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Jan 15, 2026

“जनम के संघाती सब केहु ह, लेकिन करम के नाहीं

 

“जनम के संघाती सब केहु ह, लेकिन करम के नाहीं



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मानव जीवन सामाजिक संबंधों, सहानुभूति और सहयोग से निर्मित होता है, किंतु अंततः प्रत्येक व्यक्ति को अपने कर्मों का उत्तरदायित्व स्वयं ही वहन करना पड़ता है। लोककथन “जनम के संघाती सब केहु ह, लेकिन करम के नाहीं” इसी जीवन-सत्य को सरल किंतु अत्यंत गहन रूप में व्यक्त करता है। जन्म के साथ अनेक संबंध, सहचर और समर्थन मिल जाते हैं, परंतु जीवन की निर्णायक घड़ियों में कर्म का भार व्यक्ति को अकेले ही उठाना होता है। यह कहावत भाग्यवाद से हटकर पुरुषार्थ की अनिवार्यता को स्थापित करती है और मानव को आत्मनिर्भरता की दिशा में उन्मुख करती है।

 

दार्शनिक दृष्टि से यह कथन भारतीय चिंतन की उस परंपरा से जुड़ा है, जहाँ कर्म को जीवन का केंद्रीय सिद्धांत माना गया है। उपनिषद, गीता और बौद्ध दर्शन सभी में यह स्वीकार किया गया है कि मनुष्य अपने भाग्य का निर्माता स्वयं है। श्रीकृष्ण का उपदेश  “कर्मण्येवाधिकारस्ते” यह स्पष्ट करता है कि अधिकार कर्म पर है, परिणाम पर नहीं। जीवन में कोई भी व्यक्ति दूसरे के स्थान पर कर्म नहीं कर सकता। हां, सहायता मिल सकती है, मार्गदर्शन मिल सकता है पर निर्णय और प्रयास स्वयं को ही करना होता है। इस अर्थ में यह कहावत जीवन की नैतिक स्वायत्तता का घोषणापत्र है।

 

सामाजिक रिश्‍ते भी एक सीमा तक होते हैं क्‍योंकि परिवार, मित्र और समाज भावनात्मक संबल प्रदान कर सकते हैं, पर जीवन के संघर्षों का समाधान व्यक्ति को स्वयं ही करना पड़ता है। परीक्षा की तैयारी, रोजगार की खोज, नैतिक निर्णय, और कठिन परिस्थितियों में सही विकल्प चुनना आदि कई अवसर होते हैं जब अंतिम निर्णय व्यक्ति का ही होता है। इसीलिए समाज में वही व्यक्ति आगे बढ़ता है जो परिस्थितियों को दोष देने के बजाय स्वयं को बदलने का साहस रखता है।

 

कई बार व्यक्ति असफलताओं के लिए किस्मत, समाज या व्यवस्था को दोषी ठहराता है और कर्म से पलायन कर जाता है। किंतु यह कहावत स्पष्ट करता है कि जन्म से मिले संबंध सहायक हो सकते हैं, पर कर्म का विकल्प कोई नहीं बन सकता। डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम का कथन यहाँ प्रासंगिक है “श्रेष्ठता कोई संयोग नहीं, बल्कि निरंतर प्रयास का परिणाम होती है।” यह प्रयास व्यक्ति को स्वयं ही करना होता है।

 

जो व्यक्ति यह मानता है कि उसका भविष्य उसके अपने निर्णयों और प्रयासों से निर्धारित होता है, वह अधिक आत्मविश्वासी, लचीला और संघर्षशील बनता है। इसके विपरीत, जो व्यक्ति बाहरी कारकों पर निर्भर रहता है, वह असफलता की स्थिति में टूट जाता है। यह कहावत व्यक्ति को मानसिक रूप से भी आत्मनिर्भर बनने की प्रेरणा देती है।

 

आर्थिक जीवन में यह सत्य और अधिक स्पष्ट दिखाई देता है। परिवारिक पृष्ठभूमि कुछ अवसर अवश्य प्रदान कर सकती है, पर दीर्घकालिक सफलता केवल योग्यता, परिश्रम और अनुकूलन क्षमता से ही प्राप्त होती है। आधुनिक अर्थव्यवस्था में जहाँ प्रतिस्पर्धा तीव्र है और तकनीकी परिवर्तन तेज़ हैं, वहाँ आत्मनिर्भर कौशल के बिना कोई भी स्थायी रूप से टिक नहीं सकता। इसीलिए आज कौशल विकास और कुछ न कुछ सीखते रहने पर पर इतना ज़ोर दिया जा रहा है, क्योंकि कर्म का उत्तरदायित्व व्यक्ति से हटाकर किसी और पर नहीं डाला जा सकता।

 

 




एक लोकतांत्रिक राजनीतिक व्‍यवस्‍था में अधिकारों के साथ कर्तव्यों का संतुलन आवश्यक है। यदि नागरिक केवल सुविधाओं और सहायता की अपेक्षा रखें, पर स्वयं अपने कर्तव्यों के प्रति सजग न हों, तो शासन-व्यवस्था कमजोर हो जाती है। इसी प्रकार लोकसेवकों के लिए भी पद, संसाधन और संस्थाएँ सहयोग कर सकती हैं, पर निर्णय और नैतिक साहस स्वयं अधिकारी को ही दिखाना पड़ता है।

 

सच्चा नेता वह नहीं होता जो केवल समर्थन पर निर्भर करे, बल्कि वह होता है जो कठिन निर्णय लेने की जिम्मेदारी स्वयं उठाए। इतिहास में जिन नेताओं ने परिस्थितियों का सामना व्यक्तिगत साहस से किया, वही परिवर्तन के वाहक बने। परिस्थितियाँ समान थीं, संसाधन सीमित थे, पर कर्म की दृढ़ता ने ही उन्हें विशिष्ट बनाया।

 

हालाँकि, इस कहावत का अर्थ यह नहीं है कि समाज और सहयोग का कोई महत्व नहीं। मानव स्वभावतः सामाजिक प्राणी है और सहयोग उसके विकास का आधार है। किंतु यह सहयोग कर्म का विकल्प नहीं बन सकता। सहयोग मार्ग को सरल बना सकता है, पर उस मार्ग पर चलना स्वयं व्यक्ति को ही होता है। आज जब अवसरों की अधिकता के साथ प्रतिस्पर्धा बढ़ी है। ऐसे में आत्मनिर्भरता, कौशल और मानसिक दृढ़ता ही सफलता की कुंजी हैं, केवल सिफारिश या सामाजिक पृष्ठभूमि लंबे समय तक सहारा नहीं दे सकती। यह कहावत यह यथार्थ स्वीकार करने के लिए प्रेरित करती है कि जीवन की दौड़ अंततः स्वयं के प्रयास से ही जीती जाती है।

 

निष्कर्षतः, “जनम के संघाती सब केहु ह, लेकिन करम के नाहीं” जीवन का वह मूल सत्य प्रस्तुत करती है जो व्यक्ति को आत्मनिर्भर, उत्तरदायी और कर्मनिष्ठ बनने की प्रेरणा देता है। यह कहावत संबंधों के महत्व को नकारती नहीं, बल्कि यह स्पष्ट करती है कि अंतिम उत्तरदायित्व व्यक्ति का ही होता है। समाज सहारा दे सकता है, प्रेरणा दे सकता है, पर जीवन की दिशा कर्म ही तय करता है। यही सिद्धांत व्यक्तिगत सफलता, सामाजिक प्रगति और सुशासन का आधार है। हमारे जीवन के उत्तरदायित्वपूर्ण क्षेत्र में यह विचार और भी प्रासंगिक हो जाता है, क्योंकि वहाँ निर्णयों की जिम्मेदारी साझा नहीं की जा सकती, बल्कि स्वयं निभानी पड़ती है।


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