पश्चिम एशिया संकट, अक्षय ऊर्जा, आर्थिक असमानता, आभासी दुनिया एवं नई पीढ़ी
1. प्रश्न: हालिया पश्चिम
एशिया संकट के संदर्भ में “हमले का असर” (Spillover Effect) वैश्विक
और क्षेत्रीय स्थिरता को कैसे प्रभावित करता है? विश्लेषण
कीजिए। (8 अंक)
उत्तर-हाल में पश्चिम एशिया में
बढ़ते संघर्ष, विशेषकर अमेरिका–इजराइल और ईरान से जुड़े घटनाक्रम दर्शाते
हैं कि किसी एक क्षेत्र में हुआ सैन्य हमला केवल स्थानीय प्रभाव तक सीमित नहीं
रहता बल्कि उसका “स्पिलओवर इफेक्ट” वैश्विक रूप में व्यापक असर डालता है जिसे निम्न
प्रकार देख सकते हैं
- क्षेत्रीय अस्थिरता में वृद्धि- एक
देश पर हमला अन्य देशों को भी संघर्ष में खींच सकता है। उदाहरण के तौर पर, ईरान, इजराइल और खाड़ी देशों के बीच तनाव पूरे
पश्चिम एशिया को अस्थिर कर सकता है।
- वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा पर प्रभाव- यह
क्षेत्र विश्व का प्रमुख तेल उत्पादक है। संघर्ष के कारण तेल आपूर्ति बाधित होती
है और कीमतों में वृद्धि होती है, जिसका असर भारत जैसे आयात-निर्भर देशों
पर पड़ता है।
- भू-राजनीतिक ध्रुवीकरण- शक्तिशाली
देश (जैसे अमेरिका, रूस, चीन) अलग-अलग
पक्षों का समर्थन करते हैं, जिससे वैश्विक राजनीति में
विभाजन और प्रतिस्पर्धा बढ़ती है।
- सुरक्षा और आतंकवाद का खतरा-
संघर्ष के फैलने से गैर-राज्य तत्व और आतंकवादी संगठन सक्रिय हो सकते हैं, जिससे वैश्विक सुरक्षा चुनौतियाँ बढ़ती हैं।
आज की दुनिया में अंतरनिर्भरता
इतनी गहरी है कि कोई भी संघर्ष अलग-थलग नहीं रहता। पश्चिम एशिया का संकट केवल
सैन्य टकराव नहीं, बल्कि ऊर्जा, व्यापार
मार्ग, और वैश्विक शक्ति संतुलन से जुड़ा हुआ है। संघर्ष
लंबा खिंचने पर वैश्विक अर्थव्यवस्था, महंगाई और विकास दर पर
भी प्रभावित होगा।
समाधान
- कूटनीतिक समाधान को प्राथमिकता देना आवश्यक है।
- अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं (UN) की भूमिका मजबूत करनी होगी।
- क्षेत्रीय सहयोग और संवाद के माध्यम से तनाव कम किया जा सकता है।
इस प्रकार, किसी एक क्षेत्र में हुआ सैन्य हमला आज वैश्विक स्तर पर व्यापक प्रभाव
डालता है। इसलिए आवश्यक है कि राष्ट्र संघर्ष के बजाय संवाद और सहयोग को
प्राथमिकता दें ताकि वैश्विक शांति और स्थिरता बनी रह सके।
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2. प्रश्न: “सीमित संसाधनों
के बीच अक्षय ऊर्जा ही सतत विकास का आधार है।” कथन पर अपने विचार व्यक्त करें (8 अंक)
उत्तर: आज वैश्विक स्तर पर
प्राकृतिक संसाधनों की कमी और बढ़ता प्रदूषण मानवता के सामने गंभीर चुनौती बन चुके
हैं। कोयला, पेट्रोलियम और गैस जैसे पारंपरिक ऊर्जा स्रोत जहां सीमित
हैं वहीं इनके कारण पर्यावरणीय संकट भी गहराता जा रहा है। ऐसे में अक्षय ऊर्जा (Renewable
Energy) को सतत विकास का प्रमुख आधार माना जा रहा है।
अक्षय ऊर्जा का महत्व
- असीमित एवं स्वच्छ स्रोत-सौर, पवन,जल ऊर्जा जैसे स्रोत प्रदूषण रहित और समाप्त
नहीं होते।
- पर्यावरण संरक्षण- इनके उपयोग से कार्बन उत्सर्जन में कमी आती है।
- ऊर्जा सुरक्षा- आयात पर निर्भरता घटाकर आत्मनिर्भरता को बढ़ावा मिलता है।
- समावेशी विकास- दूरस्थ क्षेत्रों तक ऊर्जा पहुंचाकर जीवन स्तर में सुधार संभव होता है।
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (IEA) के अनुसार भविष्य में ऊर्जा मांग का बड़ा हिस्सा अक्षय स्रोतों से पूरा
किया जा सकता है। भारत ने भी सौर और पवन ऊर्जा में तेजी से विस्तार किया है तथा
सतत विकास लक्ष्यों के अनुरूप ऊर्जा नीति को पुनर्गठित किया है। हांलाकि इसकी राह
में उच्च प्रारंभिक लागत, तकनीकी निवेश, अनियमित आपूर्ति, भंडारण एवं ग्रिड अवसंरचना की कमी
जैसी चुनौतियाँ है।
इस प्रकार अक्षय ऊर्जा भविष्य
का आधार है लेकिन पूर्ण समाधान मानना अभी जल्दबाजी होगी। अभी जहां पारंपरिक ऊर्जा
स्रोतों के साथ संतुलित संक्रमण आवश्यक है वहीं तकनीकी नवाचार, ऊर्जा भंडारण और नीतिगत समर्थन से ही इसकी क्षमता का पूर्ण उपयोग संभव
होगा। अत: सीमित संसाधनों के युग में अक्षय ऊर्जा सतत विकास की दिशा में सबसे
प्रभावी विकल्प है। हालांकि, इसके सफल क्रियान्वयन के लिए
संतुलित नीति, तकनीकी उन्नति और वैश्विक सहयोग आवश्यक है ।
3. प्रश्न: “भारत की उच्च आर्थिक
वृद्धि दर के बावजूद बढ़ती आर्थिक असमानता विकास की गुणवत्ता पर प्रश्नचिह्न लगाती
है।” समकालीन परिप्रेक्ष्य में विश्लेषण कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- भारत आज विश्व की चौथी
सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन चुका है परंतु यह उपलब्धि एक गंभीर विरोधाभास को भी
उजागर करती है तेज आर्थिक वृद्धि के साथ बढ़ती असमानता। GDP वृद्धि विकास का पूरा चित्र नहीं देती, क्योंकि यह
औसत आय दिखाती है न कि संपत्ति के वितरण को।
भारत में विकास का लाभ समान रूप
से वितरित नहीं हो रहा है। यानी "वृद्धि बिना समानता" की स्थिति उभर रही
है जिसे निम्न प्रकार समझ सकते हैं:-
- असमान विकास-उच्च वर्ग की
संपत्ति तेजी से बढ़ रही है, जबकि बड़ी आबादी बुनियादी जरूरतों के
लिए संघर्ष कर रही है।
- कोविड-19 का प्रभाव- महामारी
में निम्न व मध्यम वर्ग की आय घटी, जबकि संपन्न वर्ग
अपेक्षाकृत लाभ में रहा।
- रोजगार संकट- अनौपचारिक क्षेत्र में अधिक रोजगार होने से आय अस्थिर और सामाजिक सुरक्षा सीमित है।
- नीतिगत असंतुलन- उदारीकरण व विनिवेश का लाभ मुख्यतः उच्च वर्ग को मिला।
- ट्रिकल डाउन विफलता- ऊपर की आय वृद्धि का लाभ नीचे तक प्रभावी रूप से नहीं पहुँचा।
- सेवाओं में असमानता- शिक्षा, स्वास्थ्य व पोषण तक समान पहुँच का अभाव असमानता बढ़ाता है।
यह स्थिति भारत के विकास मॉडल
में मौजूद संरचनात्मक असंतुलन को दर्शाती है। आर्थिक वृद्धि का बड़ा हिस्सा
पूंजी-प्रधान क्षेत्रों में केंद्रित है जिससे रोजगार सृजन सीमित रहता है दूसरी ओर, मानव विकास के सूचकांकों में अपेक्षित सुधार नहीं हो पाता।
समाधान
- विकास को समाज के सभी वर्गों तक पहुँचाना।
- श्रम-प्रधान क्षेत्रों और MSMEs प्रोत्साहन।
- मानव पूंजी को मजबूत करना।
- सामाजिक सुरक्षा के तहत असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सुरक्षा प्रदान करना।
इस प्रकार, केवल GDP वृद्धि से विकास का आकलन अधूरा है वास्तविक
विकास वह है जो समान अवसर और न्यायपूर्ण वितरण सुनिश्चित करे। इसलिए भारत को
वृद्धि के साथ समानता के मॉडल की ओर बढ़ना होगा।
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4. प्रश्न: “आभासी दुनिया (Virtual
World) के बढ़ते प्रभाव ने नई पीढ़ी की सोच, व्यवहार
और निर्णय क्षमता को किस प्रकार प्रभावित किया है?” विश्लेषण
कीजिए। (8 अंक)
उत्तर- आज की युवा पीढ़ी तकनीक, सोशल मीडिया और कृत्रिम बुद्धिमत्ता से प्रभावित है जो विसंगतियों के
खिलाफ मुखर है लेकिन “हर समस्या का त्वरित समाधान” चाहती है। यह पीढ़ी डिजिटल
माध्यमों से दुनिया को समझ तो रही है लेकिन वास्तविक अनुभव और धैर्य आधारित समझ
कमजोर हो रही है। इस पीढ़ी से संबंधित मुद्दों को निम्न प्रकार देख सकते हैं-
- सोशल मीडिया के माध्यम से वैश्विक मुद्दों से जुड़ाव है लेकिन यह जुड़ाव अक्सर सतही रहता है।
- AI के बढ़ते उपयोग से निर्णय लेना आसान हुआ लेकिन स्वतंत्र चिंतन और विश्लेषण क्षमता प्रभावित हो रही है।
- ज्ञान बनाम सूचना का भ्रम नई पीढ़ी में है। इस पीढ़ी की सूचनाओं तक पहुंच है लेकिन उसकी समझ और गहराई की कमी है।
- डिजिटल उपकरणों पर बढ़ती निर्भरता से बच्चों की बौद्धिक क्षमता और एकाग्रता में गिरावट देखी जा रही है।
- डिजिटल सक्रियता के बावजूद जमीनी समस्याओं से निपटने की क्षमता और धैर्य की कमी।
इस प्रकार यह परिवर्तन केवल
तकनीकी नहीं, बल्कि गहरे सामाजिक-मनोवैज्ञानिक बदलाव का संकेत है। पहले
ज्ञान अनुभव, परिश्रम और समय के साथ विकसित होता था लेकिन अब
एल्गोरिद्म और डिजिटल प्लेटफॉर्म सोच को दिशा देने लगे हैं। यह स्थिति “सूचना संपन्न,
परंतु समझ से वंचित” समाज की ओर संकेत करती है जिसके लिए निम्न
उपायों को अपनाया जा सकता है
- डिजिटल साक्षरता के साथ तकनीक का संतुलित उपयोग।
- डिजिटल के साथ जमीनी और प्रायोगिक सीख को बढ़ावा।
- सूचना और ज्ञान के बीच अंतर समझाने पर जोर दिया जाए।
- वास्तविक संवाद और सामाजिक सहभागिता को बढ़ाया जाए।
आभासी दुनिया ने नई पीढ़ी को
जागरूक और तेज बनाया है परंतु उसे अधीर और सतही सोच की ओर भी धकेला है। इनमें आत्मविश्वास
बढ़ा है लेकिन आत्मबोध और गहराई कम हुई है। अत: यह जरूरी है कि तकनीक को साधन बनाकर संतुलन बनाया
जाए।
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