“बुद्धि का सही संकेत ज्ञान नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता है”
मानव
सभ्यता का इतिहास केवल ज्ञान अर्जन की कहानी नहीं है,
बल्कि उस ज्ञान को नई दिशाओं में सोचने और प्रयोग करने की यात्रा भी
है। यह कथन इसी सत्य को सटीक रूप में व्यक्त करता है कि बुद्धि का सही संकेत ज्ञान
नहीं, बल्कि कल्पनाशीलता है। ज्ञान व्यक्ति को यह बताता है कि
क्या है, किंतु कल्पनाशीलता उसे यह सोचने की क्षमता देती है कि
क्या हो सकता है। जहाँ ज्ञान अतीत और वर्तमान से जुड़ा होता है, वहीं कल्पनाशीलता भविष्य की ओर ले जाती है। इसलिए वास्तविक बुद्धि का मूल्यांकन
केवल स्मरण-शक्ति या सूचनाओं के भंडार से नहीं, बल्कि नए समाधान गढ़ने की क्षमता से होना चाहिए।
रविन्द्र
नाथ टैगोर ने कहा था “सभ्यता तब आगे बढ़ती है, जब मनुष्य वर्तमान से असंतुष्ट
होकर बेहतर भविष्य की कल्पना करता है।“
महान
दार्शनिक प्लेटो और अरस्तू ने भी ज्ञान को आवश्यक माना लेकिन उन्होंने यह भी स्वीकार
किया कि केवल ज्ञात तथ्यों पर टिके रहना बौद्धिक जड़ता को जन्म देता है। भारतीय दर्शन
में भी प्रज्ञा को केवल विद्या नहीं बल्कि विवेक और सृजनात्मक अंतर्दृष्टि के रूप में
देखा गया है। उपनिषदों में कहा गया है कि ज्ञान तभी सार्थक है जब वह व्यक्ति को आत्मचिंतन
और नवीन दृष्टि प्रदान करे। इस प्रकार, कल्पनाशीलता ज्ञान
को गति देने वाला तत्व बन जाती है, जबकि ज्ञान उसे दिशा देता
है।
आधुनिक
विज्ञान भी इसी सिद्धांत की पुष्टि करता है। अल्बर्ट आइंस्टीन ने कहा था- “ज्ञान से अधिक महत्वपूर्ण कल्पना है, क्योंकि ज्ञान सीमित
है, जबकि कल्पना पूरे विश्व को अपने में समाहित किए हुए है।”
उनके सिद्धांत केवल गणनाओं का परिणाम नहीं बल्कि उन कल्पनात्मक प्रयोगों
का प्रतिफल थे जिनमें उन्होंने प्रकाश की गति पर सवार होकर ब्रह्मांड को देखने की कल्पना
की। इससे स्पष्ट होता है कि महान खोजें पहले मन में जन्म लेती हैं, प्रयोगशालाओं में बाद में सिद्ध होती हैं।
इतिहास
में जितनी भी बड़ी सामाजिक, वैज्ञानिक और सांस्कृतिक क्रांतियाँ हुईं,
वे पहले कल्पना के स्तर पर संभव हुईं। उड़ान की कल्पना किए बिना विमान
नहीं बनता, लोकतंत्र की कल्पना किए बिना साम्राज्य नहीं टूटते
और समानता की कल्पना किए बिना सामाजिक सुधार नहीं होते। रवींद्रनाथ ठाकुर ने कहा था
कि सभ्यता का विकास तभी संभव है जब मनुष्य परंपरा के साथ-साथ
कल्पना को भी महत्व दे। यही कारण है कि साहित्य, कला और दर्शन
समाज की बौद्धिक उन्नति में केंद्रीय भूमिका निभाते हैं।
यदि
शिक्षा केवल तथ्यों के रटने तक सीमित रह जाए, तो वह दक्ष नागरिक
तो बना सकती है, पर नवाचारी समाज नहीं। आज जब विश्व कृत्रिम बुद्धिमत्ता,
जलवायु परिवर्तन और जैव-प्रौद्योगिकी जैसी जटिल
चुनौतियों से जूझ रहा है, तब समाधान केवल पुराने ज्ञान से नहीं,
बल्कि रचनात्मक सोच से निकलेंगे। इसी कारण नई शिक्षा नीति में तार्किकता,
स्पष्ट ज्ञान और नवचार को महत्व दिया गया है। स्वामी विवेकानंद ने
कहा था कि शिक्षा वह है जो मनुष्य के भीतर निहित पूर्णता को प्रकट करे, न कि केवल सूचनाओं का बोझ बढ़ाए।
किसी
व्यक्ति में कल्पनाशीलता ही वह तत्व है जो व्यक्ति को मानसिक लचीलापन और अनुकूलन
क्षमता प्रदान करती है। इसकी सहायता से प्रत्येक व्यक्ति विपरित परिस्थितियों में
भी नए अर्थ और नए रास्ते खोज सकता है, संकटों में भी आगे
बढ़ सकता है। इस प्रकार कल्पनाशीलता केवल बौद्धिक नहीं, बल्कि
मानसिक स्वास्थ्य और जीवन-संतुलन से भी जुड़ी हुई है।
आर्थिक
विकास और उद्यमिता भी कल्पनाशीलता पर ही निर्भर करती है। स्टार्टअप संस्कृति,
नवाचार और डिज़ाइन-थिंकिंग इसी बात के उदाहरण हैं
कि आज की अर्थव्यवस्था में केवल तकनीकी ज्ञान पर्याप्त नहीं, बल्कि समस्याओं को नए दृष्टिकोण से देखने की क्षमता अधिक महत्वपूर्ण हो गई
है। सिंगापुर, जापान, उत्तर कोरिया,
यूरोपीयन देशों आदि ने नवाचार को प्रोत्साहित किया वे वैश्विक प्रतिस्पर्धा
में आगे निकले। इससे स्पष्ट है कि कल्पनाशीलता अब केवल सांस्कृतिक गुण नहीं,
बल्कि आर्थिक शक्ति का स्रोत भी बन चुकी है।
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समाज
में सुधार तब तक संभव नहीं होता जब तक लोग वैकल्पिक व्यवस्था की कल्पना न कर सकें।
जाति-उन्मूलन, महिला अधिकार
और लोकतांत्रिक भागीदारी पहले कल्पना के स्तर पर संभव हुए, फिर
सामाजिक आंदोलन बने। डॉ. भीमराव आंबेडकर ने केवल कानून नहीं बनाए,
बल्कि एक ऐसे समाज की कल्पना की जहाँ गरिमा और समानता सार्वभौमिक हों।
बिना इस नैतिक कल्पना के सामाजिक न्याय की अवधारणा अधूरी रह जाती। इसीलिए उन्होंने
सामाजिक लोकतंत्र को राजनीतिक लोकतंत्र से भी अधिक आवश्यक माना।
प्रशासनिक
और नीति-निर्माण के क्षेत्र में भी देखे तो स्मार्ट
सिटी, डिजिटल गवर्नेंस और हरित ऊर्जा जैसे कार्यक्रम केवल तकनीकी
नहीं, बल्कि नीतिगत कल्पनाशीलता के परिणाम हैं। सुशासन केवल नियमों
के पालन से नहीं बल्कि जमीनी समस्याओं के नए नए समाधान खोजने से आता है। एक सफल प्रशासक
वही होता है जो नियमों के भीतर रहकर भी नवाचारी समाधान खोज सके और बेहतर सुविधाएं उपलबध
करा सके। इस अर्थ में कल्पनाशीलता प्रशासन की कार्यक्षमता बढ़ाने वाला तत्व बन जाती
है।
हालाँकि,
यह भी ध्यान रखना आवश्यक है कि कल्पनाशीलता ज्ञान से अलग होकर नहीं चल
सकती। कल्पना यदि तथ्यों और अनुभव से कटी हो तो वह यथार्थ से दूर कल्पनालोक में भटक
सकती है। इसलिए ज्ञान और कल्पनाशीलता को परस्पर विरोधी नहीं बल्कि पूरक तत्वों के रूप
में देखा जाना चाहिए। ज्ञान दिशा देता है और कल्पनाशीलता गति और दोनों के संतुलन से
ही सृजनात्मक बुद्धि का विकास होता है। यही संतुलन वैज्ञानिक नवाचार, सामाजिक सुधार और नीतिगत प्रयोगों की सफलता की कुंजी है।
समकालीन
वैश्विक चुनौतियाँ इस संतुलित बुद्धि की आवश्यकता को और स्पष्ट करती हैं। जलवायु परिवर्तन
से निपटने के लिए केवल पर्यावरणीय आँकड़े पर्याप्त नहीं,
बल्कि जीवन-शैली में बदलाव की कल्पना भी आवश्यक
है। महामारी के बाद की दुनिया में स्वास्थ्य, शिक्षा और कार्य-संस्कृति के नए मॉडल गढ़ने होंगे। इन समस्याओं का समाधान पुराने ढाँचों से
नहीं, बल्कि नवाचार और कल्पनाशील नीतियों से संभव होगा।
निष्कर्षतः,
यह कथन गहन सत्य को उजागर करता है कि ज्ञान बुद्धि की आधारशिला है,
पर उसकी ऊँचाई कल्पनाशीलता से तय होती है। ज्ञान हमें यह सिखाता है कि
संसार कैसा है, जबकि कल्पनाशीलता हमें यह सोचने की शक्ति देती
है कि संसार कैसा होना चाहिए। मानव प्रगति का इतिहास इसी सृजनात्मक असंतोष की कहानी
है, जहाँ मनुष्य वर्तमान से संतुष्ट न होकर बेहतर भविष्य की कल्पना
करता रहा है। इसलिए वास्तविक बुद्धि वही है जो ज्ञान को केवल संग्रहित न करे,
बल्कि उसे नए विचारों, नई नीतियों और नई संभावनाओं
में रूपांतरित कर सके जो व्यक्ति को नवाचारी, समाज को प्रगतिशील
और राष्ट्र को भविष्य के लिए सक्षम बनाती है।


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