राष्ट्र एक ऐसे जनसमूह
के रूप में परिभाषित किया जा सकता है, जो एक निश्चित भौगोलिक
क्षेत्र में निवास करता हो और जिनमें समान परम्पराएँ, हित, और भावनाएँ होती हैं। ये लोग एकता के सूत्र में बँधे होते हैं और उनके बीच
समान राजनैतिक महत्त्वाकांक्षाएँ होती हैं। राष्ट्रवाद के निर्णायक तत्वों में
राष्ट्रीयता की भावना सबसे महत्वपूर्ण है।
राष्ट्रीयता की भावना, एक राष्ट्र के सदस्यों के बीच सामुदायिक भावना होती है, जो उनका संगठन और एकता को मजबूत करती है। यह भावना राष्ट्र के सदस्यों को
आपस में जोड़कर एक साझा पहचान और उद्देश्य की ओर अग्रसर करती है।
भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय
- भारत में आधुनिक राष्ट्रवाद का उदय मुख्यतः उपनिवेशी शासन की नीतियों और उनके प्रति भारतीय प्रतिक्रिया का परिणाम था। नई संस्थाओं, रोजगार के अवसरों और संसाधनों के दोहन ने विभिन्न वर्गों में एकजुटता की भावना पैदा की। राष्ट्रवाद सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक कारकों तथा भारतीय जनता की जागरूकता और प्रतिरोध के संयुक्त प्रभाव से विकसित हुआ।
भारत का आर्थिक शोषण
- भारतीयों ने देश के आर्थिक पिछड़ेपन को औपनिवेशिक शासन का परिणाम माना। किसानों, शिल्पकारों, मजदूरों, बुद्धिजीवियों, शिक्षित वर्ग और व्यापारियों के हितों को नुकसान पहुँचने से अंग्रेजी शासन के प्रति असंतोष बढ़ा और भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय भागीदारी करने लगे।
- गुरमुख निहाल सिंह के अनुसार, बिगड़ती आर्थिक दशा और सरकार की राष्ट्र-विरोधी आर्थिक नीति ने अंग्रेज-विरोधी विचारधारा तथा राष्ट्रीय भावना को बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- भारतीयों का मानना था कि विदेशी शासन के रहते आर्थिक शोषण जारी रहेगा और देश की प्रगति संभव नहीं होगी। इस विचार ने आधुनिक राष्ट्रवाद के विकास को गति दी।
ऐतिहासिक अनुसंधान
- 19वीं शताब्दी के प्रारंभ में भारतीयों को अपने प्राचीन इतिहास की सीमित जानकारी थी। मैक्समूलर, मोनियर विलियम्स, रोय, सैसून तथा आर.जी. भंडारकर, आर.एल. मित्रा और स्वामी विवेकानंद जैसे विद्वानों ने भारतीय इतिहास एवं संस्कृति की पुनर्व्याख्या की।
- पश्चिमी विद्वानों ने भारतीय कला, साहित्य, संगीत, विज्ञान और गणित की उपलब्धियों को उजागर किया तथा प्राचीन ग्रंथों का अनुवाद किया। इससे भारतीय सभ्यता की प्राचीनता और श्रेष्ठता विश्व के सामने आई।
- भारतीयों में अपनी सभ्यता और संस्कृति के प्रति गौरव तथा आत्मविश्वास की भावना विकसित हुई। इससे आत्महीनता कम हुई और राष्ट्रीय चेतना को बढ़ावा मिला।
देश का राजनीतिक, प्रशासनिक एवं आर्थिक एकीकरण
- ब्रिटिश शासन ने भारत को एक राजनीतिक और प्रशासनिक इकाई में संगठित किया। संगठित कार्यपालिका, न्यायपालिका और समान कानूनों ने देश में एकता को मजबूत किया।
- रेलवे, पक्की सड़कें, डाक और टेलीग्राफ जैसी परिवहन एवं संचार सुविधाओं ने देश के विभिन्न हिस्सों को जोड़ा। इससे आर्थिक एवं प्रशासनिक गतिविधियों के साथ-साथ राजनीतिक संपर्क भी बढ़ा।
- इस राजनीतिक, आर्थिक और सामाजिक एकीकरण ने भारत को एक सूत्र में बाँधा तथा राष्ट्रवादी आंदोलन के विकास और विस्तार को गति प्रदान की।
पाश्चात्य चिंतन और शिक्षा
- ब्रिटिश शिक्षा प्रणाली ने भारतीय राजनीतिक चिंतन को नई दिशा दी। ट्रैवेलियन, मैकाले और बैंटिक द्वारा लागू अंग्रेजी शिक्षा का उद्देश्य प्रारंभ में प्रशासनिक आवश्यकताओं की पूर्ति था, लेकिन इससे भारतीयों को पाश्चात्य उदारवादी विचारों और स्वशासन की भावना का परिचय मिला।
- बेन्थम, मिल्टन, रूसो और वाल्टेयर जैसे यूरोपीय विचारकों के विचारों ने भारतीय बुद्धिजीवियों में स्वतंत्रता एवं स्वशासन की भावना जगाई। अंग्रेजी शिक्षा ने विभिन्न प्रांतों के लोगों को एक सामान्य संपर्क भाषा दी, जिससे राष्ट्रवादी आंदोलन को अखिल भारतीय स्वरूप मिला।
- रजनी पाम दत्त के अनुसार, ब्रिटिश शासन का उद्देश्य भारतीय संस्कृति को कमजोर कर ऐसा वर्ग तैयार करना था जो रक्त और वर्ण से भारतीय, लेकिन विचार एवं बुद्धि से अंग्रेज हो। फिर भी पाश्चात्य शिक्षा से भारत को लाभ अधिक हुआ, क्योंकि इससे राष्ट्रीय चेतना का विकास हुआ।
- राजा राम मोहन राय, दादा भाई नौरोजी और गोपाल कृष्ण गोखले जैसे नेता अंग्रेजी शिक्षा के प्रभाव से राष्ट्रीय आंदोलन में सक्रिय हुए।
प्रेस और साहित्य की भूमिका
- औपनिवेशिक प्रतिबंधों के बावजूद 19वीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारतीय प्रेस और साहित्य ने महत्वपूर्ण प्रगति की। 1877 में विभिन्न भाषाओं में लगभग 169 हिन्दी समाचार पत्र प्रकाशित होते थे, जिनकी प्रसार संख्या लगभग 1 लाख थी।
- प्रेस ने औपनिवेशिक नीतियों की आलोचना करते हुए एकता का आह्वान किया तथा स्वशासन, लोकतंत्र, नागरिक अधिकार और औद्योगिकीकरण जैसे आधुनिक विचारों का प्रसार किया। समाचार पत्रों, जर्नल्स और राष्ट्रवादी साहित्य ने विचारों के आदान-प्रदान के माध्यम से भारतीय राष्ट्रवाद को मजबूत किया।
- साहित्य में कविताओं, निबंधों, कथाओं और गीतों के माध्यम से देशभक्ति एवं राष्ट्रप्रेम की भावना को बढ़ावा मिला। भारतेंदु हरिश्चंद्र, रवींद्रनाथ टैगोर, बंकिम चंद्र चटर्जी, विष्णु शास्त्री चिपलूणकर और लक्ष्मीनाथ बेजबरुआ ने अपनी रचनाओं से स्वतंत्रता, समानता, एकता और भाईचारे की भावना को प्रोत्साहित किया।
मध्यवर्गीय बुद्धिजीवियों का उत्थान
और राष्ट्रीय आंदोलन में भूमिका
- अंग्रेजों की प्रशासनिक और आर्थिक नीतियों के कारण भारतीय नगरों में एक नया मध्यवर्गीय नागरिक वर्ग विकसित हुआ। इस वर्ग ने अंग्रेजी भाषा को अपनाया, जिससे उसे रोजगार और सामाजिक प्रतिष्ठा दोनों प्राप्त हुईं। इस वर्ग ने अपनी शिक्षा और समाज में उच्च स्थान के बल पर प्रशासनिक वर्ग के नजदीक पहुंचकर प्रभावी भूमिका निभाई।
- यह मध्यवर्ग भारत के नए आत्मबल के रूप में उभरा और समग्र देश में एक नयी ऊर्जा का संचार किया। इस वर्ग ने राष्ट्रीय आंदोलन के सभी चरणों में सक्रिय रूप से नेतृत्व प्रदान किया, जिससे स्वतंत्रता संग्राम को बल मिला।
विदेशी शासकों का जातीय अहंकार एवं
प्रतिक्रियावादी नीतियां
- अंग्रेजों का जातीय अहंकार और श्रेष्ठता की भावना भारतीयों के लिए अत्यंत अपमानजनक थी। अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीयों को अपमानित किया और उन्हें कई बार शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया।
- भारतीयों के लिए उच्च पदों पर नियुक्ति का कोई अधिकार नहीं था, और अंग्रेजों को हमेशा नियुक्ति जाती थी। इस जातीय श्रेष्ठता का सबसे निंदनीय रूप न्याय में असमानता थी, जिसमें अंग्रेजों को दोषमुक्त किया जाता और भारतीयों को कठोर दंड दिया जाता।
- लार्ड लिटन की प्रतिक्रियावादी नीतियों जैसे- वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट (1878) और शस्त्र अधिनियम (1878) ने भारतीयों को अंग्रेजों के खिलाफ लामबंद होने के लिए मजबूर किया।
- इसके अलावा, इलबर्ट बिल विवाद (1883) ने यह दिखाया कि भारतीयों और अंग्रेजों के बीच रंगभेद की गहरी खाई थी, जिससे भारतीयों में अंग्रेजों के खिलाफ घृणा और नफरत की भावना बढ़ी।
कांग्रेस से पूर्व की प्रमुख राजनीतिक
संस्थाएं
- 19वीं शताब्दी के पूर्वार्ध में भारत में विभिन्न राजनीतिक संस्थाओं की स्थापना हुई, जिनका नेतृत्व समृद्ध और प्रभावशाली वर्ग ने किया। इन संस्थाओं ने ब्रिटिश सरकार के समक्ष प्रशासनिक सुधार, भारतीयों की भागीदारी और शिक्षा के प्रसार जैसी मांगें रखी। इन संस्थाओं का स्वरूप स्थानीय था, जबकि 19वीं शताब्दी के उत्तरार्ध में नेतृत्व मध्यवर्गीय नेताओं ने किया, जिन्होंने इन आंदोलनों को सशक्त किया।
- बंगभाषा प्रकाशक सभा (1836) और लैंडहोल्डर्स सोसायटी (1838) जैसी संस्थाओं ने राजनीतिक प्रयासों की शुरुआत की। बाम्बे एसोसिएशन (1852) का गठन भेदभावपूर्ण सरकारी नियमों के विरोध में हुआ। महादेव गोविंद रानाडे द्वारा 1867 में पूना सार्वजनिक सभा की स्थापना की गई। 1884 में मद्रास महाजन सभा का गठन हुआ, जिसका उद्देश्य स्थानीय संगठनों को समन्वित करना था।
- इन संस्थाओं ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नींव रखी और भारतीयों के अधिकारों के लिए संघर्ष को गति दी।
समकालीन घटनाओं का विश्वव्यापी प्रभाव
- दक्षिण अमेरिका में स्पेनी और पुर्तगाली उपनिवेशी शासन की समाप्ति के बाद नए राष्ट्रों का उदय हुआ, जिसने वैश्विक राजनीति को नया मोड़ दिया। इसके अलावा, यूनान और इटली के स्वतंत्रता आंदोलन तथा आयरलैंड की घटनाओं ने भारतीयों पर गहरी छाप छोड़ी। इन घटनाओं ने भारतीयों को स्वतंत्रता की प्रेरणा दी और उनके मन में साम्राज्यवाद के खिलाफ संघर्ष की भावना को प्रबल किया।
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