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Mar 27, 2026

New Labor Code on Wages-Industrial Relations-The Code on Social Security

 

नवीन श्रम संहिताएं

भारत के श्रम कानूनों में एक बड़े सुधार के तहत हाल ही में श्रम और रोजगार मंत्रालय ने 4 श्रम संहिताओं (Labour Codes) को लागू कर दिया है जो 29 मौजूदा केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करती हैं।

 


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भारत में श्रम से संबंधित संवैधानिक प्रावधान व संस्थागत तंत्र

भारत में श्रम कल्याण का ढांचा संविधान, नीतिगत निर्देशों और संस्थागत तंत्र पर आधारित है, जिसका उद्देश्य सामाजिक न्याय, गरिमा और समानता सुनिश्चित करना है।

 

श्रम सुधारों की आवश्यकता

  1. अनुपालन जटिलता-अनेक श्रम कानूनों के कारण अनुपालन कठिन हो जाता है, इसलिए सरलीकरण आवश्यक है।
  2. कानूनों का आधुनिकीकरण-कई श्रम कानून पुराने हैं और आधुनिक आर्थिक व तकनीकी परिस्थितियों के अनुरूप नहीं हैं।
  3. सीमित कवरेज-लगभग 90% श्रमिक असंगठित क्षेत्र में हैं जिन्हें सामाजिक सुरक्षा लाभ नहीं मिलता।
  4. आर्थिक विकास-सरल कानून ‘व्यापार सुगमता’ बढ़ाकर निवेश और रोजगार को प्रोत्साहित करते हैं।
  5. नए रोजगार स्वरूप-गिग श्रमिकों को मान्यता और सुरक्षा देने के लिए सुधार आवश्यक हैं।

 

भारत का श्रम ढांचा संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है, परंतु बदलती अर्थव्यवस्था के अनुरूप सरलीकरण, आधुनिकीकरण और समावेशन आवश्यक है, ताकि सभी श्रमिकों को समान सुरक्षा और अवसर मिल सकें।

 

वेतन संहिता, 2019 (Code on Wages, 2019)

वेतन संहिता, 2019 के तहत मजदूरी से संबंधित 4 कानूनों का समेकन किया गया है। इसका उद्देश्य वेतन प्रणाली में सरलता, एकरूपता और श्रमिकों के अधिकारों को सुदृढ़ करना है।

यह संहिता नियोक्ताओं के लिए अनुपालन को सरल बनाती है और श्रमिकों को न्यूनतम वेतन व समय पर भुगतान का अधिकार सुनिश्चित करती है। अर्थात, यह Ease of Doing Business और श्रमिक संरक्षण के बीच संतुलन स्थापित करती है।

 

प्रमुख प्रावधान

  1. न्यूनतम मजदूरी -सभी संगठित और असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को न्यूनतम वेतन का कानूनी अधिकार प्रदान।
  2. मजदूरी निर्धारण-मजदूरी का निर्धारण कौशल, क्षेत्र और कार्य की परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
  3. फ्लोर वेज-केंद्र सरकार के राष्ट्रीय फ्लोर वेज के नीचे राज्य न्यूनतम मजदूरी निर्धारित नहीं कर सकते।
  4. भुगतान एवं ओवरटाइम-समय पर वेतन भुगतान अनिवार्य और ओवरटाइम के लिए दोगुना भुगतान।
  5. सरलीकरण-प्रमुख परिभाषाओं को मानकीकृत कर कानूनी भ्रम कम किया गया है।

 

महत्व

  1. असमानता में कमी-फ्लोर वेज से क्षेत्रीय वेतन असमानता कम होती है।
  2. लैंगिक समानता-सभी लिंगों के लिए समान कार्य हेतु समान वेतन सुनिश्चित किया गया है।
  3. विश्वास आधारित प्रणाली-छोटे उल्लंघनों पर कारावास के बजाय आर्थिक दंड का प्रावधान है।

 

चिंताएं

  1. कार्यान्वयन-असंगठित क्षेत्र में प्रभावी क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है।
  2. संघीय प्रभाव-राज्यों की वेतन निर्धारण स्वायत्तता प्रभावित हो सकती है।

 

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औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 (The Industrial Relations Code, 2020)

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 के तहत औद्योगिक विवाद, श्रमिक संघ और रोजगार शर्तों से जुड़े 3 कानूनों का समेकन किया गया है। इसका उद्देश्य औद्योगिक संबंधों को सरल, पारदर्शी और संतुलित बनाना है।


यह संहिता ट्रेड यूनियनों, रोजगार शर्तों और औद्योगिक विवादों के समाधान को सरल और प्रभावी बनाती है। अर्थात, यह उद्योगों में स्थिरता और श्रमिक-नियोक्ता संतुलन स्थापित करने का प्रयास करती है।

 

प्रमुख प्रावधान

  1. ट्रेड यूनियन व्यवस्था-एकमात्र वार्ताकार संघ बनने के लिए 51% सदस्यता आवश्यक है जिससे वार्ता प्रक्रिया अधिक स्पष्ट और सुव्यवस्थित होती है।
  2. निश्चित अवधि रोजगार (FTE)-इस प्रावधान के तहत निश्चित अवधि के रोजगार को औपचारिक मान्यता दी गई है, जिससे नियोक्ताओं को लचीलापन मिलता है।
  3. श्रमिक की विस्तृत परिभाषा-इसमें पत्रकार, विक्रय संवर्धन कर्मचारी और ₹18,000/माह तक वेतन पाने वाले पर्यवेक्षी कर्मचारी शामिल किए गए हैं।
  4. छंटनी/बंद करने की सीमा-सरकारी अनुमति की सीमा 100 से बढ़ाकर 300 श्रमिक कर दी गई है, जिसे राज्य और बढ़ा सकते हैं।
  5. उद्योग की व्यापक परिभाषा-इसमें लाभ-हानि की परवाह किए बिना सभी संगठित आर्थिक गतिविधियों को शामिल किया गया है।

गुण (Merits)

  1. कौशल विकास-पुनः कौशल निधि के माध्यम से छंटनी किए गए श्रमिकों के प्रशिक्षण के लिए नियोक्ता को 15 दिन के वेतन के बराबर राशि देनी होती है।
  2. विवाद समाधान-20 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों में आंतरिक शिकायत निवारण समितियों (IGRCs) की स्थापना से विवादों का त्वरित समाधान संभव होता है।

 

दोष 

  1. छंटनी का जोखिम-छंटनी की सीमा बढ़ने से “हायर एंड फायर” की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
  2. अस्थिर रोजगार-FTE के कारण स्थायी नौकरियों की जगह अल्पकालिक अनुबंध बढ़ सकते हैं।
  3. यूनियनों की कमजोरी-51% सदस्यता की शर्त से छोटे श्रमिक संघों की सौदेबाजी शक्ति कमजोर हो सकती है।

 

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020 औद्योगिक ढांचे को आधुनिक और लचीला बनाती है, लेकिन श्रमिक सुरक्षा और रोजगार स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए संतुलित कार्यान्वयन आवश्यक है।

 

 

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 (The Code on Social Security, 2020)

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 के का उद्देश्य संगठित, असंगठित, गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों तक सामाजिक सुरक्षा का विस्तार करना है।

यह “सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा” की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह संहिता सभी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा कवरेज प्रदान करने और कल्याणकारी योजनाओं को एकीकृत करने का प्रयास करती है।

 

प्रमुख प्रावधान

गिग एवं प्लेटफॉर्म श्रमिक

  • इस संहिता में पहली बार गिग और प्लेटफॉर्म श्रमिकों को कानूनी मान्यता दी गई है।
  • एग्रीगेटर कंपनियों को अपने वार्षिक टर्नओवर का 1–2% सामाजिक सुरक्षा कोष में योगदान करना होगा।

ESIC कवरेज का विस्तार

  • कर्मचारी राज्य बीमा (ESIC) को पूरे देश में लागू किया गया है और “अधिसूचित क्षेत्र” की शर्त समाप्त कर दी गई है।
  • 10 से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठान भी स्वेच्छा से इसमें शामिल हो सकते हैं, जबकि खतरनाक उद्योगों के लिए यह अनिवार्य है।

मजदूरी की एकसमान परिभाषा

  • मजदूरी में मूल वेतन, महंगाई भत्ता और प्रतिधारण भत्ता शामिल किए गए हैं।

  • कुल पारिश्रमिक का कम-से-कम 50% मजदूरी के रूप में गिना जाएगा, जिससे पेंशन और ग्रेच्युटी की गणना में एकरूपता आएगी।

ग्रेच्युटी प्रावधान

  • निश्चित अवधि के कर्मचारियों (FTE) को एक वर्ष की सेवा के बाद ही ग्रेच्युटी का अधिकार मिल जाएगा।

गुण 

  1. राष्ट्रीय डेटाबेस-असंगठित श्रमिकों के पंजीकरण और उनके कौशल विवरण के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल डेटाबेस बनाने का प्रावधान किया गया है।
  2. व्यापक कवरेज-यह संहिता संगठित और असंगठित दोनों क्षेत्रों के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा के दायरे में लाती है।

 

दोष

  1. वित्तीय अस्पष्टता-सामाजिक सुरक्षा कोष के वित्तपोषण के स्रोत और तंत्र पर स्पष्टता का अभाव है।
  2. सीमित सार्वभौमिकता-कई योजनाओं का कवरेज अभी भी प्रतिष्ठानों के आकार पर निर्भर करता है, जिससे पूर्ण सार्वभौमिकता नहीं मिल पाती।

 

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 भारत में समावेशी और व्यापक सामाजिक सुरक्षा प्रणाली की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है, परंतु इसके प्रभावी क्रियान्वयन के लिए वित्तीय स्पष्टता और व्यापक कवरेज सुनिश्चित करना आवश्यक होगा।

 

 

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्यदशाएं संहिता, 2020 The Occupational Safety, Health, and Working Conditions Code, 2020 

व्यावसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य दशा संहिता, 2020 के तहत 13 केंद्रीय श्रम कानूनों का समेकन किया गया है। इसका उद्देश्य सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करते हुए श्रमिक संरक्षण और व्यवसायिक सुगमता के बीच संतुलन स्थापित करना है।

यह संहिता श्रमिकों की सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य दशाओं में सुधार करते हुए उद्योगों के लिए सरल नियामक ढांचा प्रदान करती है।

 

प्रमुख प्रावधान

  1. एकीकृत पंजीकरण-सभी प्रतिष्ठानों के लिए 10 कर्मचारियों की समान सीमा के साथ इलेक्ट्रॉनिक पंजीकरण की व्यवस्था की गई है।
  2. खतरनाक कार्यों का विस्तार-सरकार खतरनाक कार्यों में लगे किसी भी प्रतिष्ठान (भले ही एक ही कर्मचारी हो) पर इस संहिता को लागू कर सकती है।
  3. प्रवासी श्रमिक-अंतरराज्यीय प्रवासी श्रमिकों की परिभाषा का विस्तार कर स्वयं प्रवास करने वाले श्रमिकों को भी शामिल किया गया है।
  4. महिला रोजगार-महिलाओं को उनकी सहमति और सुरक्षा प्रावधानों के साथ सभी क्षेत्रों में, यहां तक कि रात की पाली में भी काम करने की अनुमति दी गई है।
  5. राष्ट्रीय सुरक्षा बोर्ड-राष्ट्रीय व्यावसायिक सुरक्षा एवं स्वास्थ्य सलाहकार बोर्ड की स्थापना से मानकों में एकरूपता सुनिश्चित की गई है।

 

संस्थागत तंत्र

  1. सुरक्षा समितियां- 500+ श्रमिकों वाले कारखानों, 250+ निर्माण इकाइयों और 100+ खानों में सुरक्षा समितियों का गठन अनिवार्य किया गया है।
  2. कल्याण अधिकारी-250 या अधिक श्रमिकों वाले प्रतिष्ठानों में कल्याण अधिकारी नियुक्त किया जाएगा।
  3. अनुबंध श्रम- 50 या अधिक श्रमिकों वाले ठेकेदारों पर नियम लागू होंगे ।

गुण (Merits)

  1. श्रमिक सुरक्षा-कार्य के घंटे अधिकतम 8 घंटे प्रतिदिन और 48 घंटे प्रति सप्ताह निर्धारित किए गए हैं।
  2. पारदर्शिता-सभी श्रमिकों को नियुक्ति पत्र देना अनिवार्य किया गया है जिससे जवाबदेही बढ़ती है।
  3. महिला सशक्तिकरण-महिलाओं को नाइट शिफ्ट सहित सभी क्षेत्रों में काम करने की अनुमति देकर श्रम भागीदारी बढ़ाई गई है।

 

दोष

  1. सीमित कवरेज-फैक्ट्री लाइसेंस की सीमा बढ़ने से कई छोटे प्रतिष्ठान नियमों के दायरे से बाहर हो सकते हैं।
  2. निरीक्षण की कमजोरी-स्व-प्रमाणन व्यवस्था के कारण सुरक्षा मानकों के उल्लंघन की निगरानी कमजोर हो सकती है। इससे प्रभावी प्रवर्तन एक प्रमुख चुनौती बन जाता है।

 


आगे की राह

  1. आधुनिक और लचीला ढांचा- ये चारों संहिताएं भारत के पुराने, खंडित और जटिल श्रम कानूनों को 21वीं सदी की आर्थिक और जनसांख्यिकीय जरूरतों के अनुरूप एक सुव्यवस्थित रूप देती हैं।
  2. मजबूत निगरानी की आवश्यकता- 'स्व-प्रमाणन' (Self-certification) और 'हायर एंड फायर' जैसे लचीले प्रावधानों के संभावित दुरुपयोग को रोकने के लिए एक पारदर्शी और मजबूत प्रवर्तन (Enforcement) तंत्र नितांत आवश्यक है।
  3. वित्तीय स्पष्टता- सामाजिक सुरक्षा कोष, विशेषकर असंगठित और गिग श्रमिकों के लिए, एक अत्यंत स्पष्ट और पारदर्शी वित्तीय रोडमैप की मांग करता है।
  4. सहकारी संघवाद-श्रम संविधान की 'समवर्ती सूची' (Concurrent List) का विषय है। इन ऐतिहासिक संहिताओं की वास्तविक सफलता केंद्र और राज्य सरकारों के बीच प्रभावी समन्वय और नियम-निर्माण पर निर्भर करेगी।

 

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भारत में श्रम से संबंधित संवैधानिक प्रावधान व संस्थागत तंत्र

 

 

संवैधानिक प्रावधान

 

समवर्ती सूची

श्रम विषय 7वीं अनुसूची की समवर्ती सूची में शामिल हैइसलिए केंद्र और राज्य दोनों श्रम कानून बना सकते हैं।

उद्देशिका

संविधान की उद्देशिका सामाजिक न्यायगरिमा और समानता पर बल देती हैजो श्रम कानूनों के लिए मार्गदर्शक सिद्धांत हैं।

मौलिक अधिकार

 

अनुच्छेद 16

लोक नियोजन में सभी नागरिकों को समान अवसर।

अनुच्छेद 19(1)(c)

श्रमिकों को यूनियन/संघ बनाने का अधिकार।

अनुच्छेद 23

मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी पर पूर्ण प्रतिबंध।

अनुच्छेद 24

14 वर्ष से कम आयु के बच्चों को खतरनाक उद्योगों में रोजगार से प्रतिबंधित।

राज्य के नीति निदेशक तत्व

अनुच्छेद 39

लैंगिक भेदभाव के बिना समान कार्य के लिए समान वेतन।

अनुच्छेद 41

रोजगारशिक्षा और बेरोजगारीबुढ़ापाबीमारी आदि में सहायता

अनुच्छेद 42

मानवोचित कार्य दशाएं और प्रसूति सहायता।

अनुच्छेद 43

निर्वाह मजदूरी और सम्मानजनक जीवन स्तर  का प्रावधान।

अनुच्छेद 43A

उद्योगों के प्रबंधन में श्रमिकों की भागीदारी को बढ़ावा।

संस्थागत तंत्र

श्रम और रोजगार मंत्रालय

श्रमिकों के हितों की रक्षा और कल्याणकारी नीतियों के निर्माण के लिए जिम्मेदार।

श्रम ब्यूरो

औद्योगिक विवादवेतनरोजगार और कार्य दशाओं से संबंधित डेटा प्रकाशित।

मुख्य श्रम आयुक्त

औद्योगिक विवादों का निपटारा और श्रम कानूनों के कार्यान्वयन को सुनिश्चित करता है।

सामाजिक सुरक्षा संस्थाएं

ESI योजना

बीमारीमातृत्वनिःशक्तता और कार्यस्थल दुर्घटना पर बीमा व चिकित्सा सुविधा।

 

EPFO

सेवानिवृत्ति बचत योजना (PF) का प्रबंधन जिसमें कर्मचारी और नियोक्ता दोनों योगदान करते हैं।




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