1.प्रश्न-राज्य विभाजन के बाद बिहार में खनिज संसाधनों की प्रकृति का विश्लेषण कीजिए। साथ ही अवैध खनन रोकने तथा पर्यावरण संरक्षण हेतु किए जा रहे प्रयासों का मूल्यांकन कीजिए। 8 अंक
उत्तर- खनिज संरचना की दृष्टि से बिहार में स्थानीय और संकेंद्रित भंडार
पाए जाते हैं जो प्रायः चट्टानी संरचनाओं से जुड़े हैं। वर्ष 2000 में विभाजन के बाद बिहार गौण खनिज जैसे बालू, पत्थर,
मिट्टी और चूना पत्थर का क्षेत्र बन गया वहीं धात्विक खनिजों में
विपन्न हो गया।
हांलाकि हाल के वर्षों में कुछ धात्विक एवं अधात्विक प्रकृति के खनिज जैसे जमुई
(मैग्नेटाइट), रोहतास (पोटाश व चूना पत्थर), गया और औरंगाबाद
(निकेल, क्रोमियम, PGE) और मुंगेर
(बॉक्साइट) जैसे ब्लॉक तो जमुई में सोना अयस्क को चिन्हित किया गया है जिससे खनन विविधीकरण
की संभावना बनी है।
खनन राजस्व में बिहार में गौण खनिज राजस्व का प्रमुख स्रोत रहा है लेकिन अवैध खनन और उससे
होनेवाले पर्यावरणीय नुकसान चिंता का विषय रहा है जिस पर नियंत्रण हेतु पिछले कुछ
वर्षों में अनेक उपाय किए गए हैं जैसे-
- ‘बालू मित्र ऐप’ से ऑनलाइन बिक्री, समान दर और पारदर्शिता सुनिश्चित।
- खनिज (संशोधन) नियमावली 2021 के तहत कड़े दंड, भारी जुर्माना और वाहन जब्ती प्रावधान।
- ई-चालान, जियो-फेंसिंग, वाहन ट्रैकिंग, टास्क फोर्स से निगरानी सुदृढ़ हुई।
- पारदर्शिता और जवाबदेही हेतु ई-नीलामी ।
- 12 जिलों में राज्य खनन निगम द्वारा पर्यावरणीय मानकों के अनुरूप बालूघाट संचालन।
- जिला खनिज फाउंडेशन राशि का उपयोग खनन क्षेत्रों के कल्याण में किए जाने के
साथ जिला सर्वेक्षण रिपोर्ट, वैज्ञानिक आकलन और पर्यावरणीय स्वीकृति को अनिवार्य किया
गया।
स्पष्ट है कि सीमित खनिज संसाधनों के बावजूद बिहार ने अवैध खनन रोकने और राजस्व
बढ़ाने में सफलता पाई है। यदि पर्यावरणीय संतुलन के साथ वैध खनन और खनिज विविधीकरण
को आगे बढ़ाया जाए तो खनन क्षेत्र राज्य के विकास में अधिक योगदान दे सकता है।
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2.प्रश्न–बिहार में कृषि संरचना और भूमि सुधार की असफलता ने ग्रामीण गरीबी
को किस प्रकार बनाए रखा है? स्पष्ट कीजिए। 8 अंक
उत्तर-कृषि प्रधान राज्य होने के बावजूद बिहार में ग्रामीण गरीबी व्यापक
रूप से विद्यमान है जिसका प्रमुख कारण प्रचलित कृषि संरचना, भूमि सुधार
और कृषि विकास कार्यक्रमों का प्रभावी क्रियान्वयन न हो पाना है।
कृषि संरचना
- भूमि का असमान वितरण और छोटी जोत कृषि उत्पादकता को सीमित करता है।
- अनेक किसान सीमांत हैं, जिनके पास निवेश और तकनीक अपनाने की क्षमता नहीं होती।
- सरकारी ऋण, सिंचाई और कृषि सहायता योजनाओं का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुँच पाता।
- बाढ़ और सूखा जैसी प्राकृतिक आपदाएँ भी कृषि को बार-बार क्षति पहुँचाती हैं जिससे किसानों की आय अस्थिर रहती है और वे कर्ज के जाल में फँसते जाते हैं।
- भूमि सुधार के प्रयास, चकबंदी, हदबंदी भी अपेक्षित परिणाम
नहीं दे सके। खेती करनेवाले किसान के पास भूमि स्वामित्व नहीं होना पुरानी समस्या
रही है। इससे कृषि में दीर्घकालिक निवेश और सुधार की प्रवृत्ति विकसित नहीं हो
पाती।
इस प्रकार कृषि की संरचनागत कमियों से पर्याप्त आय न मिलने के कारण ग्रामीण
परिवार गरीबी से बाहर नहीं निकल पाते। कृषि और भूमि स्वामित्व की कमी से ग्रामीण
बेरोजगारी और वैकल्पिक रोजगार की कमी से पलायन बढ़ता है जो ग्रामीण गरीबी को और
गहरा करता है।
अत: बिहार में गरीबी उन्मूलन के लिए कृषि सुधार और भूमि संबंधी न्याय अत्यंत
आवश्यक हैं। जब तक किसान की आय स्थिर और सुरक्षित नहीं होगी तब तक ग्रामीण गरीबी
में ठोस कमी संभव नहीं है।
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3.प्रश्न-बिहार में प्रस्तावित ड्राई डॉक परियोजना को राज्य के औद्योगिक और
लॉजिस्टिक्स परिदृश्य में परिवर्तनकारी कदम क्यों माना जा रहा है? विश्लेषण
कीजिए। 8 अंक
उत्तर-जल परिवहन के विकास में जहाजों की मरम्मत और रखरखाव की सुविधा
निर्णायक भूमिका निभाती है। इस संदर्भ में पटना के दुजरा क्षेत्र में प्रस्तावित
ड्राई डॉक बिहार के लिए तकनीकी और आर्थिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अधोसंरचना है।
ड्राई डॉक वह सुविधा है जहाँ जहाजों को पानी से बाहर निकालकर सूखी भूमि पर
मरम्मत और निरीक्षण किया जाता है। बिहार में ऐसी सुविधा के अभाव में जहाजों को
अन्य राज्यों में ले जाना पड़ता था जिससे समय और लागत दोनों बढ़ते थे अब इसके निर्माण
से निम्न लाभ होंगे
- जलपोतों की मरम्मत स्थानीय स्तर पर संभव होगी।
- जलपोत की संचालन लागत घटेगी।
- जहाजों की उपलब्धता बढ़ेगी जिससे मालवाहन की नियमितता सुनिश्चित होगी।
लॉजिस्टिक्स के दृष्टिकोण से यह परियोजना जलमार्ग आधारित परिवहन को
व्यवहारिक विकल्प बनाती है। मालवाहक जहाजों की संख्या बढ़ने से सड़क परिवहन पर
दबाव घटेगा, पर्यावरण अनुकूल परिवहन और भारी माल का परिवहन अधिक सस्ते तरीके से संभव
होगा।
इसी क्रम में औद्योगिक दृष्टि से पटना और आस-पास के क्षेत्रों में जहाज
मरम्मत, उपकरण आपूर्ति, और सहायक सेवाओं से जुड़ी इकाइयों के
विकास की संभावना बनेगी जिससे औद्योगिक गतिविधियाँ बढ़ेंगी। इस प्रकार यह परियोजना
केवल परिवहन नहीं बल्कि जल आधारित लॉजिस्टिक्स इकोसिस्टम के निर्माण की दिशा में
कदम है।
निष्कर्षत: ड्राई डॉक की स्थापना बिहार को केवल जलमार्ग उपयोगकर्ता से आगे
बढ़ाकर जल परिवहन आधारित औद्योगिक गतिविधियों का सहभागी बनाती है जो बिहार के
आर्थिक ढांचे में संरचनात्मक परिवर्तन लाने की क्षमता रखती है।

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