Oct 21, 2026

द लैंसेट आयोग: 21वीं सदी के वैश्विक स्वास्थ्य खतरे एवं भारत


द लैंसेट आयोग: 21वीं सदी के वैश्विक स्वास्थ्य खतरे एवं भारत

विश्व स्वास्थ्य शिखर सम्मेलन 2026 में ‘द लैंसेट आयोग: 21वीं सदी के वैश्विक स्वास्थ्य खतरे’ (The Lancet Commission on 21st Century Global Threats to Health) संबंधी एक रिपोर्ट जारी की गई।


लैसेंट आयोग ने 204 देशों के डेटा और Institute for Health Metrics and Evaluation, Washington के रिसर्च के आधार पर सैकड़ों संभावित खतरों की जाँच कर 2025 से 2100 के बीच मानव स्वास्थ्य और अस्तित्व के लिए सबसे गंभीर 17 खतरे चिह्नित किए।


इनमें वायु प्रदूषण, जलवायु परिवर्तन, रोगाणुरोधी प्रतिरोध (Antimicrobial Resistance – AMR), बाल कुपोषण, पारंपरिक संघर्ष, स्वास्थ्य हेतु विकास सहायता में गिरावट, परमाणु संघर्ष और AI का दुर्भावनापूर्ण उपयोग शामिल हैं।


ये रोग, सामाजिक-आर्थिक स्थितियों, पर्यावरणीय परिवर्तन, प्रौद्योगिकी और संघर्ष जैसे क्षेत्रों में फैले हैं। साथ ही ये नीति, वित्त-पोषण और नवाचार से टाले जा सकने वाले खतरे हैं।

  1. विश्लेषण के अनुसार तापमान वृद्धि 4.4°C के बजाय लगभग 1.8°C पर रुकने से 1.89 अरब स्वस्थ जीवन वर्षों की हानि टल सकती है।
  2. परमाणु संघर्ष की रोकथाम से 2100 तक लगभग 13.3 करोड़ मृत्यु और 9.35 अरब स्वस्थ जीवन वर्षों की हानि टल सकती है।
  3. दुर्भावनापूर्ण AI का जोखिम घटाने से लगभग 10.4 अरब स्वस्थ जीवन वर्षों की हानि टल सकती है।

उत्सर्जन में तीव्र कटौती के बिना 2100 के बाद भी स्वास्थ्य-हानि बढ़ती जाएगी और विस्थापन जैसे अन्य खतरे गहराएँगे। आयोग का मूल संदेश है कि सभी 17 खतरे परस्पर जुड़े हैं, इसलिए उनसे अलग-अलग नहीं, साथ मिलकर निपटना होगा। कार्रवाई में देरी से लागत केवल आगे खिसकती और बढ़ती है।




आयोग के अनुसार हर देश जोखिम में है, पर सीमित संसाधनों वाले लोगों और हाशिये के समुदायों पर बोझ सबसे अधिक पड़ता है। सबसे बड़ी बात तो ये है कि अकेले भारत इन सभी 17 खतरों का सामना कर रहा है।

आपको यहां ध्‍यान रखना है कि रिपोर्ट में दिए गए दीर्घकालीन अनुमान संभावित परिदृश्यों और मॉडलिंग पर आधारित हैं। यह निश्चित भविष्यवाणी नहीं है बल्कि संभावित अनुमान है। 



भारत के समक्ष प्रमुख खतरे

मोटापा एवं मधुमेह

 

ICMR के अनुसार, भारत में लगभग 10.1 करोड़ लोग मधुमेह और 13.5 करोड़ लोग मोटापे से प्रभावित हैं।

The Lancet Global Health (2024) के अनुमान के अनुसार, 2050 तक भारत में 44.9 करोड़ लोग अधिक वजन या मोटापे से प्रभावित हो सकते हैं।

बाल कुपोषण एवं उच्च रक्तचाप

अल्पपोषण से मानव पूँजी की हानि स्थायी होती है, और जलवायु-जनित खाद्य असुरक्षा इसे और गंभीर बनाती है।

UNICEF-WHO के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, भारत में पाँच वर्ष से कम उम्र के लगभग 35.5% बच्चे बौनेपन (Stunting) से प्रभावित हैं।

India Hypertension Control Initiative के अनुसार, लगभग 22 करोड़ वयस्क उच्च रक्तचाप से प्रभावित हैं, जबकि केवल 12% का रक्तचाप नियंत्रित है।

प्रभाव: कुपोषण बच्चों के शारीरिक एवं संज्ञानात्मक विकास को प्रभावित करता है, जबकि अनियंत्रित उच्च रक्तचाप हृदय रोगों का जोखिम बढ़ाता है।

एंटीमाइक्रोबियल प्रतिरोध (AMR)

एंटीबायोटिक का अनियंत्रित उपयोग सामान्य संक्रमणों के उपचार को कठिन बनाता है, और इसका बोझ निर्धन वर्ग पर अधिक पड़ता है।

Lancet के 2022 के अध्ययन के अनुसार, भारत में AMR से सीधे लगभग 2.97 लाख मौतें हुईं।

बिना चिकित्सकीय परामर्श एंटीबायोटिक उपयोग प्रतिरोध बढ़ाने वाले कारकों में शामिल है।

प्रभाव: सामान्य संक्रमणों का उपचार कठिन और महँगा हो सकता है तथा स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव बढ़ सकता है।

महामारी और स्वास्थ्य व्यवस्था

किसी संक्रामक रोग का प्रभाव केवल रोग की प्रकृति पर निर्भर नहीं करता; निगरानी, समय पर पहचान, उपचार और स्वास्थ्य प्रणाली की तैयारी भी महत्त्वपूर्ण होती है।

प्रभाव: इससे गैर-संचारी रोगों का बोझ, स्वास्थ्य व्यय और उत्पादकता में कमी की चुनौती बढ़ती है।

वायु प्रदूषण एवं जलवायु परिवर्तन

 

WHO Air Quality Database (2024) के अनुसार, दुनिया के 20 सर्वाधिक प्रदूषित शहरों में 14 भारत में थे।

Lancet Countdown (2024) ने भारत में वायु प्रदूषण से प्रतिवर्ष लगभग 16.7 लाख मौतों का अनुमान प्रस्तुत किया। 2024 भारत का सबसे गर्म वर्ष रहा। अत्यधिक गर्मी से स्वास्थ्य जोखिम, मृत्यु खतरा बढ़ता है।

प्रभाव: जीवाश्म ईंधन-जनित प्रदूषण जलवायु और स्वास्थ्य दोनों को क्षति पहुँचाता है, प्रदूषण और बढ़ता तापमान स्वास्थ्य, कृषि, श्रम उत्पादकता तथा आजीविका को प्रभावित करते हैं।

आय असमानता एवं शिक्षा

World Inequality Lab (2024) के अनुसार, भारत की शीर्ष 10% आबादी के पास राष्ट्रीय आय का 57.7% हिस्सा है, जबकि निचले 50% के पास केवल 15% है।

ASER 2023 के अनुसार, ग्रामीण भारत में 14–18 वर्ष के लगभग 25% युवा दूसरी कक्षा के स्तर का पाठ नहीं पढ़ सकते।

प्रभाव: आय और शिक्षा में असमानता अवसरों तक समान पहुँच को सीमित करती है तथा सामाजिक-आर्थिक विकास को प्रभावित करती है।

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं परमाणु जोखिम

AI के दुरुपयोग से साइबर हमले, गलत सूचना और महत्वपूर्ण प्रणालियों में व्यवधान का खतरा बढ़ सकता है।

AI तथा उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए प्रभावी सुरक्षा और जवाबदेही व्यवस्था आवश्यक है।

प्रभाव: परमाणु संघर्ष और दुर्भावनापूर्ण AI की संभावना कम है, पर परिणाम विनाशकारी और अपरिवर्तनीय हैं।  तकनीकी नवाचार के साथ सुरक्षा मानकों का विकास न होने पर आर्थिक, सामाजिक और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी जोखिम उत्पन्न हो सकते हैं।


समाधान क्‍या है

लैंसेट का कहना है कि “इंसानियत के पास अभी भी कदम उठाने और बदलाव लाने की क्षमता है और यदि  हम आज कदम उठाने में देरी करेंगे, तो भविष्य में इसकी कीमत और नुकसान दोनों बहुत ज्यादा बढ़ जाएंगे।” इस दिशा में तीन सूत्रीय रणनीति Build, Back, Track समाधान के रूप में अपनाए जाने की बात कही गयी है। 




भारत सरकार की पहल

  1. राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन एवं मानव स्वास्थ्य कार्यक्रम (National Programme on Climate Change and Human Health)- स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत; गर्मी, वायु प्रदूषण और जलवायु-जनित रोगों के लिए स्वास्थ्य तंत्र की तैयारी
  2. राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (National Clean Air Programme)- चयनित शहरों में वायु प्रदूषण घटाने का कार्यक्रम
  3. पोषण अभियान- बच्चों, किशोरियों और महिलाओं में कुपोषण में कमी का मिशन
  4. रोगाणुरोधी प्रतिरोध पर राष्ट्रीय कार्ययोजना (National Action Plan on AMR)- ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण पर आधारित, एंटीबायोटिक के विवेकपूर्ण उपयोग और निगरानी पर केंद्रित
  5. राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण के दिशानिर्देशों के अंतर्गत Heat Action Plans- राज्यों और नगरों द्वारा लू से बचाव हेतु तैयार

 

भारत के लिए आगे की राह

  1. बहु-क्षेत्रीय दृष्टिकोण- स्वास्थ्य, पर्यावरण, शिक्षा, तकनीक और अर्थव्यवस्था से जुड़े खतरों का समन्वित समाधान करना चाहिए। जलवायु शमन को स्वास्थ्य नीति का अंग मानकर उत्सर्जन में तेज कटौती करना और NDC की महत्वाकांक्षा बढ़ाना, ताकि तापमान वृद्धि पेरिस लक्ष्य के निकट रहे। वायु प्रदूषण नियंत्रण में स्वच्छ ऊर्जा, सार्वजनिक परिवहन और स्वच्छ खाना पकाने के ईंधन को प्राथमिकता देना।
  2. कमजोर वर्गों की सुरक्षा- सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यय बढ़ाना और पोषण कार्यक्रमों को संवेदनशील वर्गों तक पहुँचाना, ताकि असमान बोझ कम हो। गरीबों, बच्चों और जोखिमग्रस्त समुदायों तक स्वास्थ्य एवं सामाजिक सुरक्षा सेवाएँ पहुँचानी चाहिए।
  3. स्वास्थ्य को सभी नीतियों में शामिल करना (Health in All Policies)- स्वास्थ्य, पर्यावरण, ऊर्जा और शहरी विकास मंत्रालयों के बीच संस्थागत समन्वय बनाना।
  4. रोगाणुरोधी प्रतिरोध के विरुद्ध ‘एक स्वास्थ्य’ दृष्टिकोण अपनाना- एंटीबायोटिक के उपयोग का नियमन, मानव-पशु-कृषि क्षेत्रक में निगरानी और नई औषधियों के अनुसंधान को प्रोत्साहन।
  5. डेटा एवं तकनीक का सुदृढ़ीकरण- बेहतर डेटा संग्रह, AI के जिम्मेदार उपयोग और वैज्ञानिक अनुसंधान को बढ़ावा देना चाहिए।
  6. संवाद और विश्वास-निर्माण- परमाणु जोखिम घटाने के लिए कूटनीति, निरस्त्रीकरण संवाद और विश्वास-निर्माण उपायों को बढ़ावा देना, तथा AI के दुर्भावनापूर्ण उपयोग पर अंतरराष्ट्रीय मानदंड और जवाबदेही-ढाँचे के निर्माण में भागीदारी करना।
  7. वैश्विक सहयोग- स्वास्थ्य सुरक्षा, जलवायु परिवर्तन, तकनीकी जोखिम और साझा मानकों पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग बढ़ाना चाहिए।

 

निष्कर्ष

Lancet की रिपोर्ट कोई भविष्यवाणी नहीं, एक चेतावनी है। ये बताती है कि अगर हमने आज इस दिशा में बेहतर प्रयास किया तो भविष्‍य सुरक्षित और बेहतर हो सकता है। भारत के सामने मौजूद वैश्विक खतरे अलग-अलग समस्याएँ नहीं, बल्कि परस्पर जुड़ी चुनौतियाँ हैं।


भारत को हर समस्या के लिए अलग योजना बनाने के बजाय ऐसी समन्वित व्यवस्था विकसित करनी चाहिए जिसमें रोकथाम, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाएँ, रोग निगरानी, आपदा तैयारी और सामाजिक सुरक्षा एक-दूसरे से जुड़ी हों। समय रहते समन्वित कार्रवाई करके भारत न केवल अपने नागरिकों की सुरक्षा कर सकता है, बल्कि वैश्विक स्तर पर समाधान विकसित करने में भी योगदान दे सकता है।





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