हिंद-प्रशांत क्षेत्र
भारत एक स्वतंत्र और खुले हिंद-प्रशांत (Indo-pacific-region-international-current-affairs-Civil-Service-notes) का सक्रिय समर्थक रहा
है। भारत का विचार हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अन्य समान विचारधारा वाले देशों के
साथ मिलकर काम करना है ताकि नियम-आधारित बहुध्रुवीय क्षेत्रीय व्यवस्था का सहकारी
प्रबंधन किया जा सके तथा किसी एक शक्ति को इस क्षेत्र या इसके जलमार्गों पर हावी
होने से रोका जा सके।
हिन्द प्रशांत क्षेत्र के विस्तार पर विभिन्न देशों के मध्य
अलग अलग विचार है। भारत का मानना है कि हिन्द प्रशांत क्षेत्र का विस्तार पश्चिमी
प्रशांत महासागर से हिन्द महासागर तक है जबकि अमेरिका के अनुसार अमेरिका के तट से
लेकर भारतीय उपमहाद्वीप के तट शामिल है। सामान्य रूप से विशाल हिंद महासागर और
प्रशांत महासागर के सीधे जलग्रहण क्षेत्र में पड़ने वाले देशों को ‘इंडो-पैसिफिक
देश’ कहा जा सकता है।
हिन्द
प्रशांत क्षेत्र का महत्व एवं वैश्विक झुकाव के कारण
- हिन्द प्रशांत क्षेत्र 2 महासागरों हिन्द महासागर तथा प्रशांत महासागर से मिलकर बना है जिसमें विश्व की कई महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं वाले देश जैसे- चीन, भारत, जापान, आस्ट्रेलिया, दक्षिण कोरिया आदि स्थित होने के कारण आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण क्षेत्र बन गया है।
- विशेषज्ञों के अनुसार विश्व राजनीति का हिंद-प्रशांत क्षेत्र की तरफ झुकाव भारत, चीन और जापान की तीव्र आर्थिक वृद्धि का परिणाम है।
- वर्तमान में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में 38 देश शामिल हैं, जो विश्व के क्षेत्रफल का 44% है तथा विश्व की 65% आबादी यहां निवासित है।
- यह विश्व की कुल GDP में 62% तथा विश्व माल व्यापार का 46% योगदान देता है इस कारण क्षेत्रीय व्यापार और निवेश हेतु महत्वपूर्ण है।
- मोजम्बिक चैनल तथा बाब अल मांदेव जैसे महत्वपूर्ण रणनीतिक तथा व्यापारिक समुद्री मार्गों की उपस्थिति।
- विश्व का अधिकांश व्यापार तथा ऊर्जा की आपूर्ति इसी क्षेत्र से होने से सामरिक महत्व है । इस क्षेत्र में लाल सागर, अदन की खाड़ी, पर्शियन गल्फ स्थित हैं, जहाँ हाइड्रोकार्बन प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं तथा इन क्षेत्रों से भारत का तेल व्यापार होता है।
- अपार समुद्री संसाधनों जैसे अपतटीय हाइड्रोकार्बन, समुद्रतलीय खनिज, मत्स्यन आदि से समृद्ध।
- चीन का बढ़ता प्रभाव तथा हिन्द महासागर का सैन्यीकरण भी महत्वपूर्ण कारण है जिससे विश्व की ताकतें इस ओर आकर्षित हो रही है।
विश्व राजनीति में हिंद-प्रशांत
क्षेत्र की एक महत्वपूर्ण भूमिका है जहां विश्व की 65% आबादी निवासित है जो विश्व की कुल GDP में 62% योगदान देता है । इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता हेतु नौवहन की
स्वतंत्रता, बाधारहित व्यापार और अंतर्राष्ट्रीय कानून के
अनुसार विवादों के शांतिपूर्ण समाधान पर ध्यान देने की आवश्यकता है।
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अमेरिका
की इंडो-पैसिफिक रणनीति फरवरी 2022 में अमेरिका
द्वारा जारी इंडो-पैसिफिक रणनीति का उद्देश्य क्षेत्रीय चुनौतियों
से निपटने हेतु सामूहिक क्षमता निर्माण, चीन से उत्पन्न चुनौतियों
का सामना करना और भारत के साथ प्रमुख रक्षा साझेदारी को आगे बढ़ाना है। महत्वपूर्ण बिंदु ¶ अमेरिका स्वतंत्र, मुक्त, सुरक्षित और समृद्ध इंडो-पैसिफिक
क्षेत्र के निर्माण हेतु क्वाड, आसियान,
यूरोपीय संघ और नाटो जैसे समूहों के साथ सहयोग
बढ़ाना चाहता है। ¶ क्षेत्रीय सुरक्षा के लिए AUKUS (ऑस्ट्रेलिया-यूके-अमेरिका) जैसी नई त्रिपक्षीय साझेदारी की शुरुआत की गई है। ¶ इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के कई देश प्राकृतिक आपदाओं, संसाधनों की कमी, आंतरिक
संघर्ष और शासन की चुनौतियों का सामना कर रहे हैं। अत: रणनीति
में जलवायु परिवर्तन, पर्यावरण और प्राकृतिक आपदाओं जैसी चुनौतियों को भी शामिल
किया गया है। ¶ इस रिपोर्ट में भारत को समान-विचारधारा
वाला साझेदार और क्षेत्रीय सुरक्षा प्रदाता बताया गया है। अमेरिका-भारत
मिलकर और क्षेत्रीय मंचों के माध्यम से दक्षिण एशिया में स्थिरता तथा हिंद-प्रशांत
में नेतृत्व को मजबूत करने पर बल दिया गया है। |
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हिंद-प्रशांत
में आसियान की भूमिका
हिंद-प्रशांत
क्षेत्रीय संरचना का नेतृत्व करने में आसियान की केंद्रीय भूमिका है लेकिन पिछले
कुछ वर्षों से हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिका-चीन प्रतिद्वंद्विता और टैरिफ
युद्ध से इस क्षेत्र के विभिन्न गुटों में बंटने और ध्रुवीकरण का खतरा बढ़ गया है
। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में आसिायान की केन्द्रीय भूमिका में अनेक चुनौतियां है
जैसे
- अमेरिका-चीन शीत युद्ध सदस्य देशों को विभाजित कर सकता है।
- कमजोर होते मंच जैसे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन और आसियान क्षेत्रीय मंच कमजोर हुए है।
- अमेरिकी टैरिफ से व्यापार व्यवस्था अस्थिर और आसियान की एकता कमजोर हो रही है।
आसियान
की कमजोर होती केन्द्रीय भूमिका इस क्षेत्र में ध्रुवीकरण और आपसी प्रतिस्पर्धा
बढ़ा सकता है अत: आसियान की भूमिका को मजबूत करने के लिए निम्न उपाए किए जा सकते
हैं
- आंतरिक
एकजुटता, संकट प्रबंधन तंत्र और विवाद समाधान
क्षमता बढ़ाना।
- यूरोपीय
संघ, ऑस्ट्रेलिया जैसे साझेदारों के साथ
सहयोग बढ़ाना।
- भारत
के साथ संबंध मजबूत करना, जो व्यापार और
स्थिरता के साझा लक्ष्यों में भागीदार है।
- RCEP में सुधार और अधिक देशों को CPTPP में शामिल होने हेतु प्रोत्साहित करना।
AUKUS (Australia, The UK and The
USA)
सितंबर 2021
में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन के मध्य संवेदनशील ‘नौसेना
परमाणु प्रणोदन सूचना’ के आदान-प्रदान की अनुमति देने वाले रक्षा गठबंधन
का गठन किया जिसे ऑकस कहा गया। उल्लेखनीय है कि भारत और जापान अमेरिका की हिन्द प्रशांत
नीति में महत्वपूर्ण केन्द्र होने के बावजूद ऑकस में दोनों शामिल नहीं है।
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AUKUS
– Australia, The UK and The USA ¶ AUKUS ऑस्ट्रेलिया, यूके
और यूएसए के बीच हस्ताक्षरित एक त्रिपक्षीय सुरक्षा गठबंधन है। ¶ AUKUS के तहत तीनों सदस्य देश सुरक्षा और रक्षा संबंधी प्रौद्योगिकी
विकास एवं साझाकरण, औद्योगिक आपूर्ति शृंखलाओं के एकीकरण जैसे प्रयासों को
बढ़ावा देंगे। ¶ इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य ऑस्ट्रेलिया हेतु
अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी प्रौद्योगिकी का साझाकरण सुनिश्चित करना है। ¶ AUKUS को QUAD
के अनुपूरक के रूप में देखा जा रहा है। उल्लेखनीय
है कि QUAD एक सुरक्षा समूह नहीं है इस कारण से AUKUS को हिन्द प्रशांत क्षेत्र में क्वाड के सुरक्षा सहायक
के रूप में देखा जा रहा है। |
चतुर्भुज सुरक्षा संवाद (QUAD- Quadrilateral Security Dialogue)
यह भारत, अमेरिका,
ऑस्ट्रेलिया
और जापान का एक अनौपचारिक समूह है जो हिन्द प्रशांत क्षेत्र में शांति,
स्थिरता
करना तथा वैश्विक चुनौतियों का समाधान करने हेतु गठित किया गया है।
भारत के लिए क्वाड का महत्त्व
- चीन पर निर्भरता कम करने हेतु जापान व ऑस्ट्रेलिया के साथ वैकल्पिक आपूर्ति शृंखला का विकास।
- हिंद महासागर में शांति, सुरक्षा एवं नियम-आधारित व्यवस्था को सुदृढ़ करने का मंच।
- चीन की आक्रामक नीतियों के संतुलन तथा भारत की समुद्री सुरक्षा को मजबूती।
- HADR, समुद्री निगरानी एवं मानवीय सहयोग से हिंद-प्रशांत में भारत की नेतृत्वकारी भूमिका मजबूत।
- Five Eyes में भारत को शामिल करने का प्रस्ताव क्वाड की भावी बढ़ते रणनीतिक महत्व का संकेत है।
क्वाड
की चुनौतियाँ
- स्पष्ट रणनीतिक दृष्टिकोण का अभाव– क्वाड प्रत्येक सदस्य के लिए अलग-अलग अवसर और चुनौतियाँ प्रस्तुत करता है, जिससे हिंद-प्रशांत की स्थिरता व विकास को लेकर साझा और स्पष्ट रणनीति नहीं बन पाई है। व्यापार जैसे मुद्दों पर भी आपसी मतभेद हैं।
- लक्ष्यों में विविधता– अमेरिका क्वाड को चीन-विरोधी मंच के रूप में देखता है, जबकि भारत और जापान का रुख अधिक संतुलित है। ऑस्ट्रेलिया भी पहले चीन के दबाव में समूह से हट चुका है।
- चीन की आपत्ति– चीन क्वाड को “दक्षिण एशिया का नाटो” मानता है और इसे अपने विरुद्ध घेराबंदी वाला सैन्य गठबंधन बताकर क्षेत्रीय स्थिरता के लिए खतरा करार देता है।
- क्षेत्रीय सुरक्षा प्रतिक्रिया – चीन और रूस ने क्वाड के जवाब में ‘क्षेत्रीय सुरक्षा संवाद’ जैसे वैकल्पिक मंच का प्रस्ताव रखा है। साथ ही चीन दक्षिण एशिया में BRI, CPEC, स्ट्रिंग ऑफ पर्ल्स तथा बांग्लादेश-श्रीलंका के बंदरगाहों के माध्यम से अपना प्रभाव बढ़ा रहा है।
एक ओर जहां चीन हिंद प्रशांत क्षेत्र में अपना
दबदबा बनाने का प्रयास कर रहा है वैसे में भारत और अमेरिका समेत दुनिया की कई
ताक़तें हिंद-प्रशांत क्षेत्र को तत्काल मुक्त, खुला और फूलता-फलता क्षेत्र बनाने की आवश्यकता पर जोर दे रहे हैं। अतः इस
संदर्भ में क्वॉड की भूमिका को नए सिरे से तैयार करना होगा ताकि वो इस क्षेत्र से
जुड़े तमाम मामलों को प्रभावी तौर पर निपट सके।
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AUKUS |
QUAD |
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ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका
और ब्रिटेन का त्रिपक्षीय सुरक्षा गठबंधन। |
ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, जापान और
भारत का रणनीतिक संवाद मंच |
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सैन्य गठबंधन |
राजनयिक गठबंधन |
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परमाणु बेडे को प्राप्त करने में आस्ट्रेलिया की सहायता
जैसी प्रारंभिक योजना के साथ गठित। |
नियम आधारित विश्व व्यवस्था तथा मुक्त एवं खुले हिंद प्रशांत
क्षेत्र की स्थापना जैसे व्यापक उद्देश्य। |
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हिन्द प्रशांत क्षेत्र में चीनी वर्चस्व को संतुलित करने।
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आर्थिक मामलों, सुरक्षा
मामलों, वैश्विक मामलों पर केन्द्रित |
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हिन्द प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा और सैन्य प्रतिद्वंद्विता
से निपटना। |
वैश्विक समस्याओं जैसे जलवायु , महामारी
आदि पर सहयोग |
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