरण-यह केंद्र और राज्यों के बीच करों के बँटवारे (ऊर्ध्वाधर वितरण) तथा राज्यों के बीच हिस्सेदारी (क्षैतिज वितरण) की सिफारिश।
  2. अनुदान-सहायता-अनुच्छेद 275 के अंतर्गत वित्तीय रूप से कमजोर राज्यों को अनुदान देने की अनुशंसा, जिससे क्षेत्रीय असमानताएँ कम हों।
  3. वित्तीय असंतुलन दूर करना- राज्यों की व्यय आवश्यकताओं और सीमित राजस्व क्षमता के बीच संतुलन स्थापित कर सहकारी संघवाद को मजबूत करता है।
  4. स्थानीय निकायों को सुदृढ़ करना- 73वें और 74वें संविधान संशोधनों के बाद पंचायतों एवं नगरपालिकाओं के लिए वित्तीय संसाधनों की अनुशंसा।
  5. राजकोषीय अनुशासन-वित्त आयोग केंद्र एवं राज्यों को वित्तीय उत्तरदायित्व तथा राजकोषीय अनुशासन बनाए रखने हेतु सुझाव।

 

इस प्रकार वित्त आयोग केवल कर वितरण का तंत्र नहीं, बल्कि क्षेत्रीय संतुलन, सहकारी संघवाद और समावेशी विकास को सुदृढ़ करने वाला संवैधानिक संस्थान है।


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