भारत एवं अफगानिस्तान
ऐतिहासिक और सांस्कृतिक आधार पर भारत और अफगानिस्तान के संबंध अत्यधिक मजबूत रहे हैं। प्राचीन काल से ही अफगानिस्तान और भारत के लोगों ने सांस्कृतिक मूल्यों और समानता पर आधारित शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की नीति और व्यापार एवं वाणिज्य के माध्यम से एक-दूसरे के साथ संपर्क स्थापित किया है।
भारत
अफगानिस्तान संबंध
2021-2022: प्रारंभिक
अलगाव और सतर्कता
- अगस्त 2021 के बाद
भारत ने अपने काबुल दूतावास को अस्थायी रूप से बंद किया,
जिसे तालिबान के पूर्ण सुरक्षा का आश्वासन दिए जाने के बाद अगस्त 2022 में पुनः खोला गया।
- भारत ने जून 2022 में पहली बार अफगानिस्तान की नई सरकार के साथ मानवीय सहायता और तटस्थ संपर्क स्थापित करने के संकेत दिए। इस दौरान, भारत ने कोविड की वैक्सीन, अनाज और दवाओं के द्वारा मानवीय सहायता का निरंतर प्रवाह बनाये रखा, साथ ही चाबहार बंदरगाह के माध्यम से सहायता पहुंचाने का प्रयास भी जारी रहा।
2023–2024: रणनीतिक
बदलाव और अवसर
- नवंबर 2024 में भारतीय राजनयिकों और तालिबान के रक्षा मंत्री की पहली आधिकारिक बैठक काबुल में हुई। भारत ने विकास परियोजनाओं में फिर से भागीदारी पर विचार करना शुरू किया।
- पाकिस्तान और तालिबान के बीच बढ़ते तनाव ने भारत को एक अवसर दिया, खासकर तब जब पाकिस्तान ने 5 लाख से अधिक अफगान शरणार्थियों को निष्कासित किया और आतंकवादी हमलों में 56% की वृद्धि हुई।
2025:संबंधों
में नया मोड़
जनवरी 2025 में
दुबई में भारत और अफगानिस्तान की सर्वोच्च स्तरीय बैठक हुई जो 2021 में तालिबान के
सत्ता में आने के बाद भारत की कूटनीति में बदलाव को दर्शाता है।
मई 2025 में विदेश
मंत्री एस. जयशंकर और मुत्तकी के बीच टेलीफोनिक बातचीत हुई, जो 1999 के बाद पहली बार मंत्रिस्तरीय संवाद था।
इस दौरान तालिबान ने भारत को "सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्रीय सहयोगी" बताया
और आश्वासन दिया कि अफगान भूमि भारत विरोधी गतिविधियों के लिए इस्तेमाल नहीं होगी।
अक्टूबर 2025 को अफगान विदेश मंत्री
अमीर खान मुत्ताकी की भारत यात्रा तालिबान शासन के बाद की अब तक की सर्वोच्च-स्तरीय यात्रा रही। इस
दौरान भारत ने काबुल में अपने दूतावास को पुनः स्थापित करने की घोषणा की जो जून 2022 से तकनीकी मिशन के रूप
में कार्यरत था। यह कदम औपचारिक मान्यता दिए बिना तालिबान से जुड़ने की भारत की
संतुलित नीति को दर्शाता है।
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अफगानिस्तान
का महत्व
- उर्जा समृद्ध देश अफगानिस्तान एशिया के चौराहे पर स्थित है। इसे मध्य एशिया का एक प्रवेश द्वार भी कहा जाता है। है। यह दक्षिण एशिया को मध्य एशिया और मध्य एशिया को पश्चिम एशिया से जोड़ता है।
- अफगानिस्तान की महत्वपूर्ण भौगौलिक स्थिति के कारण यह भारत के साथ ईरान, अज़रबैजान, तुर्कमेनिस्तान तथा उज़्बेकिस्तान का संपर्क कराने में महत्वपूर्ण माध्यम है।
- अफगानिस्तान में निवेश एवं पुनर्निर्माण परियोजनाएं भारतीय कंपनियों के लिए अनेक अवसर देती है।
- अफगानिस्तान में तेल एवं गैस भंडार के समृद्ध स्रोत भारत की ऊर्जा आवश्यकताओं को पूर्ति में मदद कर सकता है।
- भारतीय ऊर्जा आवश्यकताओं की पूर्ति, पाइपलाइन मार्गों हेतु अफगानिस्तान की भूमिका महत्त्वपूर्ण है।
- ऊर्जा के अलावा अफगानिस्तान कीमती धातुओं और खनिजों संसाधनों से समृद्ध क्षेत्र है।
- अफगानिस्तान में स्थिर तथा लोकतांत्रिक सरकार भारत में आतंकवादी गतिविधियों को कम करने तथा पाकिस्तान की भारत विरोधी गतिविधियों को रोकने में सहायक है।
- पाकिस्तान से उत्पन्न चुनौतियों का मुकाबला करने में अफगानिस्तान की भौगोलिक स्थिति सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- तालिबान का आश्वासन कि अफगान भूमि का उपयोग भारत-विरोधी गतिविधियों के लिए नहीं होगा, भारत के आतंकवाद विरोधी अभियान में सहायक है।
भारत ने सदा ही अफगानिस्तान में लोकतांत्रिक
सरकारों का समर्थन किया है। भारत ने अभी तक तालिबान को कोई राजनयिक मान्यता प्रदान
नहीं की है। उल्लेखनीय है कि संयुक्त राष्ट्र ने तालिबान सरकार को अब तक मान्यता नहीं दी है क्योंकि तीन शर्तें समावेशी शासन, आतंकवादी नेटवर्कों का उन्मूलन और मानवाधिकारों, विशेषकर महिलाओं के अधिकारों का सम्मान जैसी शर्तें पूरी नहीं हुई हैं। इसी कारण अफ़ग़ानिस्तान की संयुक्त राष्ट्र सीट के लिए तालिबान के अनुरोध खारिज किए जाते रहे हैं।
भारत की अफगान नीति
भारत पिछले दो दशकों से अपनी अफगान नीति के तहत
अफगान के लोकतांत्रिक सरकार का समर्थन करता रहा है। यद्यपि पिछले दो दशकों की
अफगान नीति में अफगान की शांति प्रक्रिया में भारत की कोई राजनीतिक व सैनिक भूमिका
नहीं रही फिर भी भारत ने अफगानिस्तान के आर्थिक विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई
और 3 बिलियन डॉलर से अधिक की
विकास राशि का निवेश किया जिससे अफगान सरकार तथा जनता के बीच भारत की लोकप्रियता
मजबूत हुई।
भारत चाहता है कि अफगानिस्तान में दो दशकों से
संचालित लोकतांत्रिक व्यवस्था को कायम किया जाए तथा अल्पसंख्यक और महिलाओं के
अधिकारों को सुरक्षित किया जाए। भारत ने तालिबान सरकार को मान्यता देने और सत्ता
प्राप्ति के तरीके को स्वीकार करने से परहेज़ किया है,
ताकि 2021 के हिंसक सत्ता परिवर्तन
को वैधता न मिले।
अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सरकार से संवाद को स्वीकार्य
मानते हुए भारत अपने कूटनीतिक संपर्क बनाए रखे हैं। भारत का तालिबान से संवाद सुरक्षा, कूटनीति और आर्थिक हितों के संतुलन पर आधारित है जिसके
मुख्य कारण निम्न हैं
- तालिबान का आश्वासन- अफगानिस्तान द्वारा भारत-विरोधी गतिविधियों से दूरी बनाए रखने का आश्वासन और 2025 के पहलगाम हमले की निंदा से भारत का सीमित जुड़ाव मजबूत हुआ।
- पाकिस्तान से तनाव- तालिबान-पाक संबंधों में खटास, डुरंड रेखा और तहरीक ए तालिबान मुद्दे पर पाकिस्तान से दूरी भारत-विरोधी गठजोड़ के जोखिम को घटाते हैं।
- आर्थिक हित- अफगानिस्तान में भारत का 3 अबर डॉलर का बड़ा निवेश, TAPI और चाबहार जैसी परियोजनाएँ तथा दूतावास पुनः खोलना भारत के दीर्घकालिक रणनीतिक-आर्थिक हितों को सुदृढ़ करता है।
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तालिबान
के प्रति नीति में बदलाव से भारत को लाभ
भावी हितों की रक्षा
वर्तमान परिदृश्य में तालिबान अफगानिस्तान की राजनीतिक प्रक्रिया का
एक अंग बन गया है। अतः राजनीतिक रूप से मजबूत होते तलिबान के साथ संपर्क भारत के
वर्तमान और भावी हितों की रक्षा में सहायक होगा।
मध्य एशिया तक कनेक्टिविटी में
अफगानिस्तान की सामरिक रूप से महत्वपूर्ण अवस्थिति
है और ऐतिहासिक रूप से यह खैबर और बोलान दर्रे के माध्यम से भारत के लिए प्रवेश एक
प्रमुख मार्ग रहा है।
विकास परियोजनाओं के निवेश सुरक्षित करना
भारत ने अफगानिस्तान में सड़क,
बिजली लाइन, बांध
निर्माण, अस्पताल-निर्माण जैसी 500 से अधिक अवसंरचनात्मक परियोजनाओं में 3 बिलियन डॉलर से अधिक निवेश किया है जिसके सुरक्षा
के लिए नीति में बदलाव आवश्यक है।
अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता
अन्य देश जहां धीरे-धीरे
तालिबान के साथ संबंधों की शुरुआत कर रहे हैं तथा काबुल में अपने मिशन को आरंभ
किया वही भारत का भी इस दिशा में बढ़ने से अंतर्राष्ट्रीय सहभागिता में वृदिध
होगी।
पाकिस्तान के प्रभाव को कम करने हेतु
इस क्षेत्र में पाकिस्तान एक महत्वपूर्ण पक्ष है
। अत: कई मोर्चे पर पाकिस्तान को जवाब देने तथा उसके तालिबान का भारत के विरुद्ध
प्रयोग की नीति में भारत मजबूत स्थिति में रहेगा ।
चीन के प्रभाव को प्रतिसंतुलित करना
तालिबान की सत्ता में वापसी के बाद से चीन काबुल
में चीन के नए राजदूत की नियुक्ति, खनिज
और अन्य खनन अनुबंधों पर हस्ताक्षर करना, काबुल में शहरी विकास परियोजनाएं द्वारा अफगानिस्तान के साथ अपने
संबंधों को सामान्य बनाने के लिए अधिक सक्रिय कदम उठा रहा है।
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- भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा में सहायक -भारत तालिबान से प्रत्यक्ष रूप से वार्ता कर आतंकवाद जैसे विषयों को उठाकर उसका समाधान कर सकता है। उल्लेखनीय है कि अतीत में अफगानिस्तान ने अलकायदा और ISIS जैसे आतंकी समूहों को संरक्षण दिया गया था । तालिबान के साथ संबंध से भारत अपनी चिंताओं को प्रत्यक्ष रूप से वार्ता के माध्यम से हल कर सकेगा।
- अफगानिस्तान के साथ पुन: संपर्क स्थापित करने हेतु-तालिबान की सत्ता के बाद भारत-अफगान के लोगों के संबंधों में दूरी आ गयी है और तालिबान नीति में बदलाव से फिर से संबंध बढ़ने की संभावना बन रही है ।
- क्षेत्रीय गठजोड़ को रोकने हेतु -तलिबान की बढ़ती अंतर्राष्ट्रीय वैद्यता में तलिबान के प्रति उदासीनता भारतीय हेतु खतरा है तथा इस नीति से तालिबान, पकिस्तान एवं चीन के साथ मिलकर भारत के लिए मुसीबत उत्पन्न कर सकता है। भारत की वर्तमान नीति समय के अनुसार प्रासंगिक एवं तार्किक है ।
तालिबान सत्ता स्थापना के
बाद से अफगानिस्तान में शांति एवं स्थयित्व सुनिश्चित करना बड़ी चुनौती है।
अफगानिस्तान में पश्तून, हजारा, ताजी, उजबेक
कबीलाई समूह है जिनके साथ मधुर संबंध बनाने हेतु प्रयास किया जाना चाहिए। भारत को
तालिबान के साथ साथ अपने हितैषी स्थानीय समूह के साथ भी कुछ न कुछ संपर्क बनाए रखना
चाहिए।



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