बिहार में नवीकरणीय ऊर्जा
"नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में बिहार सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास आर्थिक विकास को गतिमान रखने के साथ साथ पर्यावरण संतुलन की संभावनाओं को भी पोषित करता है।" चर्चा करें
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"नवीकरणीय ऊर्जा के क्षेत्र में बिहार सरकार द्वारा किए जा रहे प्रयास आर्थिक विकास को गतिमान रखने के साथ साथ पर्यावरण संतुलन की संभावनाओं को भी पोषित करता है।" चर्चा करें
प्रश्न - कॉप 27 में भारत द्वारा प्रस्तुत की दीर्घकालिक निम्न- कार्बन उत्सर्जन विकास रणनीति (LT-LEDS ) की क्या विशेषताएं हैं और यह किस प्रकार भारत के वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्ति में सहायक है?
भारतीय प्रधानमंत्री द्वारा वर्ष 2021
में हुए जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (COP-26) में
भारत के लिए 2070 तक शुद्ध-शून्य उत्सर्जन लक्ष्य की घोषणा
की गयी थी जिसके परिप्रेक्ष्य में नवम्बर 2022 में मिस्र में हुए COP 27 में
भारत ने अपनी दीर्घकालिक निम्न- कार्बन उत्सर्जन विकास रणनीति (LT-LEDS ) प्रस्तुत की ।
उल्लेखनीय है कि वैश्विक आबादी का भारत का 17% हिस्सा होने के बावजूद ग्लोबल वार्मिग
में बहुत कम योगदान है तथा भारत की अपने विकास के लिए ऊर्जा संबंधी आवश्यकताओं को
पूरी करने के साथ साथ कम कार्बन उत्सर्जन वाली रणनीतियों के पालन हेतु प्रतिबद्ध
है । इसी आधार पर भारत द्वारा ने अपनी दीर्घकालिक निम्न- कार्बन उत्सर्जन विकास
रणनीति (LT-LEDS ) प्रस्तुत की जिसमें वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में उठाए जाने वाले कदमों
का उल्लेख किया गया है।
भारत की (LT-LEDS ) में निम्न
कार्बन आधारित मार्ग
निम्न-कार्बन आधारित विद्युत ऊर्जा
जीवाश्म
ईंधन का विवेकपूर्ण उपयोग तथा ग्रीन हाइड्रोजन, जैव ईंधन आदि में
अनुसंधान ।
एकीकृत परिवहन प्रणाली का विकास
परिवहन साधनों का
विद्युतीकरण एवं आधुनिकीकरण द्वारा ईंधन दक्षता सुधार ।
जलवायु अनुकूल नगरीकरण
जलवायु अनुकूल भवन डिजाइन तथा
कम-कार्बन उत्सर्जन आधारित नगरपालिका सेवाएं ।
संवृद्धि गतिविधियों से उत्सर्जन को अलग करना
स्टील,सीमेंट
आदि जैसे हार्ड-टू-एबेट क्षेत्रकों में पदार्थ दक्षता और कम कार्बन विकल्प अपनाना
।
हरित आवरण में वृद्धि
वनों से बाहर वृक्षों तथा हरित आवरण की
बहाली,
संरक्षण और प्रबंधन
वायुमंडल से CO2 हटाना
सार्वजनिक-निजी
भागीदारी ढांचे की संभावनाओं का पता लगाना।
वित्त पोषण
इक्विटी निवेश, बॉण्ड
और प्रत्यक्ष विदेशी निवेश द्वारा निजी वित पोषण।
इस प्रकार भारत दीर्घकालिक
निम्न-कार्बन उत्सर्जन विकास रणनीति के माध्यम से ऊर्जा सुरक्षा को ध्यान में
रखते हुए जीवाश्म ईंधन से अन्य स्रोतों में बदलाव न्यायसंगत, सरल, स्थायी और
सर्व-समावेशी तरीके कर सकता है ।
यह रणनीति जैव ईंधन, इथेनॉल मिश्रण, राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन, इलेक्ट्रिक वाहनों के अनुकूल माहौल उपलब्ध कराने में भी सहायक होगी जिससे
न केवल परिवहन क्षेत्र कम कार्बन उत्सर्जन होगा बल्कि सार्वजनिक परिवहन के साधनों
में एक सशक्त बदलाव आएगा ।
इस रणनीति में जलवायु अनुकूल शहरी विकास, स्मार्ट सिटी पहल, संसाधन दक्षता में वृद्धि, ग्रीन बिल्डिंग कोड, ठोस व तरल अपशिष्ट प्रबंधन जैसे प्रयासों में तेजी लाने के साथ साथ हरित आवरण में वृदिध हेतु भी रणनीति प्रस्तुत
करती है ।
उल्लेखनीय है कि बिहार सरकार द्वारा पूर्व से ही दिशा में जहां जल, जीवन
हरियाली, बिहार स्वच्छ ऊर्जा नीति 2019, हरित
टैक्स जैसी प्रयासों को क्रियान्वित किया जा रहा है वहीं बिहार राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड
द्वारा UNEP के साथ मिलकर
जलवायु परिवर्तन अनुकूल और निम्न कार्बन उत्सर्जक विकास रणनीति भी बनायी गयी है।
उपरोक्त
से स्पष्ट है भारत द्वारा प्रस्तुत दीर्घकालिक निम्न-कार्बन उत्सर्जन विकास
रणनीति(LT-LEDS ) एक महत्पूर्ण
घोषणा है जो वित्त, तकनीकी बाधाओं आदि के बावजूद भारत के
वर्ष 2070 तक नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य प्राप्ति की दिशा में
सहायक है ।
प्रश्न- बिहार के ग्रामीण अर्थव्यवस्था के महत्वपूर्ण अंग के रूप में पशुपालन एवं मत्स्यन जैसी सहवर्ती क्रियाओं में हालिया प्रगति पर टिप्पणी करते हुए इस दिशा में सरकार द्वारा चलायी जा रही योजनाओं को बताएं ।
प्रश्न: बिहार में औद्योगिक विकास को बढ़ावा देने वाले प्रमुख संस्थान, योजनाओं, नीतियों को संक्षिप्त रूप में बताएं ।
प्रश्न- बिहार सरकार की कृषि निवेश प्रोत्साहन नीति 2020 बिहार में कृषि आधिारित औद्योगिक विकास की व्यापक संभावनाओं को विस्तार देने में मददगार है। चर्चा करें।
प्रश्न- यद्यपि सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने की दिशा में भारत की प्रगति धीमी रही है लेकिन कोरोना महामारी, लॉकडाउन के कारण पलायन और बढ़ती बेरोजगारी से SDG लक्ष्य और दूर हो गए हैं। चर्चा करें ।
ऐसा विकास
जो वर्तमान पीढ़ी की आवश्यकताओं की पूर्ति इस प्रकार करें जिसमें भावी पीढ़ी को
अपनी आवश्यकता पूरी करने हेतु समझौता न करना पड़े सतत विकास कहलाता है।
वर्ष 2015 में
संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा ‘2030 सतत् विकास हेतु एजेंडा’
को अपनाया गया जिसके तहत गरीबी, पोषण, स्वास्थ्य,
शिक्षा, लैंगिक समानता, स्वच्छता,
जलवायु परिवर्ततन, वैश्विक भागीदारी आदि जैसे 17
विकास लक्ष्य को अंगीकृत किया गया ।
सतत विकास की दिशा में सरकार के
प्रयास
भारत सरकार
द्वारा भी इन लक्ष्यों के प्रति प्रतिबद्धता व्यक्त की गयी और इन लक्ष्यों को
प्राप्त करने हेतु कार्यान्वयन,
निगरानी तथा विभिन्न विभागों के बीच समन्वय की जिम्मेदारी नीति
आयोग को सौंपी गयी ।
इस दिशा
में जहां सरकार के अधिकांश कार्यक्रम सतत
विकास लक्ष्य को ध्यान में रखकर ही बनाए जा रहे हैं वहीं राज्यों को भी सतत विकास
पर अपने-अपने दृष्टि पत्र को तैयार करने तथा उसी के अनुसार कार्य करने की महत्वपूर्ण
भूमिका दी गयी है ।
कोविड-19 महामारी एवं सतत विकास लक्ष्य
SDG व्यापक
रूप से सामाजिक, आर्थिक और पर्यावरणीय आयामों को कवर करते हैं।
उल्लेखनीय है कि कोराना संकट से पहले ही भारत समेत
कई देश लक्ष्यों को हासिल करने में पिछड़ रहे थे लेकिन अब कोरोना के बाद लॉकडाउन
और पलायन के कारण निर्धनता, भूखमरी, स्वास्थ्य, शिक्षा,
रोजगार जैसे लक्ष्य ओर दूर हो गए है।
निर्धनता-SDG 1 गरीबी दूर करने के लिए समर्पित है लेकिन महामारी
के कारण जहां आशंका है कि करोड़ों लोग गरीबी की दलदल में फंस सकते हैं तथा समाज
में आर्थिक असमानता की खाई गहरी होगी ।
भूखमरी- खाद्य और कृषि संगठन तथा अन्य अंतर्राष्ट्रीय संगठनों
के सहयोग से जारी रिपोर्ट के अनुसार भारत सबसे बड़ी खाद्य असुरक्षित आबादी वाला देश
है । उल्लेखनीय है कि वैश्विक प्रयासों से पिछले दो दशकों में कुपोषित लोगों की संख्या
लगभग आधी हो गई लेकिन COVID-19 महामारी के कारण वर्ष
2030 तक शून्य भुखमरी के लक्ष्य को प्राप्त करना कठिन प्रतीत हो रहा
है।
स्वास्थ्य- महामारी के कारण हाल के वर्षों में स्वास्थ्य क्षेत्र में प्राप्त उपलब्धि
को आघात लग सकता है और स्वास्थ्य सेवाओं
तथा टीकाकरण अभियानों में बाधा के कारण शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु
दर में में वृद्धि होने के साथ एड्स और मलेरिया नियंत्रण अभियानों की गति धीमी
होने से इन बीमारियों की बढ़ने की संभावना है।
गुणवत्तापरक शिक्षा- वर्तमान महामारी के दौर में
शिक्षा को डिजीटल माध्यम से दिया गया लेकिन भारत में डिजिटल डिवाइड की कमी के कारण
सभी तक शिक्षा नहीं पहुंच पायी।
गुणवत्तापरक रोजगार- अंतर्राष्ट्रीय श्रम संगठन की रिपोर्ट
के अनुसार वैश्विक कार्यबल का आधा भाग अनौपचारिक अर्थव्यवस्था में काम करते हैं
तथा महामारी में कई लोग अपने रोजगार तथा नौकरी खो चुके हैं।
स्पष्ट है कि कोरोना महामारी के व्यापक प्रभाव के कारण पलायन और बढ़ती बेरोजगारी से कुछ SDG लक्ष्य और दूर हो गए हैं। हांलाकि वर्ष 2020-21 में कोविड-19 महामारी द्वारा उत्पन्न गंभीर बाधाओं के बावजूद भारत ने कुछ लक्ष्यों में अच्छा प्रदर्शन किया ।
यदि कोविड महामारी का प्रभाव नहीं होता तो भारत के
प्रदर्शन और बेहतर होता फिर भी महामारी के दौर में 2020-21 में नीति आयोग
SDG इंडिया इंडेक्स द्वारा मापे गए 15 SDG इंडेक्स
में से 8 में अच्छा प्रदर्शन, भारत का समग्र
स्कोर 60 से बढ़कर 66 होना तथा वर्ष 2021
में फ्रंट रनर राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों की संख्या 22 होना संतोषजनक स्थिति को बताता है ।
प्रश्न - मुक्त व्यापार समझौते के महत्व एवं लाभ पर प्रकाश डाले तथा बताए कि भारत के लिए यह किस प्रकार नए युग की आवश्यकताओं के साथ संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकता हैं।
मुक्त व्यापार समझौता दो या दो से अधिक देशों के बीच व्यापार बाधाओं को कम करने हेतु किया गया एक समझौता होता है जिसमें सदस्य देशों को तरजीही व्यापार शर्तें, न्यून सरकारी शुल्क, टैरिफ रियायतें आदि प्रदान की जाती है। मुक्त व्यापार की अवधारणा व्यापार संरक्षणवाद के विपरीत है जिसको अधिमान्य व्यापार समझौता, व्यापक आर्थिक सहयोग समझौता, व्यापक आर्थिक भागीदारी समझौता के रूप में वर्गीकृत किया जा सकता है।
मुक्त व्यापार समझौतों का महत्व
मुक्त व्यापार समझौते का अपना
महत्व है और इसके कई लाभ भी है । मुकत व्यापार समझौते जिन देशों के बीच होती है
उनकी उत्पादन लागत अन्य देशों की तुलना में सस्ती हो जाती है। कुछ अपवादों को
छोड़ दिया जाए तो यह व्यापार को बढ़ाने सहायक होती है जिससे अर्थव्यवस्था को गति
मिलती है और वैश्विक व्यापार में वृदिध होती है । इसके लाभ को देखते हुए ही वर्तमान
में कई देश आपस में मुक्त व्यापार संधि कर रहे हैं।
भारत भी कई देशों के साथ मुक्त व्यापार
समझौतों को कर रहा है । पिछले कुछ समय से भारत द्वारा
कई देशों जैसे यूनाइटेड किंगडम, श्रीलंका,
संयुक्त अरब अमीरात, आस्ट्रेलिया और व्यापार
समूहों जैसे आसियान के साथ मुक्त व्यापार समझौते पर चर्चा की गयी है । विश्व व्यापार संगठन की प्रासंगिकता तथा
संरक्षणवादी नीतियों के परिप्रेक्ष्य में मुक्त
व्यापार समझौते भारत के लिए कई प्रकार से लाभदायक है जिसे निम्न प्रकार
समझा जा सकता है ।
जहां
आत्मनिर्भर भारत अभियान से भारत की संरक्षणवादी बंद बाज़ार अर्थव्यवस्था की बनती छवि
बनती जा रही है तो वहीं हालिया रिपोर्ट के अनुसार विश्व की पांचवी बड़ी अर्थव्यवस्था
वाला भारत वर्ष
2030 तक एशिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की क्षमता है ।
अतः भारत के पास आनेवाले वर्षों में अपनी अर्थव्यवस्था को बदलने का एक अवसर है।
भारत के लिए मुक्त व्यापार समझौतों का महत्व
स्पष्टत: वर्तमान में जहां विश्व व्यापार संगठन में बहुपक्षीय व्यापार वार्ता अवरुद्ध है तथा संगठन की भूमिका शिथिल हो रही है वैसी अवस्था में मुक्त व्यापार समझौते महत्वपूर्ण हैं जो नए युग की आवश्यकताओं के साथ संतुलन बनाने में महत्वपूर्ण उपकरण साबित हो सकता हैं।
सभी प्रश्न एवं उत्तर हमारे संस्थान के नोटस पर आधारित है जिसको आर्डर कर आप अपने घर पर प्राप्त कर सकते हैं ।
भारत में 5G तकनीक एवं संभावित उपयोग
आडिटर मुख्य परीक्षा 2022 में पूछे गए प्रश्न का मॉडल उत्तर हमारी टीम द्वारा उपलबध कराया जा रहा है आप चाहे तो इसी प्रकार का मॉडल उत्तर आवश्यक सुधार करके लिख सकते हैं
प्रश्न - कार्बन कृषि से आपका क्या अभिप्राय है ? यह प्रक्रिया किस प्रकार से कृषि प्रणाली बनाम जलवायु परिवर्तन को बदल सकती
है
।
वह
कृषि प्रणाली जिसके द्वारा वायुमंडल में उत्सर्जित ग्रीनहाउस गैसों की मात्रा को
कम करने में मदद मिलती है तथा उत्सर्जित कार्बन को भूमि में जमा करने पर जोर दिया
जाता है कार्बन फार्मिंग कहलाता है दूसरे शब्दों
में कार्बन फार्मिंग एक ऐसा कृषि मॉडल है जो
जलवायु परिवर्तन को बहुत हद तक परिवर्तित करने की क्षमता रखने के साथ साथ सतत एवं टिकाऊ
कृषि अभ्यास को प्रोत्साहन देती है ।
उल्लेखनीय है कि
कृषि एक महत्वपूर्ण क्रिया है तथा वर्तमान में प्रचलित औद्योगिक कृषि व्यापक स्तर
पर पर्यावरणीय विनाश का कारण बन रहे हैं और कार्बन उत्सर्जन में अपनी भागीदारी के
द्वारा जलवायु परिवर्तन की प्रक्रिया को तेज कर रहे हैं । कृषि कार्य में कार्बन उत्सर्जन
को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है।
कार्बन कृषि के लाभ
इस प्रकार कार्बन कृषि मॉडल जहां कार्बन
उत्सर्जन में कमी करते हुए जलवायु परिवर्तन का मुक़ाबला करने में मदद करती है वहीं
वृहत आबादी के लिये खाद्य सुरक्षा जाल सुनिश्चित करते हुए उनकी आय को बढ़ाने में भी
मददगार है।
कृषि
एवं कार्बन उत्सर्जन
कृषि वैश्विक ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन
में लगभग एक तिहाई का योगदान देती है तथा हालिया रिपोर्ट के अनुसार भारत में इन गैसों के उतसर्जन में कृषि की हिस्सेदारी लगभग 14%
है जिसमें मुख्य रूप से पशुधन क्षेत्र, नाइट्रोजन उर्वरकों का प्रयोग
और चावल की खेती, कृषि अवशिष्टों का निपटना, पराली
जलाने जैसे मुख्य कारक शामिल है ।
इस दिशा में पर्यावरण अनुकूल कषि को प्रोत्साहन देने तथा जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों के प्रति लचीला बनाने हेतु राष्ट्रीय सतत् कृषि मिशन, परंपरागत कृषि विकास योजना (PKVY) के तहत भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति कार्यक्रम को प्रोत्साहन दिया जा रहा है जिसके तहत रासायनिक या जैविक खाद का उपयोग नहीं होता तथा मिट्टी की सतह पर रोगाणुओं, केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के अपघटन को प्रोत्साहित कर धीरे धीरे मिट्टी में पोषक तत्त्वों की वृद्धि की जाती है ।
इस
दिशा में बिहार में जलवायु परिवर्तन से निपटने हेतु सरकार ने जलवायु अनुकूल कृषि
कार्यक्रम आरंभ किया है जिसके दो घटक है
बिहार के सभी 38 जिलों में जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम की स्वीकृति दी गई, प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं-
स्पष्ट है आनेवाले वर्षों में जनसंख्या बढ़ने के साथ साथ कृषि उत्पादों की मांग भी बढ़ेगी ऐसे में में कृषि पारिस्थितिकी को संरक्षित रखते हुए जलवायु अनुकूल एवं स्मार्ट कृषि अभ्यासों को प्रोत्साहन देने की आवश्यकता है ।
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प्रश्न- वैश्विक लैंगिक अंतराल (Global Gender Gap Index) सूचकांक 2022 के संदर्भ में भारतीय राजनीति में लैंगिक समानता ज्यादा बेहतर स्थिति में नहीं है। हांलाकि इस दिशा में कुछ चुनौतिया अभी भी विद्यमान है जिनको दूर करने और सतत विकास लक्ष्य को प्राप्त करने हेतु और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है । चर्चा करे
विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी वैश्विक लैंगिक
अंतराल (Global
Gender Gap Index) सूचकांक 2022 में भारत को चार प्रमुख मानकों के आधार पर 146 देशों में
से 135वें स्थान पर रखा है।
इस सूचकांक के एक मुख्य आयाम
राजनीतिक अधिकारिता (संसद में और मंत्री पदों पर
महिलाओं का प्रतिशत) में भारत 146 देशों में 48वें स्थान पर है जो एक संतोषजनक स्थिति कही जा सकती है लेकिन इस दिशा में
और प्रयास किए जाने की आवश्यकता है । उल्लेखनीय है कि इस सूचकांक के अनुसार
पड़ोसी देश बांग्लादेश 0.546 के स्कोर के साथ 9वें स्थान पर है।
भारतीय संविधान में पुरुषों
और महिलाओं दोनों को समान राजनीतिक और नागरिक अधिकार प्रदान किए हैं ताकि भारत में
राजनीतिक क्षेत्र में लैंगिक समानता सुनिश्चित किया जा सके ।
भारतीय संविधान में लैंगिक
समानता संबंधी प्रावधान |
|
मौलिक अधिकार |
पुरुषों और महिलाओं को समान
मौलिक अधिकारों की गारंटी |
नीति निदेशक तत्वों |
पुरुषों और महिलाओं दोनों के
लिए समान काम के लिए समान वेतन काम की मानवीय स्थितियों और
मातृत्व राहत के प्रावधान द्वारा महिलाओं के आर्थिक सशक्तिकरण । |
अनुच्छेद 325 और 326 |
निर्धारित मतदान और चुनाव
लड़ने के राजनीतिक अधिकार |
73वें एवं 74वें संशोधन
अधिनियम |
स्थानीय निकायों में
महिलाओं के लिए सीटों की कुल संख्या का एक तिहाई आरक्षण |
उल्लेखनीय है कि भारतीय राजनीति में लैंगिक समानता यानी
राजनीति में महिलाओं की भागीदारी समावेशी एवं विकासशील शासन व्यवस्था हेतु अत्यंत
है जिसकी आवश्यकता को निम्न प्रकार से समझा जा सकता है-
भारतीय संविधान एवं अन्य प्रावधानों के बावजूद भारतीय राजनीति में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कम है हांलाकि स्थानीय शासन में सरकार के प्रयासों के कारण महिलाओं की भागीदारी बढ़ी है फिर भी अनेक ऐसे कारण है जिनके कारण इस दिशा में पर्याप्त सफलता नहीं मिल पायी है।
लिंग आधारित रूढ़ियां
राजनीतिक शिक्षा एवं ज्ञान की कमी
निरक्षरता
आत्मविश्वास की कमी
आर्थिक स्थितियां
बिहार सरकार महिलाओं को सशक्त करने के क्रम में पंचायती राज संस्थानों और नगरपालिका निकाय में महिलाओं को 50% आरक्षण के अलावा सभी सरकारी सेवाओं में नियुक्ति में महिलाओं को 35% आरक्षण, बिहार आरक्षी सेवाओं में 35% आरक्षण जैसी व्यवस्था की गयी है ।
अत: इस प्रकार की व्यवस्था राज्य विधानमंडल एवं
केन्द्र सरकार के स्तर पर भी किए जाने की आवश्यकता है। ताकि भारतीय शासन व्यवस्था को लैंगिक रूप से समावेशी
बनाया जा सके और नीति-निर्माण और शासन में
महिलाओं की भागीदारी बढ़ायी जा सके।
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