“तरुवर फल नहीं खात है, सरवर पियत न पान"
भारतीय परंपरा में जीवन को केवल
व्यक्तिगत उपलब्धियों या भौतिक संग्रह का माध्यम नहीं माना गया है, बल्कि
उसे सामाजिक उत्तरदायित्व और परोपकार की चेतना से जोड़ा गया है। इसी जीवन-दृष्टि
को संत कवि रहीम ने अपने प्रसिद्ध दोहे में अत्यंत सरल किंतु गहन शब्दों में
व्यक्त किया है-
“तरुवर फल नहीं खात
है, सरवर पियत न पान।”
इस पंक्ति में वृक्ष और सरोवर के
माध्यम से मानव जीवन के आदर्श आचरण का ऐसा रूपक प्रस्तुत किया गया है, जो
आज के आत्मकेंद्रित युग में और भी अधिक प्रासंगिक हो उठता है। रहीम यह स्पष्ट करते
हैं कि जो जितना अधिक समर्थ होता है, दूसरों के लिए उसकी
जिम्मेदारी उतनी ही अधिक होती है ।
यह दोहा एक गहन सामाजिक दर्शन है जो मनुष्य
को स्मरण कराता है कि प्रकृति स्वयं परोपकार का सबसे बड़ा उदाहरण है। वृक्ष अपने
फल स्वयं नहीं खाते और सरोवर अपना जल स्वयं नहीं पीते बल्कि उनका अस्तित्व ही
दूसरों की भूख और प्यास मिटाने के लिए है। यही प्रकृति का मौन संदेश है और यही
मानव समाज के लिए आदर्श आचरण का आधार भी। इस प्रकार यह दोहा एक समग्र सामाजिक
दर्शन प्रस्तुत करता है,
जिसमें त्याग, सेवा और करुणा को जीवन का
लक्ष्य माना गया है। भारतीय चिंतन में “वसुधैव कुटुम्बकम्” की भावना इसी सिद्धांत
का विस्तार है।
दार्शनिक दृष्टि से यह विचार भारतीय
चिंतन की उस परंपरा से जुड़ा है, जहाँ “इदं न मम” अर्थात
यह मेरा नहीं है का भाव केंद्रीय रहा है। उपनिषदों में कहा गया है कि भोग नहीं,
त्याग ही जीवन का मार्ग है। रहीम का यह दोहा उसी दर्शन का लोकभाषा
में सशक्त रूपांतरण है। इसमें स्पष्ट संदेश है कि संपत्ति, ज्ञान
और शक्ति का वास्तविक मूल्य तभी है, जब वे समाज के हित में
प्रयुक्त हों। अन्यथा वे केवल अहंकार और असमानता को जन्म देते हैं।
सामाजिक स्तर पर यह दोहा समाज की
संरचना को नैतिक आधार प्रदान करता है। यदि समाज के सक्षम वर्ग धनी, शिक्षित
और शक्तिशाली अपने संसाधनों को केवल निजी सुख में लगाएँ, तो
असमानता और सामाजिक विघटन अनिवार्य है। इसके विपरीत, जब वही
वर्ग वृक्ष और सरोवर की भांति समाज को लौटाता है, तब सामाजिक
सौहार्द और सामाजिक संतुलन स्थापित होता है। महात्मा गांधी ने इस संदर्भ में ट्रस्टीशिप
का सिद्धांत प्रस्तुत किया था। उनके अनुसार, संपत्ति का
स्वामी व्यक्ति नहीं, समाज होता है, व्यक्ति
केवल उसका संरक्षक होता है। गांधी का मानना था कि यदि धनवान वर्ग स्वयं को समाज का
ट्रस्टी माने, तो आर्थिक असमानता बिना किसी हिंसक संघर्ष के
समाप्त हो सकती है।
आधुनिक पूँजीवादी व्यवस्था उपभोग और
संचय को सफलता का मापदंड बनाती है, जिससे संसाधनों का असमान
वितरण होता है। अमर्त्य सेन का क्षमता दृष्टिकोण इसी समस्या का समाधान प्रस्तुत
करता है। विकास का उद्देश्य केवल आय बढ़ाना नहीं, बल्कि मानव
क्षमताओं का विस्तार होना चाहिए। अब यह स्वीकार किया जा रहा है कि केवल जीडीपी
आधारित विकास मॉडल पर्याप्त नहीं है। वृक्ष और सरोवर की तरह अर्थव्यवस्था भी तभी
टिकाऊ बन सकती है, जब वह समाज के कमजोर वर्गों को पोषित करे।
समावेशी विकास और सामाजिक पूँजी की अवधारणाएँ इसी सोच का विस्तार हैं।
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प्रशासनिक और शासन-व्यवस्था में एक
सिविल सेवक का पद वृक्ष की भाँति होता है और उसकी छाया, फल
और संरक्षण समाज के लिए होते हैं, स्वयं के लिए नहीं। यदि
सत्ता का उपयोग निजी स्वार्थ के लिए किया जाए, तो वह सरोवर
के सूख जाने जैसा है। यही कारण है कि भारतीय संविधान में लोकसेवकों के लिए
जवाबदेही, पारदर्शिता और सेवा-भाव को केंद्रीय मूल्य माना
गया है। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम ने कहा था “सत्ता का वास्तविक उद्देश्य समाज के
अंतिम व्यक्ति के जीवन को बेहतर बनाना है।” प्रशासनिक नैतिकता का यही मूल है कि पद
और अधिकार स्वयं के लिए नहीं, जनकल्याण के लिए हों।
आधुनिक समय में उपभोगवाद जीवन का
प्रमुख मूल्य बन चुका है जहां व्यक्ति सफलता को संग्रह, प्रदर्शन
और व्यक्तिगत सुख से जोड़कर देखता है । सामाजिक संवेदनशीलता और सामूहिक
उत्तरदायित्व कमजोर पड़ते जा रहे हैं और प्रकृति के अंधाधुंध दोहन से जलवायु संकट,
वनों की कटाई, जल-संकट बढ़ रहे हैं तो ऐसे समय
में वृक्ष और सरोवर का उदाहरण यह याद दिलाता है प्रकृति स्वयं साझेदारी और त्याग के
सिद्धांत पर कार्य करती है। यदि मानव प्रकृति से केवल उपभोग करता रहा तो जीवन-चक्र
टूट जाएगा। इसलिए सतत विकास की अवधारणा इसी दोहे के दर्शन से मेल खाती है।
इतिहास में परोपकार की भावना ने ही
महान व्यक्तित्वों को अमर बनाया है। सम्राट अशोक का कलिंग युद्ध के बाद हृदय
परिवर्तन इसका सशक्त उदाहरण है जब सत्ता और सामर्थ्य होने के बावजूद उन्होंने
अहिंसा और लोककल्याण का मार्ग चुना। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने ज्ञान और संघर्ष को
वंचित समाज के उत्थान के लिए समर्पित किया। मदर टेरेसा ने सेवा को जीवन का धर्म
बनाया। ये सभी वृक्ष और सरोवर की तरह थे स्वयं नहीं जिए, बल्कि
दूसरों को जीवन दिया।
अध्ययन बताते हैं कि दूसरों की
सहायता करने से व्यक्ति में खुशी, आत्म-संतुलन और उद्देश्य-बोध बढ़ता है।
यह दर्शाता है कि परोपकार केवल नैतिक दायित्व नहीं, बल्कि
मानसिक स्वास्थ्य का भी आधार है। हालाँकि, यह समझना भी
आवश्यक है कि परोपकार आत्म-विनाश नहीं है। वृक्ष स्वयं जीवित रहता है तभी फल देता
है, और सरोवर तभी जल देता है जब उसमें जल संरक्षित हो। इसका
अर्थ यह है कि आत्म-संरक्षण और परोपकार में संतुलन आवश्यक है। रहीम का संदेश त्याग
का नहीं, उपयोग का नैतिक विवेक सिखाता है।
निष्कर्षत: “तरुवर फल नहीं खात है, सरवर
पियत न पान” केवल एक दोहा नहीं, बल्कि जीवन-दर्शन है। यह
हमें सिखाता है कि मानव जीवन की सार्थकता संचय में नहीं, योगदान
में है। जो व्यक्ति, समाज या राष्ट्र वृक्ष और सरोवर की
भांति परोपकारी बनता है, वही स्थायी सम्मान और प्रगति
प्राप्त करता है। अंततः, मनुष्य की महानता इस बात में नहीं
कि उसके पास कितना है, बल्कि इस बात में है कि वह दूसरों के
लिए कितना बन सका।


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