Oct 7, 2026

Biotech in agriculture Food processing and environment

 

कृषि में जैव प्रौद्योगिकी

सूक्षमजीवों जैसे जीवाणुओं की मदद से वस्तु के उत्पादन की प्रक्रिया जैव प्रौद्योगिकी कहलाती है। जैव प्रौद्योगिकी में वैज्ञानिक एवं इंजीनियरिंग सिद्धातों को अपनाकर पदार्थों की क्रियाओं द्वारा विभिन्न प्रकार की सामग्रियों/सेवाओं का उत्पादन होता है। अपने व्यापक अनुप्रयोगों के साथ जैव प्रौद्योगिकी कृषि क्षेत्र के विकास में महत्वपूर्ण बहुआयामी भूमिका निभा सकती है। इसकी मदद से फसलों की किस्मों में सुधार, उत्पादन एवं गुणवत्ता में वृद्घि के साथ-साथ जलवायु प्रतिरोधी, कीट रोधी फसलों का विकास किया जा सकता है।

 


कृषि में जैव प्रौद्योगिकी की आवश्यकता

भारत जैसे कृषि प्रधान देश में जलवायु परिवर्तन, कृषि भूमि का अपघटन, मिट्टी की बढ़ती क्षारीयता, भूमिगत जलस्तर में कमी, सतही जल प्रदूषण, अक्सर होनेवाले सूखे जैसी समस्याओं से निपटने हेतु इसकी अत्यंत आवश्यकता है।

 

जैव प्रौद्योगिकी एवं उन्नत बीज

जैव प्रौद्योगिकी द्वारा जब किसी फसल में ऐसे बाहरी जीन को प्रविष्ट कराया जाता है जो उस फसल में विद्यमान नहीं है तो इस प्रकार की फसल जेनेटिकली मोडीफाइड/पराजीनी फसलों (Transgenic Crops) कहलाती है। इस विधि के द्वारा विशिष्ट गुणयुक्त फसलों का विकास किया जाता है जैसे- कीट प्रतिरोधी फसल, उच्च गुणवत्ता एवं उत्पादकता युक्त फसल, सूखा प्रतिरोधी फसल, पोषणयुक्त फसल इत्यादि ।

जैव प्रौद्योगिकी के द्वारा बीटी कॉटन, बीटी बैंगन, गोल्डन राइस, जीएम सरसों जैसे Transgenic Crops का विकास हुआ।


भारतीय कृषकों की आय/जीवन स्तर सुधारने में भूमिका

  1. कृषि उत्पादन बढ़ाना- जैव प्रौद्योगिकी द्वारा उन्नत बीजों से छोटी जोत से अधिक उत्पादन से लाभ में वृद्धि कर सकते हैं। भारत में हरित क्रांति इसी का उदाहरण है।
  2. कीटों के खतरे को कम करना- फसलों के लगने वाले कीटों के उन्मूलन में जैव प्रौद्योगिकी मददगार है। इससे कीटनाशक का कम उपयोग होगा तथा फसल को कीट से नुकसान भी कम होगा।
  3. नई किस्मों की खोज- उच्च पैदावार, सूखा प्रतिरोधी फसलों की नई प्रजातियां बनाकर जलवायु प्रभावों को द्वारा नई प्रजातियां बनाई जा सकती हैं जो किसानों के लिए अधिक लाभ पैदा कर सकती हैं।
  4. प्रतिकूल जलवायु प्रतिरोधी फसलें- जल प्रतिरोधी धान लगातार बारिश में खराब नहीं होगा, इसी प्रकार सूखा प्रतिरोधी फसल भी जैव प्रौद्योगिकी से तैयार किया जा सकता है।  
  5. पोषण क्षमता में वृद्धि- जैव प्रौद्योगिकी द्वारा उच्च पोषणता वाली फसलों का विकास किया जा सकता है जिससे कुपोषण एवं बीमारियों की समस्या से निपटा जा सकता है जैसे- गोल्डन राइस


 

GM (जेनेटिकली मोडीफाइड) फसल

  • बैसीलस थुरीजिएंसीस को जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से पौधों में अभिव्यकत कर कीटों के प्रति प्रतिरोधक शक्ति पैदा की जाती है। इस प्रकार इस फसल में कीटनाशकों की आवश्यकता नहीं रहती और जैव पीड़कनाशक फसलों का निर्माण होता है जैसे- बीटी कॉटन, बीटी मक्का, बीटी आलू आदि।
  • GM फसलों की उच्च पैदावार, कम कृषि लागत, कीटों के विरूद्ध प्रतिरोधकता जैसे गुणों के कारण विश्व भर में खेती बढ़ रही है। भारत में भी पिछले वर्षों से इसकी खेती को बढ़ावा दिया जा रहा है।

GM फसलों के सकारात्मक पक्ष

  • जीएम फसलें  ठंडा, सूखा, लवणता, ताप के प्रति सहिष्णु होती है।
  • पीड़क-प्रतिरोधी होने के कारण रासायनिक पीड़कनाशियों पर कम निर्भरता ।
  • GM बीज सामान्य बीज से अधिक उत्पादकता देता है।
  • GM फसलों में कटाई के पश्चात होनेवाले नुकसान में कमी होने से खाद्यान्न उत्पाद की मात्रा में वृद्धि।
  • पिछड़े देशों में इन फसलों के माध्यम से खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकती है।
  • खाद् टीके, पोषण युक्त खाद्य पदार्थ के निर्माण द्वारा मानव में रोग प्रतिरोधक क्षमता का विकास।
  • राइबोजियम जीवाणु के गुण दलहनी पौधों के अलावे अन्य में डाल कर लागत में कमी तथा पर्यावरण प्रदूषण में कमी लाया जा सकता है।
  • मैंग्रोव पौधों के लवण प्रतिरोधी जीन को धान में डाल लवणीय क्षेत्रों में धान की पैदावार बढ़ायी जा सकती है।
  • इस तकनीक द्वारा लंबी अवधि तक न सड़ने-गलने वाले फलों, सबजियों का उत्पादन ।

 

GM फसलों के नकारात्मक पक्ष

  • हर बार नया बीज खरीदने के कारण जीएम फसलों की लागत अधिक होती है
  • जीएम फसलों के बीज, कीटनाशकों आदि पर बहुराष्ट्रीय कंपनियों के एकाधिकार के कारण कृषि लागत ज्यादा।
  • जीएम फसलें स्वास्थ्य, पर्यावरण तथा जैव विविधता के लिये हानिकारक माना जाता है।
  • पराजीनी फसलें कीटनाशी प्रोटीन का उत्पादन करती है जो खाद्य शृंखला में शामिल हो मानव स्वास्थ्य को प्रभावित कर सकती है।
  • अत्यधिक तथा अनिंयित्रित प्रयोग से घासों, खरपतवारों में कीटनाशक क्षमता के विकास की संभावना।

 

जैव उर्वरक

सूक्ष्म जीव-जीवाणु जो पौधों के लिए उपयोगी पोषक तत्व की स्थिति को बेहतर बनाने की क्षमतायुक्त होते हैं जैव उर्वरक कहलाते हैँ। ये नाइट्रोजन स्थिरिकरण करके, फॉस्फोरस को घुलनकारी बनाकर पौधों को पोषक तत्व उपलब्ध कराते हैं। राइजोबियम, एजोला, माइकोराइजा आदि प्रमुख जैव उर्वरक हैं। भारत जैसे उष्णकटिबंधीय देश में जहां जैव पदार्थों और आवश्यक पोषक तत्वों की कमी है वहां जैव उर्वरक विशेष महत्व रखता है। अधिकांश जैव उर्वरक नाइट्रोजन स्थिरिकरण वाले होते हैं।

 

जैव उर्वरक

राइजोबियम

एजोटोबैक्टर

एजोस्परलियम

नील हरित शैवाल

एजोला

 

नाइट्रोजन स्थिरिकरण बढ़ाता है।

अनाज, घास, सब्जी में पाया जानेवाला जीवाणु, नाइट्रोजन स्थिरिकरण बढ़ाता है।

नाइट्रोजन स्थिरिकरण बढ़ाता है।

जलीय पौधा, नाइट्रोजन स्थिरिकरण बढ़ाता है।

 

 

पौधों की वृद्धि हेतु फास्फोरस आवश्यक पोषक तत्व है जो हरी खाद, पौधों तथा सूक्ष्मजीवों में पाया जाता है परन्तु पौधे इस फॉस्फोरस का उपयोगी नहीं कर पाते । उल्लेखनीय है कि पौधे द्वारा फास्फोरस का अवशोषण मुख्य रूप से आर्थोफॉस्फेट आयन के रूप में होता है और मृदा में पाए जानेवाले सूक्ष्म जीव जैसे स्यूडोमोनास, पुटिडा आदि इसके विलयीकरण की क्षमता रखते है। इस प्रकार इनका इनका प्रयोग जैव उर्वरक के रूप में होता है।  




जैव कीटनाशक

प्रकृति में पाए जानेवाले पदार्थ जैसे- नीम, सूक्ष्मजीव, पौधों तथा जंतुओं से प्राप्त रसायन जिनका उपयोग कीटनाशक के रूप में किया जाता है जैव कीटनाशक कहलाता है।

जैव कीटनाशक के लाभ

  • जैव कीटनाशक लक्ष्यभेदी होते हैं जो  हानिकारक कृषि कीटों का नाश करते हैं, लाभदायक  कीटों को नुकसान नहीं पहुंचाते ।
  • जैव कीटनाशक हानिकारक अवेशेष नहीं छोड़ते।
  • जीव में जैव कीटनाशकों के प्रति प्रतिरोधकता नहीं आती ।
  • कृषि लागत को कम कर कषि को लाभकारी बनाते हैं।
  • जैव कीटनाशक पर्यावरण अनुकूल  होते हैं। 




रासायनिक कीटनाशकों से तुलना

रसायनिक कीटनाशकों की तुलना में जैव कीटनाशक कार्य, प्रभाव तथा समय की दृष्टि से अपेक्षाकृत कम प्रभावी है। अधिकांश रसायनिक कीटनाशकों का प्रभाव लगभग 4 सप्ताह तक होता है किंतु जैविक कीटनाशक का असर अपेक्षाकृत कम होता है इस कारण किसान इसके प्रति रुचि नहीं दिखाते। अतः जैव कीटनाशकों को कारगर तथा प्रभावी बनाने हेतु कृषकों को इसकी सकारात्मक लाभों के बारे में जागरुकता फैलानी होगी।

 

जैव प्रौद्योगिकी के विविध अनुप्रयोग

जैव प्रौद्योगिकी एवं खाद्य सुरक्षा

भारत  के समक्ष खाद्य सुरक्षा तथा पोषण उपलब्ध कराना एक प्रमुख लक्ष्य है जिसे SDG-2 में भी शामिल किया गया है । भारत में खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में बनाया गया। फुड फोर्टीफिकेशन द्वारा पोषण हेतु दैनिक खाद् पदार्थों जैसे-नमक में आयोडीन, विटामिन A एवं D  का मिश्रण किया गया, आंगनबाड़ी, मध्यान्ह भोजन योजना द्वारा उपाय किए गए लेकिन फिर भी  पोषण संबंधी हालात में सुधार नहीं आया । अतः इस दिशा में निश्चित ही जैव प्रौद्योगिकी पोषण एवं खाद्य सुरक्षा में सहायक सिद्ध हो सकती है।

 

  • गोल्डन राइस-  विटामिन ए हेतु ।
  • जिंक आयरन युक्त  मक्का- एनीमिया हेतु।
  • मांसाहारी खाद पदार्थ वाले पशु की गुणवत्ता बढ़ाने में।
  • दुग्ध उत्पादन में वृद्धि,  उन्नत नस्ल के पशु तथा उत्पाद में उपयोगी।
  • न्यूनता जन्म बीमारियों हेतु पोषण युक्त फसल का विकास।
  • उच्च उत्पादकता फसल के विकास द्वारा  नए हरित क्रांति  के प्रोत्साहन हेतु।
  • फसलों,  खाद्य पदार्थों  की  पोषकता, गुणवत्ता तथा जीवन अवधि बढ़ाने  हेतु।
  • मछलियों का संवर्द्धन हेतु जैसे- झींगा मछली उत्पादन में इसी प्रकार उत्पादन बढ़ाया गया।

 

जैव प्रौद्योगिकी एवं पर्यावरण

बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकरण, शहरीकरण के कारण प्रदूषण तथा कचरे की समस्या बढ़ती जा रही है तथा पर्यावरणीय प्रदूषण बढ़ता जा रहा है। शहरी सीवेज, घरेलू कचरे, वाहनों के प्रदूषण, कृषि में अत्यधिक रसायनों, तेल शोधक संयंत्रों के हानिकारक उत्पादों, रसायन उद्योगों के कचरों आदि के कारण प्रदूषण दिन-प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है जिनकों जैव प्रौद्योगिकी के माध्यम से उपचारित किया जा रहा है। इस प्रकार पर्यावरण संरक्षण के क्षेत्र में भी जैव प्रौद्योगिकी का प्रयोग बढ़ता जा रहा है।

 

  • वाहित मल, ठोस अपशिष्ट के निपटान एवं उपचारित करने में। 
  • मृदा में रासायनिक उर्वरकों, कीटनाशकों की बढ़ती मात्रा के दुष्प्रभाव को घटाने हेतु।
  • जैव उर्वरक, जैव कीटनाशक, जैविक कृषि आदि द्वारा पर्यावरण अनुकूल कृषि में ।
  • परिवहन के क्षेत्र में जैव ईंधन का निर्माण ।
  • जैव विविधता एवं पर्यावरण संरक्षण ।
  • राइजोबियम आदि की सहायता से पौधों में पोषक तत्वों की उपलब्धता बढ़ाने में 
  • समुद्री तेल रिसाव, जल शुद्धिकरण में ।
  • जैव प्रौद्योगिकी द्वारा समुद्री सूक्ष्मजीवों एवं पादप प्लवक द्वारा हनिकारण डी.डी.टी. के अवशोषण हेतु। 




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