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Mains Answer writing Practice
प्रश्न: स्टेबलकॉइन्स क्या हैं? इनके
जोखिमों एवं नियामक उपायों का विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- हाल ही में अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक
अध्ययन में स्टेबलकॉइन्स की तेज़ी से बढ़ती लोकप्रियता, उनसे जुड़े जोखिमों और वैश्विक वित्तीय प्रणाली पर उनके प्रभाव का
विश्लेषण किया गया है। डिजिटल वित्त के विस्तार के साथ स्टेबलकॉइन्स वैश्विक
भुगतान और क्रिप्टो बाजार का महत्वपूर्ण हिस्सा बनते जा रहे हैं।
स्टेबलकॉइन्स ऐसी क्रिप्टो परिसंपत्तियां हैं जिनका
मूल्य किसी फ़िएट मुद्रा (जैसे अमेरिकी डॉलर) के साथ स्थिर रखा जाता है।
¶ प्रायः क्रिप्टो कंपनियों या वित्तीय संस्थाओं द्वारा
जारी और संचालित किया जाता है।
¶ प्रारंभ में इनका उपयोग क्रिप्टो ट्रेडिंग के लिए
मध्यस्थ माध्यम के रूप में किया जाता था।
¶ वर्तमान में उपयोग सीमा-पार भुगतान और प्रवासी धन प्रेषण
(Remittances) में भी बढ़
रहा है।
¶ यह एसेट टोकनाइजेशन की व्यापक प्रवृत्ति का हिस्सा हैं जिसमें
वास्तविक परिसंपत्तियों को डिजिटल रूप में दर्शाया जाता है।
स्टेबलकॉइन्स
से जुड़े जोखिम
¶ रन जोखिम- निवेशकों का भरोसा कम होने पर बड़े पैमाने पर निकासी से
आरक्षित परिसंपत्तियों की फायर सेल हो सकती है।
¶ मुद्रा प्रतिस्थापन- उच्च मुद्रास्फीति वाले देशों में विदेशी स्टेबलकॉइन्स के
बढ़ते उपयोग से मौद्रिक संप्रभुता कमजोर हो सकती है।
¶ बैंकों की भूमिका में कमी- इनके बढ़ते उपयोग से बैंकों के जमा स्रोत घट सकते हैं और
ऋण देने की क्षमता प्रभावित हो सकती है।
¶ वित्तीय अखंडता का खतरा-
ब्लॉकचेन की छद्म-नाम प्रकृति के कारण धन शोधन और आतंकवाद वित्तपोषण का जोखिम बढ़
सकता है।
स्टेबलकॉइन्स डिजिटल वित्त में
नवाचार और दक्षता ला सकते हैं परंतु उचित विनियमन और अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बिना
वित्तीय स्थिरता और मौद्रिक संप्रभुता के लिए जोखिम भी उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए
माइक्रो और मैक्रो-वित्तीय सुरक्षा उपायों को मजबूत करना, अंतर्राष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देना की आवश्यकता है।
प्रश्न: वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2026 के प्रमुख निष्कर्षों एवं नीतिगत
सुझावों की विवेचना कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- वैश्विक असमानता रिपोर्ट 2026 के
अनुसार विश्व में संपत्ति, आय और जलवायु प्रभावों का वितरण अत्यंत
असमान होता जा रहा है। सीमित धनी वर्ग के हाथों में संसाधनों का बढ़ता संकेंद्रण
आर्थिक असंतुलन, सामाजिक विषमता तथा जलवायु न्याय के लिए
गंभीर चुनौती बन रहा है।
रिपोर्ट के
प्रमुख निष्कर्ष
¶ संपत्ति का संकेंद्रण-
वैश्विक स्तर पर शीर्ष 1% लोगों
के पास लगभग 37% संपत्ति तथा शीर्ष 10%
के पास लगभग 75% संपत्ति है। भारत में शीर्ष 1% के पास लगभग 40% और शीर्ष 10%
के पास लगभग 65% संपत्ति है।
¶ आय वितरण में असमानता-
विश्व में शीर्ष 10% लोग लगभग 53% आय अर्जित करते हैं। भारत में शीर्ष 1% लगभग 23% और शीर्ष 10% लगभग 58%
राष्ट्रीय आय प्राप्त करते हैं।
¶ संपत्ति वृद्धि की असमान गति- 1990 के दशक से
अरबपतियों की संपत्ति लगभग 8% वार्षिक दर से बढ़ी, जो सबसे गरीब आधी आबादी की आय वृद्धि से लगभग दोगुनी है।
¶ जलवायु परिवर्तन में असमान योगदान- सबसे धनी 10% लोग
लगभग 77% कार्बन उत्सर्जन के लिए जिम्मेदार हैं, जबकि सबसे गरीब 50% केवल 3%
उत्सर्जन करते हैं।
¶ आर्थिक असंतुलन- प्रतिवर्ष ग्लोबल साउथ
से ग्लोबल नॉर्थ की ओर GDP के 1% से अधिक संसाधनों का स्थानांतरण होता है जो विकास सहायता से प्राप्त राशि
से कई गुना अधिक है।
नीतिगत सुझाव
- प्रगतिशील कर प्रणाली और अरबपतियों पर वैश्विक न्यूनतम कर लागू करना।
- शिक्षा, स्वास्थ्य और पोषण में निवेश बढ़ाना।
- नकद अंतरण, पेंशन और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को सुदृढ़ करना।
- लैंगिक समानता के लिए भेदभाव-रोधी कानून लागू करना।
- प्रगतिशील कार्बन कर तथा हरित निवेश को बढ़ावा देना।
वैश्विक असमानता केवल आर्थिक
नहीं बल्कि सामाजिक और पर्यावरणीय संकट भी बनती जा रही है। इसलिए प्रगतिशील कर
व्यवस्था, सामाजिक निवेश और अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सुधार के माध्यम
से अधिक समान और टिकाऊ विकास सुनिश्चित करना आवश्यक है।
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प्रश्न: SHANTI विधेयक, 2025 क्या है? इसके महत्व और संभावित चुनौतियों का
विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में “सस्टेनेबल
हार्नेसिंग एंड एडवांसमेंट ऑफ न्यूक्लियर एनर्जी फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंडिया (SHANTI) विधेयक, 2025” को मंजूरी दी है। इस विधेयक का
उद्देश्य भारत में परमाणु ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देना तथा विनियमित ढांचे में
निजी क्षेत्र की भागीदारी सुनिश्चित करना है।
SHANTI विधेयक,
2025
¶ निजी क्षेत्र की भागीदारी- परमाणु ऊर्जा क्षेत्र की पूरी मूल्य-श्रृंखला (डिज़ाइन, निर्माण, संचालन
आदि) में निजी कंपनियों को प्रवेश देने का प्रस्ताव है, जिससे
परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का एकाधिकार समाप्त होगा।
¶ एकीकृत कानूनी ढांचा-
परमाणु ऊर्जा से संबंधित मौजूदा कानूनों को एक व्यापक अधिनियम में समाहित किया
जाएगा, जिससे विनियामकीय
स्पष्टता और निवेशकों का विश्वास बढ़ेगा।
विधेयक का महत्व
¶ संसाधन सहायता- निजी निवेश से पूंजी की उपलब्धता बढ़ेगी और भारत को 2047 तक 100 गीगावाट
परमाणु ऊर्जा क्षमता के लक्ष्य को प्राप्त करने में मदद मिलेगी।
¶ प्रौद्योगिकी नवाचार- निजी कंपनियों के प्रवेश से स्मॉल मॉड्यूलर रिएक्टर (SMRs), उन्नत मॉड्यूलर डिज़ाइन और आधुनिक
सुरक्षा प्रणालियों के विकास को बढ़ावा मिलेगा।
¶ ऊर्जा सुरक्षा- परमाणु ऊर्जा उत्पादन और आपूर्ति-शृंखला के विस्तार से
जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम होगी तथा ऊर्जा सुरक्षा मजबूत होगी।
प्रमुख
चुनौतियां
¶ दायित्व और सुरक्षा मुद्दे-
‘परमाणु क्षति के लिए सिविल दायित्व अधिनियम,
2010’ के कठोर प्रावधान निजी निवेशकों को हतोत्साहित कर सकते हैं।
¶ राष्ट्रीय सुरक्षा-
परमाणु सामग्री और प्रौद्योगिकी के कारण कड़े सुरक्षा मानक और निगरानी।
¶ दीर्घकालिक परियोजनाएं- परमाणु
संयंत्रों के निर्माण में 7–10 वर्ष
लगते हैं, जिससे वित्तीय जोखिम और निवेश की अनिश्चितता बनी
रहती है।
SHANTI विधेयक भारत में
परमाणु ऊर्जा क्षेत्र के विस्तार और ऊर्जा संक्रमण को गति दे सकता है। हालांकि
इसकी सफलता के लिए मजबूत नियामक ढांचा, सुरक्षा मानकों और
निवेश-अनुकूल नीतियों का संतुलित क्रियान्वयन आवश्यक होगा।
प्रश्न: विश्व व्यापार संगठन (WTO) के समक्ष उभरती प्रमुख चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- विश्व व्यापार संगठन वैश्विक व्यापार को
नियम-आधारित ढांचे में संचालित करने वाली प्रमुख बहुपक्षीय संस्था है। किंतु हाल
के वर्षों में अमेरिका सहित कई देशों ने इसके नियमों, सर्वाधिक तरजीही राष्ट्र सिद्धांत
आदि पर प्रश्न उठाए हैं जिससे WTO की प्रभावशीलता और
प्रासंगिकता को लेकर गंभीर बहस उत्पन्न हुई है।
पुराने नियमों की सीमाएँ
¶ वैश्विक व्यापार में आए नए परिवर्तनों के संदर्भ में आर्थिक
सुरक्षा, आपूर्ति श्रृंखला
व्यवधान तथा डिजिटल व्यापार जैसे मुद्दों पर WTO के स्पष्ट
दिशा-निर्देशों का अभाव है।
¶ जलवायु परिवर्तन उपाय भी विवादास्पद हैं जैसे- यूरोपीय
संघ का कार्बन बॉर्डर एडजस्टमेंट मैकेनिज्म आयात पर कार्बन मूल्य लगाकर भारत जैसे
विकासशील देशों के साथ भेदभाव कर सकता है।
व्यापार असंतुलन
¶ कुछ देशों की सब्सिडी, कोटा उपायों जैसी बाजार-विकृत नीतियों ने वैश्विक उत्पादन
में असंतुलन उत्पन्न किया है। इससे अनेक देशों की निर्भरता बढ़ गई, भू-राजनीतिक विवाद में आपूर्ति बाधित होने का खतरा।
विवाद निपटान तंत्र निष्क्रियता
¶ WTO की अपीलीय संस्था (Appellate
Body) लंबे समय से निष्क्रिय है। अमेरिका द्वारा नए सदस्यों की
नियुक्ति रोके जाने के कारण विवाद निपटान प्रणाली प्रभावी ढंग से कार्य नहीं कर पा
रही है।
संरक्षणवाद
¶ आर्थिक राष्ट्रवाद तथा अमेरिका–चीन व्यापार तनाव के कारण
कई देशों में संरक्षणवादी नीतियों को बढ़ावा मिला है, जिससे WTO के
बहुपक्षीय ढांचे की उपेक्षा बढ़ रही है।
सर्वसम्मति आधारित निर्णय की समस्या
¶ WTO में निर्णय के लिए सर्वसम्मति आवश्यक
होने के कारण दोहा विकास दौर (Doha Development Round) लंबे
समय से अवरुद्ध है।
इस प्रकार बदलते वैश्विक आर्थिक
और तकनीकी परिवेश में उभरतीय चुनौतियों को देखते हुए WTO को अपने नियमों, निर्णय प्रक्रिया और विवाद निपटान
तंत्र में सुधार करने की आवश्यकता है ताकि यह संतुलित और निष्पक्ष वैश्विक व्यापार
व्यवस्था सुनिश्चित कर सके।
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