प्रश्न: जैव-आतंकवाद को 21वीं सदी
की एक उभरती सुरक्षा चुनौती के रूप में क्यों देखा जा रहा है? इसके
संदर्भ में भारत के दृष्टिकोण एवं आवश्यक सुधारात्मक उपायों की चर्चा कीजिए। (8
अंक )
उत्तर- तकनीकी प्रगति जैसे जैव-प्रौद्योगिकी, जीन संपादन आदि जहाँ स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांति लेकर आई वहीं जैव
आतंकवाद के रूप में इसके दुरुपयोग की आशंका भी बढ़ा दी है। यह आज मानवता के लिए एक
उभरती सुरक्षा चुनौती बन चुका है।
- तेज प्रसार- जैविक एजेंटों से कम समय में बड़े पैमाने पर जनहानि संभव।
- पहचान की चुनौती- हमले प्राकृतिक महामारी जैसे दिखते हैं जिससे प्रतिक्रिया में देरी होती है।
- ड्यूल-यूज़ रिसर्च- जीन एडिटिंग जैसी तकनीकें लाभकारी होने के साथ दुरुपयोग योग्य भी हैं।
- कम लागत एवं उच्च प्रभाव- सीमित संसाधनों में बड़े पैमाने पर अस्थिरता उत्पन्न करने की क्षमता।
इस प्रकार जैव आतंकवाद की
प्रकृति के कारण यह अत्यंत खतरनाक माना जाता है। भारत जैव-सुरक्षा को केवल सैन्य
नहीं, बल्कि मानव सुरक्षा और वैश्विक सहयोग के दृष्टिकोण से
देखता है जिसे निम्न प्रकार समझा जा सकता है
- नैतिक निगरानी- जिम्मेदार अनुसंधान और तकनीकी उपयोग पर जोर।
- समावेशी वैश्विक दृष्टिकोण- ग्लोबल साउथ देशों की भागीदारी बढ़ाने की वकालत।
- समान संसाधन पहुँच- जैव-सुरक्षा को प्रभावी बनाने हेतु तकनीकी समानता आवश्यक।
इस प्रकार वर्तमान परिदृश्य में
केवल पारंपरिक ढाँचे पर्याप्त नहीं हैं और बहु-स्तरीय सुधार आवश्यक हैं जिसके तहत
निम्न प्रयास किए जा सकते हैं:-
- अंतरराष्ट्रीय सहयोग- डेटा, तकनीक और संसाधनों का साझा उपयोग।
- क्षमता निर्माण- वैज्ञानिक अनुसंधान एवं जैव-फोरेंसिक क्षमताओं का विकास।
- त्वरित प्रतिक्रिया तंत्र- महामारी और जैव-हमलों से निपटने हेतु मजबूत प्रणाली।
जैव-आतंकवाद भविष्य की सुरक्षा
का “अदृश्य खतरा” है जो सीमाओं से परे जाकर मानव अस्तित्व को चुनौती देता
है। ऐसे में भारत का समावेशी, नैतिक और सहयोगात्मक दृष्टिकोण ही
वैश्विक जैव-सुरक्षा को मजबूत करने का वास्तविक आधार बन सकता है।
शब्द
संख्या- 271
प्रश्न: भारत में बढ़ते व्यापार
घाटे के कारणों का विश्लेषण कीजिए तथा इसे कम करने के उपाय सुझाइए। (8 अंक)
उत्तर- हाल के वर्षों में भारत
का व्यापार घाटा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है। जनवरी 2026 तक भारत का व्यापार
घाटा लगभग 92.30 अरब डॉलर तक पहुँच गया जिसका मुख्य कारण आयात में तेज वृद्धि और
निर्यात में अपेक्षाकृत धीमी वृद्धि है।
व्यापार घाटे के प्रमुख कारण
- आयात निर्भरता -भारत की
ऊर्जा, इलेक्ट्रॉनिक्स और मशीनरी के लिए बड़े पैमाने पर आयात
निर्भरता से आयात बिल बढ़ता है।
- निर्यात की कमजोर प्रतिस्पर्धा- भारतीय
उत्पाद कई बार गुणवत्ता, लागत और तकनीक के मामले में वैश्विक
मानकों से पीछे रह जाते हैं।
- विनिर्माण क्षेत्र की सीमाएँ- भारत का विनिर्माण क्षेत्र अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर है जिससे निर्यात क्षमता सीमित रहती है।
- वैश्विक अनिश्चितताएँ -भू-राजनीतिक तनाव और वैश्विक मंदी के कारण निर्यात मांग प्रभावित।
भारत का बढ़ता व्यापार घाटा
संकेत देता है कि देश अभी भी उपभोग-आधारित अर्थव्यवस्था बना हुआ है जहाँ आयात अधिक
और निर्यात कम है। हालाँकि, भारत इसके समाधान हेतु निम्न कदम उठाया
जा सकता है
- विनिर्माण को सशक्त बनाना- “मेक
इन इंडिया” और PLI योजनाओं के माध्यम से उत्पादन बढ़ाना।
- मुक्त व्यापार समझौतों का प्रभावी उपयोग- घरेलू उत्पादन गुणवत्तापूर्ण और प्रतिस्पर्धी बनाया जाए।
- निर्यात विविधीकरण- नए बाजारों और उच्च मूल्य वाले उत्पादों पर ध्यान।
- शोध एवं अनुसंधान निवेश- शोध
एवं विकास में भारत का व्यय GDP का लगभग 0.7% है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा
बढ़ाने और तकनीकी क्षमता को मजबूत करने हेतु व्यय बढ़ाया जाए।
- लॉजिस्टिक्स और अवसंरचना सुधार- परिवहन लागत कम कर वैश्विक प्रतिस्पर्धा बढ़ाना।
इस प्रकार भारत का व्यापार घाटा
संरचनात्मक समस्या है। भारत मजबूत विनिर्माण आधार, उच्च गुणवत्ता उत्पादन,
नवाचार और वैश्विक प्रतिस्पर्धा पर ध्यान देकर व्यापार घाटे को कम
कर निर्यात-उन्मुख अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ सकता है।
शब्द
संख्या- 275
प्रश्न: पश्चिम एशिया में बढ़ते
संघर्ष के संदर्भ में भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव का विश्लेषण कीजिए। इसके
समाधान हेतु आवश्यक रणनीतियों पर भी चर्चा करें। 8 अंक
उत्तर- भारत अपनी ऊर्जा
आवश्यकताओं का बड़ा हिस्सा आयात, विशेषकर पश्चिम एशिया से प्राप्त करता
है लेकिन बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और सैन्य संघर्ष ने भारत की ऊर्जा सुरक्षा को
गंभीर रूप से प्रभावित किया है।
- ऊर्जा निर्भरता का जोखिम- भारत की अर्थव्यवस्था पेट्रोलियम उत्पादों पर आधारित है जिससे बाहरी झटकों के प्रति संवेदनशीलता बढ़ती है।
- तेल कीमतों में वृद्धि- आपूर्ति बाधित होने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमतें बढ़ती हैं जिससे मुद्रास्फीति बढ़ती है।
- आर्थिक दबाव-आयात बिल
बढ़ने से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है तथा उद्योगों की लागत में वृद्धि होती है जो भारत
की अर्थव्यवस्था, महंगाई और विकास पर असर डालता है।
- आपूर्ति असुरक्षा- समुद्री मार्गों (जैसे होर्मुज जलडमरूमध्य) में अस्थिरता से आपूर्ति बाधित होने का खतरा।
समाधान हेतु रणनीति
- ऊर्जा स्रोतों का विविधीकरण कर पश्चिम एशिया पर निर्भरता कम कर अन्य क्षेत्रों से आयात बढ़ाना।
- नवीकरणीय ऊर्जा का विस्तार जैसे
सौर, पवन और जैव ऊर्जा जैसे विकल्पों को बढ़ावा देना।
- रणनीतिक भंडारण ताकि आपातकालीन स्थिति में उपयोग किया जा सके।
- ऊर्जा दक्षता द्वारा उद्योग और परिवहन क्षेत्र में ऊर्जा के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना।
- ऊर्जा संकट में अफवाहों और जमाखोरी रोकने हेतु पारदर्शी सूचना प्रणाली।
इस प्रकार ऊर्जा सुरक्षा केवल
आर्थिक नहीं, बल्कि एक रणनीतिक मुद्दा है। भारत को दीर्घकालिक दृष्टिकोण
अपनाते हुए ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता, विविधीकरण और
तकनीकी नवाचार को प्राथमिकता देनी होगी, ताकि भविष्य के
वैश्विक संकटों का प्रभाव न्यूनतम किया जा सके।
शब्द
संख्या- 234
प्रश्न: “भारत में आतंकवाद-रोधी रणनीति अब प्रतिक्रियात्मक मॉडल से हटकर पूर्व-निरोधक एवं समन्वित दृष्टिकोण की ओर अग्रसर है।” व्यापक आतंकवाद-रोधी नीति की आवश्यकता प्रमुख स्तंभों तथा चुनौतियों का विश्लेषण कीजिए। (38 अंक)
उत्तर- भारत आतंकवाद प्रभावित
देशों में शामिल है जहां आतंकवाद का स्वरूप समय के साथ अधिक जटिल और बहुआयामी होता
गया जिसे देखते हुए एक पूर्वानुमानित, समन्वित और संस्थागत
नीति ढांचे की आवश्यकता स्पष्ट हुई।
व्यापक नीति की आवश्यकता
- पारंपरिक प्रतिक्रियावादी
रणनीति में घटना के बाद प्रतिक्रियावादी दृष्टिकोण अपनाया जाता था जैसे जैसे संसद
हमला (2001), मुंबई (2008), उरी (2016), पुलवामा (2019) के बाद कई सुधार अपनाएं गए।
- संघीय असंतुलन की समस्या में राज्यों
में अलग-अलग SOP और समन्वय की कमी।
- पिछले कुछ वर्षों में सीमापार
आतंकवाद, साइबर आतंकवाद, लोन-वुल्फ हमले,
आधुनिक वित्तीय नेटवर्क जैसे नए खतरे।
- संस्थागत कमजोरी के अंतर्गत खुफिया, पुलिस और न्याय प्रणाली के बीच तालमेल का अभाव।
इस प्रकार ऐसे में केवल घटनाओं
के बाद प्रतिक्रिया देने वाला दृष्टिकोण पर्याप्त नहीं रहा बल्कि पूर्व-निरोधक और
एकीकृत नीति की आवश्यकता उभरकर सामने आई जिसके प्रमुख स्तंभ निम्न हैं
- संघीय समन्वय - केंद्र–राज्य
के बीच एकीकृत SOP और स्पष्ट कमान संरचना शामिल करती है।
- तकनीक-आधारित खुफिया तंत्र - AI और रीयल-टाइम डेटा से खतरे की पूर्व पहचान।
- विशेषीकृत बल- त्वरित प्रतिक्रिया हेतु प्रशिक्षित आतंकवाद-रोधी इकाइयाँ।
- वित्तीय निगरानी- हवाला, क्रिप्टो और अवैध फंडिंग नेटवर्क पर नियंत्रण।
- सामाजिक रोकथाम- डी-रेडिकलाइजेशन और कम्युनिटी पुलिसिंग के माध्यम से जड़ों पर प्रहार।
- कानूनी एकीकरण- UAPA, NIA और भारतीय न्याय संहिता के बीच समन्वित कार्यप्रणाली।
इस प्रकार, नई आतंकवाद-रोधी नीति बहु-आयामी दृष्टिकोण आधारित है जो सुरक्षा, समाज और तकनीक तीनों स्तरों पर काम करती है। हालांकि नीति व्यापक एवं वर्तमान
आवश्यकताओं के अनुरूप है लेकिन इसके प्रभावी क्रियान्वयन में कई बाधाएँ हैं जैसे-
- संघीय राजनीति के तहत केंद्र–राज्य तालमेल बनाए रखना चुनौतीपूर्ण।
- नागरिक स्वतंत्रता बनाम सुरक्षा के मध्य संतुलन बनाना कठिन।
- तकनीकी जटिलताएं जैसे एन्क्रिप्टेड संचार और डार्क वेब का उपयोग।
- बेहतर कार्यान्वयन हेतु प्रशासनिक दक्षता और राजनीतिक इच्छाशक्ति की आवश्यकता।
इस प्रकार भारत की नई
आतंकवाद-रोधी नीति एक महत्वपूर्ण बदलाव का संकेत देती है। यह केवल प्रतिक्रिया
नहीं, बल्कि पूर्व-निरोध, समन्वय और
संस्थागत सुदृढ़ीकरण पर आधारित है। यदि इसे प्रभावी रूप से लागू किया जाए तो यह
भारत को अधिक सुरक्षित, स्थिर और सक्षम राष्ट्र बनाने में
निर्णायक भूमिका निभा सकती है।
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