BPSC civil service mains writing test
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प्रश्न- राष्ट्रीय
आपातकाल (अनुच्छेद 352) और राष्ट्रपति शासन (अनुच्छेद 356) की संवैधानिक प्रकृति की तुलना करते हुए
इनके प्रभावों का विश्लेषण कीजिए। 8 Marks
उत्तर -भारतीय संविधान में असाधारण
परिस्थितियों से निपटने हेतु आपातकालीन प्रावधान किए गए हैं। इनमें राष्ट्रीय
आपातकाल और राष्ट्रपति शासन दो प्रमुख व्यवस्थाएँ हैं जिनकी परिस्थितियाँ, प्रक्रिया और प्रभाव अलग-अलग हैं।
राष्ट्रीय
आपातकाल (अनुच्छेद 352)
यह तब घोषित किया जाता
है जब भारत या उसके किसी भाग की सुरक्षा को युद्ध, बाह्य
आक्रमण या सशस्त्र विद्रोह से खतरा हो।
इसके लागू होने पर
राज्य सरकारें बनी रहती हैं, लेकिन विधायी व प्रशासनिक शक्तियाँ केंद्र को
स्थानांतरित हो जाती हैं और संसद राज्य विषयों पर कानून बना सकती है।
कोई अधिकतम अवधि नहीं
है। इसे हर छह माह में संसद के विशेष बहुमत से बढ़ाया जा सकता है तथा लोकसभा इसे
वापस ले सकती है। इस दौरान मूल अधिकार प्रभावित हो सकते हैं।
राष्ट्रपति
शासन (अनुच्छेद 356)
- राष्ट्रपति शासन तब लगाया जाता है जब कोई राज्य सरकार संविधान के अनुरूप कार्य करने में विफल हो जाती है।
- राज्य सरकार बर्खास्त हो जाती है और विधानसभा निलंबित या भंग कर दी जाती है। प्रशासन राष्ट्रपति द्वारा राज्यपाल के माध्यम से चलता है।
- अधिकतम अवधि तीन वर्ष है, जिसे संसद के साधारण बहुमत से मंजूरी मिलती है।
- राष्ट्रपति इसे कभी भी समाप्त कर सकते हैं।
जहाँ राष्ट्रीय आपातकाल राष्ट्र की सुरक्षा से जुड़ा है वहीं राष्ट्रपति शासन राज्य-स्तरीय संवैधानिक विफलता से निपटने का साधन। दोनों का प्रयोग लोकतांत्रिक मूल्यों और संवैधानिक मर्यादाओं के अनुरूप होना आवश्यक है।
प्रश्न- भारत में
राजनीतिक वित्तपोषण की वर्तमान स्थिति लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए गंभीर
चुनौतियाँ उत्पन्न कर रही है। इस संदर्भ में राजनीतिक चंदे से जुड़े प्रमुख
मुद्दों तथा सुधार की आवश्यकता पर संक्षिप्त चर्चा कीजिए। 8 अंक
उत्तर- भारत में
राजनीतिक वित्तपोषण लोकतंत्र की गुणवत्ता और निष्पक्षता को प्रत्यक्ष रूप से
प्रभावित करता है। हाल ही में निर्वाचन आयोग द्वारा जारी एक रिपोर्ट से स्पष्ट हुआ
है कि सत्ताधारी दलों को राजनीतिक चंदे का बड़ा हिस्सा प्राप्त हुआ है जो प्रतिस्पर्धी
लोकतंत्र पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हुए गंभीर चुनौतियां उत्पन्न करती है जिसे
निम्न प्रकार समझ सकते हैं-
पारदर्शिता
की कमी और अनामता
- एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (ADR) के अनुसार, 2004-05 से 2022-23 के बीच राष्ट्रीय दलों को बड़ी मात्रा में अज्ञात स्रोतों से चंदा मिला है। इससे यह स्पष्ट नहीं हो पाता कि राजनीतिक दलों को धन कौन और किन उद्देश्यों से दे रहा है।
असमान
अवसर
- उम्मीदवारों के लिए तो चुनावी खर्च की सीमा तय है लेकिन राजनीतिक दलों के कुल चुनाव प्रचार व्यय पर कोई सीमा नहीं है। इससे धन-संपन्न दलों को बढ़त मिलती है और छोटे या नए दलों के लिए प्रतिस्पर्धा कठिन हो जाती है।
कॉर्पोरेट
प्रभाव
- सत्ता एवं कॉर्पोरेट प्रभाव गंभीर चिंता का विषय है। चुनावी बॉण्ड मामले (2024) में सर्वोच्च न्यायालय ने ‘क्विड प्रो क्वो’ को संस्थागत भ्रष्टाचार का उदाहरण बताया, जो नीति-निर्माण की निष्पक्षता को कमजोर करता है।
निष्कर्षतः, पारदर्शी, न्यायसंगत और जवाबदेह राजनीतिक वित्तपोषण
तंत्र ही भारत में लोकतांत्रिक मूल्यों और निष्पक्ष चुनाव प्रक्रिया को सुदृढ़ कर
सकता है जिसके लिए लोक वित्त-पोषण को बढ़ावा, राष्ट्रीय
चुनाव कोष की स्थापना तथा राजनीतिक दलों के चुनाव प्रचार व्यय पर सीमा निर्धारित
करना जैसे उपाए किए जा सकते हैं।
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प्रश्न- केंद्र सरकार की हालिया रिपोर्ट “राज्यों में
पंचायतों को अधिकार और संसाधन हस्तांतरण की स्थिति” के आधार
पर बताएं कि 73वें संविधान
संशोधन के तहत पंचायतों को हस्तांतरित अधिकार और संसाधन उनकी क्षमता और स्वशासन
सुनिश्चित करने में कितने प्रभावी हैं। रिपोर्ट में उठाई गई प्रमुख चुनौतियों और
वित्तीय असमानताओं का भी उल्लेख करें। 38 अंक
उत्तर- 73वें संविधान संशोधन ने भारत में ग्राम स्तर पर लोकतांत्रिक
स्वशासन को सुदृढ़ करने हेतु पंचायतों को अधिकार और संसाधन हस्तांतरित करने का
प्रावधान किया। यह हस्तांतरण केवल अधिकार देने तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायती संस्थाओं की प्रशासनिक, वित्तीय और
क्षमता संबंधी मजबूती सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखता है।
इसी संदर्भ में केंद्र सरकार की हालिया रिपोर्ट “राज्यों में
पंचायतों को अधिकार और संसाधन हस्तांतरण की स्थिति” पंचायत सशक्तिकरण की वास्तविक
प्रगति को दर्शाती है जिसके मुख्य तथ्यों को निम्न प्रकार देख सकते हैं
संसाधन क्षमता एवं स्वशासन सुधार
- 2013-14 में पंचायतों को औसतन 39.9% अधिकार व संसाधन हस्तांतरित थे, जो 2021-22 में बढ़कर 43.9% हो गए। इसमें कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश अग्रणी राज्य हैं, जबकि कुछ केंद्रशासित प्रदेशों में हस्तांतरण न्यूनतम है। इससे राज्यों के बीच स्पष्ट असमानता सामने आती है।
- रिपोर्ट के अनुसार राष्ट्रीय ग्राम स्वराज अभियान, बुनियादी ढांचे का विकास, स्टाफिंग और डिजिटलीकरण से पंचायतों की क्षमता 44% से बढ़कर 54.6% हो गई जिससे उनके स्वशासन में सुधार हुआ।
चुनौतियाँ
- पंचायत हस्तांतरण सूचकांक के छह आयाम कार्य, वित्त, पदाधिकारी, क्षमता निर्माण आदि में सुधार तो हुआ है फिर भी कई चुनौतियाँ बनी हैं। उदाहरण के लिए, आरक्षित सीटों का रोटेशन नेतृत्व की निरंतरता को प्रभावित करता है, जबकि चुनाव प्रबंधन में राज्य सरकार का हस्तक्षेप देरी और असमानता उत्पन्न करता है।
- 11वीं अनुसूची के 29 विषयों का आंशिक हस्तांतरण, सीमित वित्तीय स्वायत्तता और गैर-केंद्रीकृत संस्थाओं जैसे जल बोर्ड तथा विकास प्राधिकरण के हस्तक्षेप ने पंचायतों की वास्तविक क्षमता को सीमित किया है।
वित्तीय असमानताएँ
- स्व-वित्तपोषण क्षमता अत्यंत सीमित है; पंचायतें केवल 1% कर राजस्व अर्जित कर पाती हैं और लगभग 80% केन्द्र तथा 15% राज्य अनुदान पर निर्भर हैं। अंतर-राज्यीय असमानताएँ भी स्पष्ट हैं, जैसे बिहार में पंचायत राजस्व 0.001% जबकि ओडिशा में 0.56% जीएसडीपी के बराबर है।
- इससे स्पष्ट होता है कि पंचायतों का अधिकार केवल कागजों तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें वित्तीय और प्रशासनिक सशक्तिकरण की आवश्यकता है।
कुल मिलाकर, रिपोर्ट दर्शाती है कि पंचायतों को अधिकार और संसाधन
हस्तांतरण में प्रगति हुई है और स्वशासन का स्तर बढ़ा है। फिर भी वित्तीय
स्वायत्तता, प्रशिक्षण, जवाबदेही और
समान हस्तांतरण सुनिश्चित करना आवश्यक है। यह कदम केवल पंचायतों को सशक्त बनाने के
लिए नहीं, बल्कि स्थानीय स्तर पर लोकतंत्र की गुणवत्ता और
नागरिकों के जीवन में सुधार सुनिश्चित करने के लिए भी महत्वपूर्ण है।

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