Jul 15, 2026

प्रश्‍न- संविधान संशोधन के सन्दर्भ में संसद की शक्ति नियंत्रित है, और इसे असीमित शक्ति में नहीं बदला जा सकता। क्या संसद में अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद संसद बेसिक स्ट्रक्चर' बुनियादी ढाँचा को बदल सकता है? [38] 71th BPSC PYQ

प्रश्‍न- संविधान संशोधन के सन्दर्भ में संसद की शक्ति नियंत्रित है, और इसे असीमित शक्ति में नहीं बदला जा सकता। क्या संसद में अनुच्छेद 368 के अन्तर्गत पूर्ण बहुमत प्राप्त करने के बाद संसद बेसिक स्ट्रक्चर' बुनियादी ढाँचा को बदल सकता है? [38] 71th BPSC PYQ 

उत्‍तर- भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 के द्वारा संसद को संविधान संशोधन की शक्ति प्रदान की गई, ताकि बदलती सामाजिक-राजनीतिक परिस्थितियों के अनुरूप संविधान विकसित हो सके। किंतु यह शक्ति असीमित नहीं है। अनुच्छेद 368 के तहत संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, नए प्रावधान जोड़ सकती है लेकिन मूल तत्वों को समाप्त नहीं कर सकती। यदि संसद ऐसा करती है तो ऐसा संशोधन असंवैधानिक माना जाएगा।

 

संसद की मूलभूत संरचना

संविधान की मूलभूत संरचना में वैसे तत्व शामिल है जिनको बदल दिया जाए तो संविधान का मौलिक स्‍वरूप नष्‍ट हो जाएगा। इसलिए इन्हें “अपरिवर्तनीय” या कम से कम “अनुल्लंघनीय” रूप में रखा गया है। मूल संरचना सिद्धांत का विकास न्‍यायालय के प्रमुख निर्णयों से हुआ।

 

संसद की मूलभूत संरचना का विकास

शंकरी प्रसाद मामला (1951)

संसद को व्यापक संशोधन शक्ति प्रदान की गई।

गोलकनाथ मामला (1967)

संसद मौलिक अधिकारों में संशोधन नहीं कर सकती।

केशवानंद भारती मामला (1973)

13 न्यायाधीशों की पीठ ने ऐतिहासिक निर्णय देते हुए “मूल संरचना सिद्धांत” स्थापित किया और कहा कि “संसद संविधान के किसी भी भाग में संशोधन कर सकती है, परंतु उसकी मूल संरचना को नष्ट नहीं कर सकती।”

मिनर्वा मिल्स मामला (1980)

“सीमित संशोधन शक्ति स्वयं संविधान की मूल संरचना का भाग है।”

 

सर्वोच्च न्यायालय ने मूल संरचना सिद्धांत दिया लेकिन इसकी कोई निश्चित सूची नहीं दी फिर भी  संविधान की सर्वोच्चता, लोकतंत्र एवं गणराज्यात्मक व्यवस्था, धर्मनिरपेक्षता, संघवाद, न्यायिक समीक्षा, विधि का शासन, मौलिक अधिकारों की गरिमा आदि को मूल संरचना माना गया।

 

उल्‍लेखनीय है कि मिनर्वा मिल्स मामला (1980) में 42वें संविधान संशोधन द्वारा संसद ने अपनी संशोधन शक्ति को लगभग असीमित बनाने का प्रयास किया लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे निरस्त करते हुए कहा कि “सीमित संशोधन शक्ति स्वयं संविधान की मूल संरचना का भाग है।” इस प्रकार इस निर्णय ने स्पष्ट किया कि संविधान संशोधन के संदर्भ में संसद स्वयं को भी असीमित नहीं बना सकती।

 

इस प्रकार अनुच्छेद 368 के तहत पूर्ण बहुमत के बाद भी संसद की संविधानसंशोधन की शक्ति नियंत्रित, संतुलित और मूल संरचना से आबद्ध है और संसद संविधान की आत्मा यानी मूल संरचना को बचाकर रखते हुए संशोधन कर सकती है।

 

हांलाकि मूल संरचना की स्पष्ट सूची उपलब्ध नहीं होना, न्यायिक अतिक्रमण, संसद की संप्रभुता पर नियंत्रण जैसे मुद्दों पर मूल संरचना की आलोचना की जाती है फिर भी भारतीय लोकतंत्र की सुरक्षा हेतु यह सिद्धांत अत्यंत आवश्यक माना जाता है। इसलिए कहा जाता है कि “भारत में संसद सर्वोच्च नहीं, बल्कि संविधान सर्वोच्च है।”



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