Aug 13, 2026

72th BPSC Mains Sectional Test/Answer writing practice

 72th BPSC Mains Sectional Test/essay writing/answer writing practice

प्रश्न- “बिहार में मत्स्य एवं पशुपालन क्षेत्र ग्रामीण आय, रोजगार और खाद्य-पोषण सुरक्षा के व्यापक आधार का निर्माण करते हैं।” बिहार सरकार के प्रयासों के संदर्भ में अपने विचार व्‍यक्त करें। 8 Marks


उत्तर- बिहार की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में मत्स्य एवं पशुपालन आय, रोजगार और पोषण सुरक्षा के महत्वपूर्ण आधार हैं। इस क्षेत्र की क्षमता को देखते हुए राज्य सरकार द्वारा तकनीक, वित्त, पशु स्वास्थ्य और उत्पादन क्षमता बढ़ाने पर केंद्रित अनेक प्रयास किए जा रहे हैं। इस दिशा में सरकारी प्रयासों की प्रभावशीलता को निम्न प्रकार देखा जा सकता है-

 

मत्स्य क्षेत्र- मुख्यमंत्री समेकित चौर विकास योजना, नदी मत्स्य पालन कार्यक्रम आदि के तहत मत्‍स्‍यन को बढ़ावा देकर द्वारा ग्रामीण आय एवं पोषण को प्रोत्‍साहन दिया जा रहा है।

जोखिम एवं वित्तीय सुरक्षा- मछली फसल बीमा योजना प्राकृतिक आपदा, पर्यावरणीय असंतुलन और प्रदूषण से होने वाली क्षति के विरुद्ध वित्तीय सहायता देती है, जबकि किसान क्रेडिट कार्ड से कार्यशील पूंजी की उपलब्धता बढ़ाई गई है।

उत्पादन के नए साधन- बायोफ्लॉक मछली उत्पादन, बंजर भूमि विकास और खुले पानी में पेन फिश फार्मिंग जैसी पहलें आधुनिक तकनीक तथा संसाधनों के बेहतर उपयोग को बढ़ावा देती हैं।

पशुपालन में संस्थागत सहयोग- मोबाइल पशु चिकित्सा वाहन, पशुधन मास्टर प्लान, राष्ट्रीय पशुधन मिशन, जीविका के पशु सखी कार्यक्रम, गौशाला स्थापना और कौशल प्रशिक्षण के माध्यम से स्वास्थ्य, उत्पादकता और ग्रामीण रोजगार को बढ़ावा दिया जा रहा है।

 

इस प्रकार बिहार सरकार की उपरोक्‍त पहलों से उत्पादन, आय, रोजगार और पोषण सुरक्षा को एक साथ मजबूत करने की क्षमता है। मत्स्य एवं पशुपालन को तकनीक, वित्त और कौशल से जोड़कर किसान की आय, रोजगार और पोषण सुरक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण आधार तैयार किया जा रहा है।


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प्रश्न-1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संवृद्धि और वैश्विक एकीकरण के द्वार खोले, किंतु इनके लाभों का वितरण समान रूप से नहीं हो सका।” इस कथन की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिए। 8 Marks


उत्तर- 1991 के आर्थिक सुधारों ने भारतीय अर्थव्यवस्था को अधिक उदारीकृत, प्रतिस्पर्धी और वैश्विक बनाया। इससे आर्थिक संवृद्धि को गति मिली, लेकिन उस गति के साथ व्यापक सामाजिक-आर्थिक प्रभावों का वितरण समान रूप से नहीं हो सका।


सुधारों की उपलब्धियाँ

संवृद्धि एवं वैश्विक एकीकरण- आर्थिक सुधारों के बाद सकल घरेलू उत्पाद की वृद्धि में तेजी आई तथा भारतीय अर्थव्यवस्था वैश्विक प्रतिस्पर्धा से अधिक जुड़ी।


गरीबी में कमी- 1991–2011 के बीच लगभग 35 करोड़ लोग गरीबी से बाहर निकले, जो सुधारों के व्यापक आर्थिक प्रभाव को दर्शाता है।


निवेश एवं प्रतिस्पर्धा- उदारीकरण से कृषि उत्पादों पर आयात शुल्क और मात्रात्मक प्रतिबंधों में कमी आई तथा निवेश के लिए अधिक अनुकूल वातावरण बना।


सुधारों का अंतर्विरोध


संवृद्धि बनाम रोजगार- आर्थिक वृद्धि के अनुरूप रोजगार सृजन नहीं हो सका। औद्योगिक क्षेत्र अपेक्षित गति से विकसित न होने के कारण श्रम-प्रधान क्षेत्रों में पर्याप्त अवसर नहीं बने।


कृषि की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति- कृषि में सार्वजनिक निवेश में कमी, बढ़ती उत्पादन लागत और उदारीकरण से बढ़ी विदेशी प्रतिस्पर्धा ने विशेषकर छोटे एवं सीमांत किसानों पर दबाव बढ़ाया।


सामाजिक क्षेत्र- आर्थिक सुधारों के साथ सामाजिक क्षेत्र के व्यय में कटौती तथा कर रियायतों पर जोर ने विकास के वितरणात्मक पक्ष पर बहस को जन्म दिया।

 

निष्कर्षत: आर्थिक सुधारों को असफल कहना उचित नहीं होगा, क्योंकि उन्होंने संवृद्धि, गरीबी में कमी और वैश्विक एकीकरण को गति दी। किंतु उनकी वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब आर्थिक संवृद्धि रोजगार-सृजन, कृषि सुदृढ़ीकरण और सामाजिक समावेशन में समान रूप से रूपांतरित हो।

 



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प्रश्न- बिहार में औद्योगिकीकरण की दिशा में राज्य सरकार के हालिया प्रयास उद्योगों की स्थापना के साथ विभिन्‍न आयामों जैसे- भूमि, निवेश, अवसंरचना, स्थानीय उत्पादन, उद्यमिता, निर्यात आदि को एक साथ जोड़ने का प्रयास  हैं।” चर्चा कीजिए। 38 Marks

उत्तर- बिहार की अर्थव्यवस्था में औद्योगिक गतिविधियों के विस्तार की पर्याप्त संभावनाएँ हैं। इसी दृष्टि से राज्य सरकार ने बिहार स्टार्टअप नीति, बिहार औद्योगिक प्रोत्साहन नीति, औद्योगिक क्षेत्रों के विकास, खाद्य प्रसंस्करण, उद्यमिता तथा निर्यात को बढ़ावा देने के लिए अनेक पहलें की हैं।

बिहार सरकार का उद्देश्य बहुआयामी है जो निवेश आकर्षित करने के साथ रोजगार और राज्य की औद्योगिक क्षमता बढ़ानेवाला है। बिहार में औद्योगिकीकरण की रणनीति को निम्न प्रकार समझा जा सकता है-

 


निवेश और भूमि का आधार मजबूत करना- बिहार में निवेश के महत्वपूर्ण क्षेत्रों के रूप में कपड़ा, खाद्य प्रसंस्करण, चमड़ा, डेयरी और अन्य उद्योगों को बढ़ावा दिया जा रहा है। औद्योगिक विकास के लिए 5,000 एकड़ का भूमि बैंक बनाया गया है तथा 7,592 एकड़ भूमि भूखंडों के रूप में दी गई है। इससे उद्योगों की स्थापना के लिए भूमि उपलब्धता बेहतर हो सकती है।

 

बड़े औद्योगिक केंद्रों का निर्माण- डोभी में लगभग 1,670 एकड़ भूमि पर एकीकृत विनिर्माण समूह विकसित किया जा रहा है, जिससे 10 लाख से अधिक लोगों को रोजगार मिलने की संभावना है। डोभी औद्योगिक पार्क को पूर्वी भारत के प्रमुख औद्योगिक केंद्र के रूप में विकसित करने का प्रयास है।

 

क्षेत्रीय औद्योगिक विस्तार- 31 जिलों में नए औद्योगिक क्षेत्र विकसित किए जा रहे हैं। गया में मडुआ उत्पाद पार्क तथा पश्चिम चंपारण में विशेष आर्थिक क्षेत्र विकसित करने की पहल से औद्योगिक गतिविधियों का क्षेत्रीय विस्तार हो सकता है।

 

स्थानीय उत्पादन और उद्यमिता- एक जिला, एक उत्पादयोजना के विस्तार से प्रत्येक जिले के विशिष्ट उत्पादों को बढ़ावा देने तथा स्थानीय अर्थव्यवस्था को मूल्यवर्धित गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास है। साथ ही, 101 अनुमंडलों में उद्यमिता विकास केंद्र स्थापित करने से युवाओं को प्रशिक्षण और मार्गदर्शन मिल सकता है।

 

निर्यात और संपर्क- निर्यात केंद्रों की संख्या बढ़ाकर 46 करने तथा निर्यात को लगभग 1,400 करोड़ रुपये तक बढ़ाने का लक्ष्य है। अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक गलियारा, सड़क, रेल, हवाई और जलमार्ग संपर्क बिहार को व्यापक बाजारों से जोड़ने में सहायक हो सकते हैं।

 


इस प्रकार बिहार की औद्योगिक रणनीति विविध आयामों को परस्पर जोड़कर औद्योगिक श्रृंखला विकसित करने की दिशा में है। यदि इनको प्रभावी रूप से आगे बढ़ाया जाता है, तो बिहार में रोजगार के अवसर, निवेश और स्थानीय मूल्यवर्धन बढ़ने के साथ औद्योगिक विकास को नई गति मिल सकती है।



 

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