जिनगी भर
गुलामी, बढ़-बढ़ के बात
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मानव
समाज में व्यक्ति की वास्तविक पहचान उसके कथनों से नहीं, बल्कि
उसके कर्म और जीवन-व्यवहार से बनती है। लोककथन “जिनगी भर गुलामी, बढ़-बढ़ के बात” इसी शाश्वत सत्य को व्यंग्यात्मक स्पष्टता के साथ सामने
रखता है। इसका आशय यह है कि जो व्यक्ति जीवन में आत्मनिर्भरता, निर्णय-स्वतंत्रता और ठोस उपलब्धियों से वंचित रहा, वही
अनेक बार बोलचाल में बड़े-बड़े दावे करता है और स्वयं को वास्तविकता से बड़ा
दिखाने का प्रयास करता है। यह कहावत केवल व्यक्तिगत अहंकार की आलोचना नहीं करती,
बल्कि उस सामाजिक प्रवृत्ति को भी उजागर करती है जहाँ शब्द कर्मों
से अधिक प्रभावशाली हो जाते हैं।
इस
प्रवृत्ति की जड़ें मनुष्य की आंतरिक असुरक्षा और आत्मसम्मान की कमी में निहित
होती हैं। जब व्यक्ति अपने जीवन की परिस्थितियों को बदलने के लिए अनुशासन, परिश्रम
और धैर्य का मार्ग नहीं अपनाता, तब वह शब्दों के सहारे स्वयं
को संतुष्ट करने लगता है। भाषा उसके लिए उपलब्धियों का विकल्प बन जाती है। यह
स्थिति आत्मविश्वास नहीं, बल्कि हीन-भावना की अभिव्यक्ति
होती है। स्वामी विवेकानंद का कथन है “जो
सच में शक्तिशाली होता है, उसे अपनी शक्ति सिद्ध करने के लिए
शोर नहीं मचाना पड़ता।”
व्यक्तिगत
स्तर पर जन्मी यह मानसिकता धीरे-धीरे सामाजिक संस्कृति का रूप ले लेती है। जब समाज
में भाषा,
प्रतीक और दिखावे को वास्तविक योगदान से अधिक महत्व मिलने लगता है,
तब कर्मशीलता का अवमूल्यन होने लगता है। समाज कार्य-संस्कृति से
हटकर कथन-संस्कृति की ओर बढ़ने लगता है, जहाँ प्रचार,
नेटवर्क और छवि, योग्यता से अधिक निर्णायक हो
जाते हैं। इसका दीर्घकालिक परिणाम सामाजिक अविश्वास और संस्थागत कमजोरी के रूप में
सामने आता है। महात्मा गांधी का यह कथन
“आप जो करते हैं, वही आपका सत्य परिचय है” इसी
सामाजिक विकृति के प्रति चेतावनी देता है।
लोकतांत्रिक
व्यवस्था में भी यही सिद्धांत लागू होता है। जनता और शासन के बीच विश्वास भाषणों
से नहीं,
बल्कि नीतियों के ईमानदार क्रियान्वयन और ठोस परिणामों से बनता है।
जब राजनीतिक विमर्श केवल नारों और वादों तक सीमित रह जाता है, तब शासन धीरे-धीरे लोककल्याण के बजाय लोकप्रबंधन का मंच बन जाता है। डॉ.
भीमराव आंबेडकर ने लोकतंत्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि
सामाजिक नैतिकता की व्यवस्था बताया था। यदि नेतृत्व कर्म की जगह कथन को प्राथमिकता
दे, तो लोकतंत्र औपचारिक रह जाता है, वास्तविक
नहीं।
आर्थिक
जीवन में भी यही विरोधाभास दिखाई देता है। जो समाज उत्पादन, कौशल
और नवाचार के स्थान पर केवल उपभोग और प्रतीकात्मक समृद्धि को महत्व देता है,
वहाँ वास्तविक आर्थिक मजबूती विकसित नहीं हो पाती। ऐसे समाज बाहर से
चमकदार दिखते हैं, पर संकट के समय उनकी संरचनात्मक कमजोरी
उजागर हो जाती है। इसीलिए यह कहावत केवल नैतिक टिप्पणी नहीं, बल्कि उस विकास मॉडल की आलोचना भी है जो परिणाम से अधिक प्रस्तुति पर
आधारित होता है।
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नैतिक
दृष्टि से यह कहावत उत्तरदायित्व के सिद्धांत को रेखांकित करती है। वास्तविक
नैतिकता केवल सही बोलने में नहीं, बल्कि सही करने में निहित होती है। जब
व्यक्ति अपनी सामाजिक भूमिका, पारिवारिक कर्तव्यों और नागरिक
दायित्वों को केवल शब्दों से निभाने का भ्रम पाल लेता है, तब
समाज नैतिक क्षरण की ओर बढ़ता है। भारतीय दर्शन में कहा गया है “विद्या ददाति विनयम्” ज्ञान का अंतिम परिणाम
विनम्र आचरण होना चाहिए। इसीलिए कहा गया है, पहले आचरण,
फिर वचन।
समकालीन
डिजिटल युग में सोशल मीडिया ने व्यक्ति को बिना ठोस उपलब्धि के भी प्रसिद्ध होने
का अवसर प्रदान कर दिया है। छवि-निर्माण वास्तविक कौशल और श्रम से अधिक प्रभावी हो
गया है। परिणामस्वरूप,
कई बार आत्मनिर्भरता और दीर्घकालिक परिश्रम की संस्कृति कमजोर पड़ने
लगती है। यह स्थिति युवाओं के लिए विशेष रूप से चिंताजनक है, क्योंकि यह उन्हें त्वरित प्रसिद्धि के भ्रम में स्थायी विकास से दूर कर
सकती है। यह कहावत इस आधुनिक सामाजिक व्यवहार पर भी मौन किंतु तीक्ष्ण टिप्पणी
करती है।
पद
और अधिकार का उद्देश्य आत्म-प्रदर्शन नहीं, बल्कि जनहित की पूर्ति होना
चाहिए। एक प्रभावी प्रशासन वही है जो नीति-घोषणाओं के साथ-साथ ज़मीनी स्तर पर ठोस
परिणाम भी प्रस्तुत करे। आधुनिक शासन-प्रणाली में इसी कारण परिणाम-आधारित शासन और
जवाबदेही पर बल दिया जा रहा है। जब शासन शब्दों में समृद्ध और कर्मों में हीन हो
जाता है, तब जनविश्वास कमजोर पड़ता है और प्रशासनिक वैधता पर
प्रश्न उठते हैं।
सच्चा
नेता वह होता है जो स्वयं को संस्था से बड़ा नहीं मानता, बल्कि
संस्था को मजबूत बनाने में लगा रहता है। जो नेता केवल वक्तृत्व और प्रदर्शन पर
निर्भर रहता है, वह संगठनात्मक क्षमता विकसित नहीं कर पाता।
इसके विपरीत, जो शांत भाव से निरंतर कार्य करता है, वही स्थायी परिवर्तन लाता है। इतिहास इस बात का साक्षी है कि वास्तविक
नेतृत्व कर्म से पहचाना गया है, प्रचार से नहीं।
हालाँकि, इस
कहावत का आशय यह नहीं है कि हर बड़ा कथन या हर ऊँचा लक्ष्य नकारात्मक ही होता है।
इतिहास साक्षी है कि कई बार परिवर्तन की शुरुआत शब्दों से ही होती है। विचार,
भाषण और संकल्प समाज को दिशा देते हैं, चेतना
जगाते हैं और लोगों को संगठित करते हैं। भगत सिंह, गांधी और
नेल्सन मंडेला जैसे नेताओं ने पहले समाज को शब्दों से झकझोरा, फिर कर्म से मार्ग दिखाया। समस्या तब उत्पन्न होती है जब कथन कर्म में
परिवर्तित न हो सके। अतः समाज को न तो केवल कर्महीन भाषण स्वीकार करने चाहिए और न
ही विचारविहीन कर्म को। वास्तविक प्रगति तब होती है जब शब्द प्रेरणा बनें और कर्म
उसका ठोस रूप। इस दृष्टि से यह कहावत व्यक्ति को मौन रहने के लिए नहीं, बल्कि अपने कथनों को कर्म से प्रमाणित करने की प्रेरणा देती है।
निष्कर्षतः, “जिनगी
भर गुलामी, बढ़-बढ़ के बात” मानव स्वभाव, सामाजिक संरचना और शासन-व्यवस्था तीनों की गहरी समीक्षा प्रस्तुत करती है।
यह कहावत चेतावनी देती है कि जब शब्द कर्मों से आगे निकल जाते हैं, तब व्यक्ति की विश्वसनीयता, समाज की उत्पादकता और
शासन की नैतिकता तीनों कमजोर होने लगती हैं। सच्ची उन्नति भाषणों से नहीं, बल्कि निरंतर श्रम, आत्मनिर्भरता और
उत्तरदायित्वपूर्ण आचरण से प्राप्त होती है। सार्वजनिक जीवन में यह संदेश और भी
महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि वहाँ विश्वास केवल कथनों से
नहीं, बल्कि कर्मों की निरंतरता से निर्मित होता है।


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