Sep 23, 2026

राजनीति का अपराधीकरण

 

राजनीति का अपराधीकरण


वह स्थिति जब प्रत्यक्ष रूप से राजनीतिक व्यवस्था में अपराधियों का प्रभाव बढ़ जाता है तो वह राजनीति का अपराधीकरण कहलाता है। भारतीय राजनीति में 80 के दशक में राजनीति में अपराधियों का प्रभाव बढ़ता है जो वर्तमान में भी जारी है। यह भारतीय राजनीति की एक विशेषता कही जा सकती है कि चुनाव में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की जीतने की संभावना ज्यादा होती है। इस स्थिति में राजनीति में ईमानदार, चरित्रवान, तथा निस्वार्थ सेवा वाले लोगों का प्रवेश बाधित होता है।



एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) और नेशनल इलेक्शन वॉच द्वारा लोक सभा चुनाव, 2024 के संदर्भ में जारी उम्मीदवारों की विश्लेषण रिपोर्ट के अनुसार

  2024 चुनाव में 751 राजनीतिक दलों ने भाग लिया जो 2009 की 368 दलों की तुलना में 104% की वृद्धि दर्शाती है।

  2024 के चुनाव में 543 विजेता उम्मीदवारों में से 46% यानी 251 के खिलाफ आपराधिक मामले दर्ज हैं तथा 170 पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज हैं जिनमें हत्या, हत्या का प्रयास, महिलाओं के खिलाफ अपराध और नफरती भाषण से जुड़े आरोप शामिल हैं। महिलाओं के ऊपर अत्याचार से जुड़े मामले घोषित करने वाले विजेता उम्मीदवार 15 हैं।

  उल्‍लेखनीय है कि 2019 के लोकसभा के लिये चुने गए करीब आधे सांसदों पर आपराधिक आरोप थे  और आंकड़ों के अनुसार 2019 में चुनाव जीतकर आए 539 सांसदों में करीब 233 सांसदों पर आपराधिक आरोप थे ।

विश्लेषण रिपोर्ट में सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश का पूरी तरह से पालन नहीं होना ,राजनीति में बढ़ते अपराधीकरण और गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या में वृद्धि पर चिंता जतायी गयी और कहा गया कि इन कारणों से न केवल राजनीति के अपराधीकरण बल्कि कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग संबंधी चिंताएं भी पैदा हो रही है।



राजनीति के अपराधीकरण का प्रभाव

  • स्वस्थ लोकतांत्रिक परंपरा तथा व्यवस्था में दोष  आना, न्याय के सिद्धांत का बाधित होना।
  • संसाधनों की  अंधाधुंध लूट तथा शोषण  को बढ़ावा।
  • राजनीतिक अनुशासनहीनता, भ्रष्टाचार तथा कालेधन में वृद्धि।
  • संवैधानिक आदर्शोंसामाजिक न्यायएकता में बाधा।
  • संसद की कार्य क्षमता में कमी, कानून निर्माण प्रक्रिया में बाधा।
  • कानून निमार्ण में देशहित के बजाय स्वहित को प्राथमिकता।
  • कानून तोड़ने वालों के कानून निर्माता बनने से अपराध, जंगलराज, अराजकता की स्थिति में वृद्धि की संभावना।
  • लोकतंत्र, लोकतांत्रिक संस्थाओं तथा न्यायिक व्यवस्था के प्रति लोगों के विश्वास में कमी।

 


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राजनीति के अपराधीकरण के कारण

  • चुनाव प्रक्रिया में व्याप्त दोष,चुनाव प्रक्रिया में बढ़ता खर्च।
  • न्याय व्यवस्था में विलंब तथा उदासीनता।
  • राजनीति में नैतिक मूल्यों का पतन एवं आंतरिक लोकतंत्र का अभाव।
  • मतदाताओं में  राजनीतिक जागरूकता का अभाव।
  • राजनीतिक सुधार के प्रति विधायिका की उदासीनता।
  • गरीबी, अशिक्षा तथा बेरोजगारी।
  • राजनेता एवं अपराधियों का गठजोड़। 
  • राजनीतिक दलों की सत्ता के प्रति बढ़ता मोह।
  • मतदान आचरण में अधिकांश मतदाताओं द्वारा उम्मीदवार के बजाए दल को प्राथमिकता देना।
  • चुनाव में अनैतिक तथा अवैधानिक व्यवहारों का बढ़ता प्रभाव।
  • ईमानदार तथा  साफ छवि के लोगों की राजनीति के प्रति अनिच्छा।
  • उम्मीदवार द्वारा गलत जानकारी देने पर चुनाव आयोग द्वारा किसी कार्यवाही को करने में असमर्थता ।
  • राजनीतिक दलों द्वारा अपराधिक छवि वाले व्यक्तियों को टिकट देना।
  • आपराधिक रिकॉर्ड वाले सांसदों और विधायकों की दोषसिद्धि दर अत्यंत निम्न होना।
  • आपराधिक पृष्ठभूमि वाले उम्मीदवारों के पास चुनाव में जीत सुनिश्चित करने में सहायक धनबल का होना

 

ADR की एक रिपोर्ट के अनुसार चुनाव में आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों की जीत की संभावना 13% जबकि स्वच्छ छवि के उम्मीदवार की जीत संभावना केवल 5% होती है। भारत में उम्मीदवार के अपराधी होने से मतदाताओं के मतदान आचरण पर कोई विशेष प्रभाव नहीं पड़ता। इसके अलावा मतदान आचरण में अधिकांश मतदाताओं द्वारा उम्मीदवार के बजाए दल को प्राथमिकता दिया जाता है।

 

उल्लेखनीय है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 की धारा 8 केवल दोषी राजनेताओं पर प्रतिबंध लगाती है, ट्रायल का सामने करनेवाले व्यक्ति चुनाव लड़ सकते हैं। इस कारण भारत की राजनीति में अपराधिक मामले वाले सांसदों विधायकों की संख्या बढ़ती जा रही है क्योंकि वे चुनाव जीतकर जनप्रतिनिधि  बन जाते हैं और इस प्रकार उनके आपराधिक प्रकरण का निर्णय नहीं हो पाता है और न्यायिक प्रक्रिया लंबी चलती है। 


राजनीति में अपराधीकरण रोकने हेतु प्रयास

  • राजनीति में अपराधीकरण रोकने हेतु सर्वोच्च न्यायालय ने समय समय पर निर्देश दिए गए तथा विभिन्न आयोगों समीतियों ने भी अपनी सिफारिश दी लेकिन राजनीतिक दलों की उदासीनता तथा इच्छाशक्ति की कमी के कारण अभी तक इस दिशा में कोई ठोस कानून नहीं बन पाया है।

  • जन-प्रतिनिधियों के खिलाफ मामलों के त्वरित निपटारे हेतु 2017 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा फास्ट ट्रेक अदालतों के गठन का आदेश दिया गया जिसके द्वारा केवल 11% मामलों में ही निर्णय आए।

  • उल्‍लेखनीय है कि 130 वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के विचाराधीन है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और 30 दिनों तक हिरासत में रहने की स्थिति में पद से हटाना है।

  • इसके अलावा संथानम समिति 1962, वोहरा समिति 1993 ने राजनीति में अपराधियों पर अंकुश हेतु अनेक सुझाव दिए जिस पर अभी तक ध्यान नहीं दिया गया। वर्ष 2014 में सर्वोच्च न्यायालय ने आदेश दिया था कि सभी अधीनस्थ न्यायालय 1 वर्ष के भीतर विधायकों से संबंधित मामलों पर निर्णय दे एवं ऐसा न करने पर उत्तरदायी कारण बताए।


सुधार हेतु सुझाव

  • चुनाव प्रणाली में व्याप्त दोषों को दूर करने हुए और प्रभावी बनाया जाए।
  • विधि आयोग, संथानम समित, वोहरा समिति के सुझावों को लागू किया जाना चाहिए।
  • न्यायिक क्रियाशीलता को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • शपथ पत्र में गलत जानकारी देने पर कठोर कार्यवाही की व्यवस्था की जाए।
  • भ्रष्टाचार रोकने हेतु लोकपाल को और सशक्त किया जाना चाहिए, जनसामान्य में जागरूकता हेतु प्रिंट एवं सोशल मीडिया से प्रचार।
  • अपराधियों के चुनाव लड़ने पर रोक लगाने हेतु आवश्यक कदम उठाए जाएं।
  • अपराधी पृष्ठभूमि के उम्मीदवारों की जानकारी राजनीतिक दल के वेवसाइट पर सार्वजनिक किया जाए।
  • अपराधियों के राजनीति में प्रवेश रोकने हेतु संसद द्वारा कानून बनाए जाए।
  • राजनीतिक दलों में सूचना का अधिकार,वित्तीय पारदर्शिता लाने हेतु उपाए किए जाए।
  • हत्या, बलात्कार, अपहरण जैसे जघन्य अपराधों के लिए दोषी उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने से स्थायी रूप से अयोग्य घोषित किया जाना।
  • राजनेताओं के मामलों की सुनवाई समयबद्ध तरीके से सुनिश्चित की जानी चाहिए।
  • सर्वोच्‍च न्‍यायालय के आदेश का पालन न होने पर राजनीतिक दलों और राजनेताओं को फटकार लगाई जानी चाहिए।
  • गैर-मान्यता प्राप्त राजनीतिक दलों की संख्या पर नियंत्रण लगाया जाए। उल्‍लेखनीय है कि 2010 से 2021 तक ऐसे दलों की संख्‍या में 100% से अधिक की वृद्धि हुई है जिससे कर चोरी, मनी लॉन्ड्रिंग संबंधी चिंताएं पैदा होती हैं।

 

बिहार की राजनीति एवं बाहुबल

बिहार में बाहुबल की राजनीति ढलान पर है। एक दौर था जब अपने इलाके में इनका समानांतर शासन चलता था और चुनावी मैदान में अपना रुतबा होता था जिसके कारण राजनीतिक दल भी इनकी अनदेखी करने का साहस नहीं जुटा पाते थे। चुनाव में जीत दर्ज करने की इनकी अहम भूमिका होती थी लेकिन समय के साथ  राजनीति में ये कमजोर पड़ते गए । वर्ष 2024 का आम चुनाव ही देखा जाए तो स्‍पष्‍ट होता है कि इनके द्वारा अपने बाहुबल पर नहीं बल्कि अपनी राजनीतिक पहचान पर वोट मांगा गया।

 

बिहार की सियासत में 1970 के दशक बाहुबलियों का प्रवेश हुआ। उसके बाद अगले 35 वर्षों तक हर दशक में इनका प्रभाव बढ़ता चला गया। 70 से 80 के दशक में विधानसभा में 25 से ज्‍यादा बाहुबली आए और 90 के दशक तक इनका बोलबाला रहा। 1990 के बाद बिहार में इनकी स्‍वीकार्यता कम हुई। हांलाकि राजनीति में अभी भी इनका प्रभाव है लेकिन धीरे- धीरे इनकी सियासत अब ढलान की ओर बढ़ रही है।




 संविधान क्‍यों जरूरी है-आसान भाषा में समझे। 


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संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025

130 वां संविधान संशोधन विधेयक, 2025 संयुक्त संसदीय समिति (JPC) के विचाराधीन है। इस विधेयक का मुख्य उद्देश्य किसी प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या मंत्री को गंभीर आपराधिक मामलों में गिरफ्तारी और 30 दिनों तक हिरासत में रहने की स्थिति में पद से हटाना है।

 

ADR रिपोर्ट एवं एवं भारतीय राजनीति का बढ़ता अपराधीकरण

एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) ने हाल ही में 27 राज्य विधानसभाओं, 3 केंद्र शासित प्रदेशों और केंद्रीय मंत्रिपरिषद के 643 मंत्रियों के हलफनामों का अध्ययन किया। इसमें पाया गया कि 302 मंत्री (47%) आपराधिक मामलों में आरोपी हैं, जिनमें से 174 (27%)  पर हत्या, अपहरण और महिलाओं के खिलाफ अपराध जैसे गंभीर आरोप हैं।

 

दलवार स्थिति

भाजपा के 336 मंत्रियों में 40% पर आपराधिक तथा 26% पर गंभीर मामले है। कांग्रेस शासित राज्यों में मंत्रियों पर 74% पर आपराधिक तथा 30% पर गंभीर आरोप है। इसके अलावा द्रमुक, तृणमूल कांग्रेस, तेलुगु देशम पार्टी, आम आदमी पार्टी में भी शामिल कई मंत्रियों पर आपराधिक तथा गंभीर मामले दर्ज है।

 

राष्ट्रीय स्तर

राष्ट्रीय स्तर पर 72 केंद्रीय मंत्रियों में से 29 (40%) ने आपराधिक मामले घोषित किए। आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, बिहार, ओडिशा, महाराष्ट्र, कर्नाटक, पंजाब, तेलंगाना, हिमाचल प्रदेश, दिल्ली और पुडुचेरी में 60% से अधिक मंत्रियों पर आपराधिक मामले हैं। जबकि हरियाणा, जम्मू-कश्मीर, नगालैंड और उत्तराखंड में किसी मंत्री ने आपराधिक मामला घोषित नहीं किया।

 

संशोधन को प्रेरित करनेवाली हालिया घटनाएं- हालिया घटनाएं जिन्होंने 130वें संशोधन को जन्म दिया और जनता के बीच यह धारणा बनाई कि भारतीय राजनीति में “नैतिकता” का स्तर गिर चुका है।

  • अरविंद केजरीवाल (दिल्ली CM)- शराब नीति मामले में 156 दिन जेल में रहते हुए भी पद पर बने रहे।
  • हेमंत सोरेन (झारखंड CM)- भूमि घोटाले के बावजूद मुख्यमंत्री पद नहीं छोड़ा।
  • सेंथिल बालाजी (तमिलनाडु मंत्री)- घोटाले में जेल में रहते हुए भी मंत्री बने रहे, सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी के बाद इस्तीफा देना पड़ा।
  • पार्था चटर्जी (प. बंगाल मंत्री)- SSC भर्ती घोटाले में गिरफ्तारी के बाद भी पद पर बने रहे।

संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025

इस विधेयक का मुख्य प्रावधान यह है कि यदि कोई मंत्री किसी गंभीर आपराधिक मामले में 30 दिन से अधिक जेल में रहता है, तो उसे मंत्री पद छोड़ना होगा।इसके लिए तीन संवैधानिक अनुच्छेदों में संशोधन प्रस्तावित है:

  1. अनुच्छेद 75 – केंद्रीय मंत्रियों के लिए
  2. अनुच्छेद 164 – राज्य मंत्रियों के लिए
  3. अनुच्छेद 239AA – दिल्ली सरकार के मंत्रियों के लिए

गंभीर अपराध की परिभाषा उन मामलों से है जिनमें 5 वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान है-जैसे हत्या, बलात्कार, भ्रष्टाचार, आतंकवाद, मनी लॉन्ड्रिंग और ड्रग्स।

 

हटाने की प्रक्रिया

  • केंद्रीय स्तर पर 30 दिन की निरंतर हिरासत के बाद राष्ट्रपति प्रधानमंत्री की सलाह का इंतजार करेंगे। यदि 31वें दिन तक कोई सलाह नहीं मिलती, तो मंत्री स्वतः पद से हटा माना जाएगा। राज्य स्तर पर यही प्रक्रिया मुख्यमंत्री और राज्यपाल के स्तर पर लागू होगी।
  • इसमें प्रावधान है कि जेल से रिहाई के बाद वही व्यक्ति पुनः मंत्री बनाया जा सकता है।

संवैधानिक प्रक्रिया

  • अनुच्छेद 368 के अनुसार इसे विशेष बहुमत से पारित करना होगा। चूंकि यह केंद्र-राज्य संबंधों को प्रभावित करता है, इसलिए आधे राज्यों की सहमति भी जरूरी है।
  • इसी क्रम में न्यायिक चुनौतियां भी है। मूल संरचना सिद्धांत (केशवानंद भारती केस, 1973) के तहत न्यायपालिका को देखना होगा कि क्या यह विधेयक संविधान की आत्मा का उल्लंघन करता है। यहां अनुच्छेद 14 के समानता का अधिकार, अनुच्छेद 19 के तहत राजनीतिक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और अनुच्छेद 21 के जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता जैसे मौलिक अधिकारों का सवाल भी महत्‍वपूर्ण है।

 

पुराने और नए नियम की तुलना

पुराना प्रावधान अनुच्छेद 75 और 164 केवल नियुक्ति, जिम्मेदारी और कार्यकाल तय करते थे, आपराधिक मामलों के आधार पर हटाने का कोई नियम नहीं था जबकि नए प्रावधान में अब जेल होने पर पद गंवाने का सीधा फार्मूला लागू होगा।

 

पुराना बनाम नया नियम

पहलू

पुराना प्रावधान

नया (130वां संशोधन) प्रावधान

 

मंत्री पद से हटाना

केवल प्रधानमंत्री/मुख्यमंत्री की इच्छा पर

यदि 30 दिन जेल में रहे तो स्वतः पद से हटाना

 

कानूनी आधार

दोषसिद्धि पर ही अयोग्यता (RPA 1951)

गिरफ्तारी/हिरासत को भी आधार बनाया गया

 

लागू क्षेत्र

केंद्र व राज्य (अप्रत्यक्ष रूप से)

केंद्र, राज्य व दिल्ली सरकार (स्पष्ट रूप से)

 

पुनर्नियुक्ति

दोषमुक्त होने पर संभव

जेल से छूटते ही पुनर्नियुक्ति संभव

 

लोकतांत्रिक नैतिकता

सवालों के घेरे में

शुचिता बढ़ाने का दावा

 

राजनीतिक जोखिम

कम

विपक्ष के दमन का खतरा

 




संशोधन के संबंध में सरकार का पक्ष

  • संवैधानिक नैतिकता- जनता का भरोसा तभी कायम रह सकता है जब संदेहास्पद व्यक्ति पद पर न रहे।
  • सुशासन- राजनीति में शुचिता और पारदर्शिता लाने का प्रयास।
  • जवाबदेही- यह तय करना कि क्या सरकार जेल से चलाई जा सकती है।

 

आलोचकों/ विपक्ष का पक्ष/ विरोध

  • ममता बनर्जी द्वारा इसे “सुपर-इमरजेंसी” बताया।
  • असदुद्दीन ओवैसी द्वारा इसे शक्तियों के पृथक्करण के खिलाफ करार दिया।
  • मनीष तिवारी द्वारा  संविधान की मूल संरचना और “दोषी साबित होने तक निर्दोष” सिद्धांत पर हमला बताया।


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मुख्य आपत्तियां

  • निर्दोष साबित होने तक निर्दोष का सिद्धांत- यह विधेयक गिरफ्तारी को ही सजा मान रहा है, जो न्यायिक मूल्यों के खिलाफ है।
  • जन प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951- इसमें केवल दोषसिद्धि पर अयोग्यता का प्रावधान है। नया कानून इस सिद्धांत को पलट देता है।
  • केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग- ED, CBI की गिरफ्तारी दर अधिक पर दोषसिद्धि बहुत कम। इससे राजनीतिक बदले की आशंका बढ़ती है।

प्रभाव

  • तात्कालिक के तहत इस संशोधन के तुरंत बाद मंत्री और मुख्यमंत्री अधिक सतर्क रहेंगे, क्योंकि 30 दिन की हिरासत सीधे पद छीन सकती है। इसी क्रम में विपक्षी दल एजेंसियों से बचाव की रणनीति बनाएंगे और गठबंधन की राजनीति में छोटे दल केंद्र से टकराव से बचेंगे।
  • दीर्घकालिक प्रभाव देखा जाए तो लंबे समय में संघवाद प्रभावित हो सकता है, क्योंकि केंद्र राज्यों पर अप्रत्यक्ष नियंत्रण पा लेगा। वहीं गिरफ्तारी को ही आधार मानना न्यायिक प्रक्रिया और “निर्दोष साबित होने तक निर्दोष” सिद्धांत को कमजोर करेगा।

इस प्रकार यह प्रावधान संभावित भविष्य के रूप में राजनीति में शुचिता और जनता का विश्वास बढ़ा सकता है लेकिन यदि यह राजनीतिक हथियार बना तो लोकतंत्र कमजोर होगा और संघवाद को नुकसान पहुँचेगा।

 

स्‍पष्‍ट है कि संविधान (130वां संशोधन) विधेयक 2025 भारतीय राजनीति के लिए एक ऐतिहासिक मोड़ है। एक तरफ इसके समर्थकों का कहना है कि यह भ्रष्टाचार और अनैतिक राजनीति को रोकने का साधन बनेगा, वहीं विपक्ष का आरोप है कि यह सत्ताधारी दलों के हाथ में राजनीतिक प्रतिशोध का हथियार बन जाएगा।


संविधान (130वां संशोधन) विधेयक

फायदे (Pros)

जोखिम (Cons)

राजनीति में शुचिता     

गिरफ्तारी से दोषसिद्धि का भ्रम

जनता का विश्वास                            

विपक्ष पर दमन का हथियार

सुशासन और पारदर्शिता

गिरफ्तारी आधार बनाने से न्यायिक प्रक्रिया कमजोर होना

जेल से सरकार चलाने की प्रवृत्ति खत्म       

संघवाद और राज्यों की स्वायत्तता पर असर

         

भारतीय लोकतंत्र का सार यही है कि सत्ता और राजनीति नैतिकता और संवैधानिकता दोनों पर आधारित हों। जेल से सरकार चलाना लोकतांत्रिक मूल्यों का उपहास है, लेकिन गिरफ्तारी को ही दोषसिद्धि मान लेना भी न्यायिक सिद्धांतों का उल्लंघन है। अंततः यह तय करेगा कि आने वाले वर्षों में भारत एक मजबूत लोकतंत्र बनेगा या केंद्रीकृत राजनीतिक व्यवस्था का शिकार होगा। निर्णय की घड़ी संसद और सुप्रीम कोर्ट दोनों के हाथों में है, और इसके परिणाम भारतीय राजनीति की दिशा दशकों तक तय करेंगे।




 








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